जामनगर रिफाइनरी से राज्यसभा तक, परिमल नाथवानी की कहानी
झारखंड से राज्यसभा के लिए चुने गए परिमल नाथवानी ने कॉरपोरेट बोर्डरूम, मंदिर ट्रस्ट, खेल प्रशासन और राष्ट्रीय राजनीति के बीच एक अलग पहचान बनाई है

झारखंड से पिछले सप्ताह राज्यसभा के लिए परिमल नाथवानी का चुना जाना सिर्फ एक सामान्य चुनावी नतीजा नहीं था. इसने INDIA गठबंधन के भीतर की दरारें भी उजागर की हैं. नतीजे ने ऐसे राज्य में कांग्रेस को असहज स्थिति में डाल दिया जहां गठबंधन के पास कागजों पर पर्याप्त संख्या थी. साथ ही इसने एक बार फिर भारत के सबसे प्रभावशाली कॉरपोरेट अधिकारियों में से एक की राजनीतिक पहुंच को भी दिखाया.
BJP के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने वाले नाथवानी ने झारखंड से जीत दर्ज की. जबकि सत्तारूढ़ INDIA गठबंधन के पास राज्य की दोनों राज्यसभा सीटें जीतने लायक विधायकों की संख्या दिखाई दे रही थी. एक सीट झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) को मिली. वहीं कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा हार गए.
इसके बाद क्रॉस वोटिंग के आरोप लगे और भविष्य की चुनावी लड़ाइयों से पहले गठबंधन की एकजुटता पर सवाल उठने लगे.
इस नतीजे के बाद एक बार फिर खुद नाथवानी पर भी ध्यान गया. उन्होंने कॉरपोरेट बोर्डरूम, मंदिर ट्रस्ट, खेल प्रशासन और राष्ट्रीय राजनीति के बीच एक अलग पहचान बनाई है. उनके नाम राज्यसभा के इतिहास में सबसे लंबे समय तक निर्दलीय सांसद रहने का भी रिकॉर्ड है.
जीत के बाद उन्होंने कहा, "झारखंड मेरी कर्मभूमि है. मेरा मुख्य फोकस ग्रामीण क्षेत्रों पर रहेगा. वहां मजबूत स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रम चलाने और कुटीर उद्योगों को फिर से जीवित कर जमीनी स्तर पर स्थाई रोजगार के अवसर पैदा करने पर काम करेंगे. ग्रामीण बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य सुविधाओं और शिक्षा का विकास मेरी प्राथमिकता होगी."
70 वर्षीय नाथवानी राज्यसभा में चौथा कार्यकाल पूरा कर रहे हैं. यह झारखंड से उनका तीसरा कार्यकाल है. 2020 से 2026 के बीच वे आंध्र प्रदेश चले गए थे. वहां जगन मोहन रेड्डी की युवजन श्रमिक रायथू कांग्रेस पार्टी (YSRCP) के समर्थन से राज्यसभा पहुंचे थे.
हालांकि अधिकांश सांसदों के विपरीत नाथवानी ने कभी कोई प्रत्यक्ष चुनाव नहीं लड़ा. वे पारंपरिक राजनेता की छवि में भी फिट नहीं बैठते. उनकी पहचान रिलायंस इंडस्ट्रीज के वरिष्ठ अधिकारी के रूप में रही है. उन्होंने दशकों तक समूह के कॉरपोरेट मामलों, सरकार से संबंधों और रणनीतिक परियोजनाओं को संभाला. खासतौर पर गुजरात में.
नाथवानी का जन्म और पढ़ाई मुंबई में हुई. लेकिन उनका परिवार गुजरात के जामनगर जिले के खंभालिया कस्बे का रहने वाला है. उन्होंने रिलायंस के संस्थापक धीरूभाई अंबानी के साथ काम करते हुए तरक्की की. बाद में वे मुकेश अंबानी के करीबी सहयोगियों में शामिल हो गए. वर्षों के दौरान उन्होंने सार्वजनिक रूप से खुद को धीरूभाई अंबानी का 'तीसरा बेटा' जैसा बताया. यह अंबानी परिवार के भरोसे और पूरे देश में समूह का विस्तार करने में उनकी भूमिका को दिखाता है.
उद्योग जगत के जानकारों का मानना है कि नाथवानी ने रिलायंस की सबसे महत्वपूर्ण परियोजनाओं में से एक, जामनगर रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स की स्थापना में अहम भूमिका निभाई. बताया जाता है कि उन्होंने जमीन अधिग्रहण, स्थानीय पक्षों से बातचीत और प्रशासनिक मंजूरियां दिलाने का काम संभाला. इसके लिए सिर्फ कॉरपोरेट विशेषज्ञता ही नहीं बल्कि राजनीतिक समझ भी जरूरी थी. बाद में जामनगर कॉम्प्लेक्स दुनिया का सबसे बड़ा रिफाइनिंग हब बना और रिलायंस की विकास यात्रा की आधारशिला साबित हुआ.
इस अनुभव ने गुजरात में रिलायंस के सबसे भरोसेमंद संकटमोचक के रूप में नाथवानी की पहचान बनाई. चाहे नौकरशाह हों, गांव के नेता हों या अलग-अलग दलों के राजनेता, वे वैचारिक मतभेदों के बावजूद सभी से रिश्ते बनाए रखने वाले सहमति बनाने वाले व्यक्ति के रूप में जाने गए.
नाथवानी का द्वारका तीर्थनगरी और द्वारकाधीश मंदिर से गहरा जुड़ाव रहा है. पिछले दो दशकों में उन्होंने शहर के विकास में सक्रिय भूमिका निभाई है. उन्होंने बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, विरासत संरक्षण और श्रद्धालुओं की सुविधाओं को समर्थन दिया.
नाथवानी गुजरात के खेल तंत्र में भी महत्वपूर्ण चेहरा बने. गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष के रूप में वे मोटेरा स्टेडियम को नरेंद्र मोदी स्टेडियम में बदलने की प्रक्रिया से जुड़े रहे. यह आज दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम है. हाल के वर्षों में उन्होंने फुटबॉल पर ध्यान केंद्रित किया है और राज्य के फुटबॉल एसोसिएशन के माध्यम से इस खेल को बढ़ावा देने के प्रयासों से जुड़े हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों के मन में लगातार यह सवाल उठता रहा है कि गुजरात का एक कारोबारी बार-बार गुजरात की जगह झारखंड का प्रतिनिधित्व राज्यसभा में क्यों करता है. इसका सीधा जवाब यह है कि गुजरात की राज्यसभा सीटें आमतौर पर पार्टी संगठन के नेताओं और वफादारों को मिलती हैं. जबकि नाथवानी ने खुद को BJP का औपचारिक सदस्य बनाए बिना एक कॉरपोरेट चेहरा बनाए रखा है.
गुजरात में नाथवानी सिर्फ सत्तारूढ़ दल के एक और उम्मीदवार होते. लेकिन झारखंड में उनकी अलग स्थिति है. यहां वह ऐसे कॉरपोरेट अधिकारी हैं जिन्हें अलग-अलग दलों का राजनीतिक समर्थन मिलता है.
नाथवानी ने झारखंड में बड़े पैमाने पर निवेश किया है. उन्होंने विकास परियोजनाओं को वित्तीय सहायता दी, गांवों को गोद लिया और विधायकों से लगातार व्यक्तिगत संपर्क बनाए रखा. उनका सबसे बड़ा योगदान भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) रांची में 600 लोगों की क्षमता वाले अत्याधुनिक सेमिनार हॉल के निर्माण के लिए सांसद निधि और अपनी निजी निधि से कुल 15 करोड़ रुपए देना रहा.
नाथवानी ने अपनी निजी निधि से 1.07 करोड़ रुपए खर्च कर रांची नगर निगम के जर्जर अस्पताल का पुनर्निर्माण कराया. उन्होंने आदिवासी समुदाय के पवित्र धार्मिक स्थलों का व्यापक सौंदर्यीकरण और जीर्णोद्धार कराया. साथ ही स्टेडियम, खेल दीर्घाएं और सामुदायिक पार्क भी बनवाए.
आंध्र प्रदेश जाने की वजह राजनीतिक गणित थी. 2020 में झारखंड से उनका दूसरा कार्यकाल खत्म हुआ. उस समय राज्य में JMM-कांग्रेस की सरकार थी और उनके पास दोबारा चुने जाने लायक पर्याप्त समर्थन नहीं था. इसके बाद वह YSRCP के साथ जुड़े और आंध्र प्रदेश से राज्यसभा पहुंचे. इस बार आंध्र प्रदेश का रास्ता बंद हो गया तो वे NDA के समर्थन से फिर झारखंड लौट आए. बाकी काम क्रॉस वोटिंग ने कर दिया.
झारखंड वापसी से यह संकेत मिलता है कि यह राज्य अब भी नाथवानी का पसंदीदा राजनीतिक आधार है. आंध्र प्रदेश में वे सत्तारूढ़ दल के उम्मीदवार के तौर पर पहुंचे थे वहीं झारखंड वह राज्य है जहां उन्होंने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाई. उनकी ताजा जीत ने एक ऐसे कॉरपोरेट दिग्गज की पहचान को और मजबूत किया है जो चुनावी राजनीति में सीधे उतरे बिना राजनीतिक दूरी पाटने की क्षमता रखता है. नाथवानी उन चुनिंदा लोगों में शामिल हैं जिन्हें ऐसे नेता भी समर्थन देते हैं जो सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे के विरोधी हैं.