चंडीगढ़ मेयर विवाद में अगर दोषी पाए गए पीठासीन अधिकारी तो क्या होगी सजा?
5 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने चंडीगढ़ मेयर चुनाव के मामले पर सुनवाई करते हुए कहा था कि निर्वाचन अधिकारी मतपत्र के साथ छेड़-छाड़ कैसे कर सकता है और ऐसी हरकत के लिए उस पर मुकदमा चलना चाहिए.

पिछले कुछ दिनों से चंडीगढ़ मेयर का विवाद काफी सुर्खियों में है. आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों ही इस पूरे मामले में निर्वाचन अधिकारी को कठघरे में खड़ा किया है. वहीं चंडीगढ़ मेयर चुनाव में निर्वाचन अधिकारी पर लगे धांधली के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट की बेहद ही सख्त टिप्पणी सामने आई है.
सोमवार यानी 5 फरवरी को इस मामले पर कोर्ट ने आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के संयुक्त उम्मीदवार कुलदीप कुमार टीटा की याचिका सुनवाई की. इस दौरान चुनाव का वीडियो देखने के बाद सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि निर्वाचन अधिकारी मतपत्र के साथ छेड़-छाड़ कैसे कर सकता है और ऐसी हरकत के लिए उस पर मुकदमा चलना चाहिए.
इस मामले में 30 जनवरी को आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. दोनों ही पार्टियों का ऐसा आरोप है कि चंडीगढ़ मेयर चुनाव में पीठासीन अधिकारी ने धांधली की और संख्या ना होने के बाद भी बीजेपी को विजेता घोषित किया. दोनों ही पार्टियों का कहना है कि पहले इनके पास बहुमत था लेकिन इनके पाले के आठ वोटों को अमान्य करार दे दिया गया.
कोर्ट ने मेयर चुनाव में धांधली के आरोपों में चंडीगढ़ प्रशासन और नगर निगम को भी नोटिस जारी किया है. सुप्रीम कोर्ट से पहले दोनों ही पार्टियों ने पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट का रुख किया था. जहां पर राहत ना मिलने पर ये सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. कोर्ट ने बैलेट पेपर और मतदान के दौरान का वीडियो हाई कोर्ट को सौंपने का आदेश दे दिया है. इसके अलावा 19 फरवरी को पीठासीन अधिकारी को भी पेश होने का आदेश दिया है.
किसी भी चुनाव में पीठासीन अधिकारी की भूमिका सबसे अहम होती है. यह भी कहा जा सकता है कि पीठासीन अधिकारी के निष्पक्ष ना रहने का मतलब है कि पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया दांव पर लग गई है. इसी हवाले से चंडीगढ़ मेयर चुनाव के निर्वाचन अधिकारी पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद कुछ सवाल अहम हो जाते हैं. जैसे क्या निर्वाचन अधिकारी के खिलाफ किसी तरह का केस दायर हो सकता है या नहीं? और अगर केस दायर करना है तो उसका कानूनी आधार क्या हो सकता है? साथ ही इस मामले में दोषी पाए जाने पर अधिकतम सजा क्या हो सकती है?
सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता कहते हैं, "चुनावी प्रक्रिया में जानबूझकर अनियमितता और गैर-कानूनी काम करना एक अपराध है. इन कारणों से पूरी चुनावी प्रक्रिया रद्द हो सकती है. चुनाव अधिकारी के खिलाफ अनियमितता और पद के दुरुपयोग के प्रमाण मिलें तो उनके खिलाफ विभागीय कारवाई भी हो सकती है. चुनाव अधिकारी जिस सर्विस से हो उसके सर्विस रुल्स के तहत उनके खिलाफ विजिलेंस जांच हो सकती है. दूसरे प्रत्याशी को बेजा फायदा पहुंचाने के लिए चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप भ्रष्टाचार के दायरे में आता है. ऐसे में अधिकारी के खिलाफ प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट के तहत मामला दर्ज हो सकता है."
सुप्रीम कोर्ट के पास अनुच्छेद-142 के तहत चुनाव अधिकारी के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराने के लिए असाधारण शक्ति हासिल है. विराग गुप्ता कहते हैं कि ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट तीन तरीके से कार्रवाई करने का आदेश दे सकता है. पहला-चुनावी प्रक्रिया को रद्द करके नए चुनाव अधिकारी की नियुक्ति. इससे पुराने चुनाव अधिकारी के आचरण पर गम्भीर सवाल खड़े होंगे जिससे उनकी सर्विस बुक में प्रतिकूल इंट्री हो सकती है. दूसरा-चुनाव अधिकारी के खिलाफ पुलिस या सीबीआई की जांच का आदेश.
इसके तहत आपराधिक मामला दर्ज होने के बाद प्रमाणों के आधार पर चार्जशीट या फाइनल रिपोर्ट दायर होगी. उसके अनुसार ही अदालत में मुकदमा चल सकता है. तीसरा विकल्प है कि अपनी विशिष्ट शक्तियों का इस्तेमाल करके सुप्रीम कोर्ट चुनाव अधिकारी के खिलाफ सख्त टिप्पणी करते हुए टोकन सजा भी दे सकता है. हालांकि चंडीगढ़ मामले में सुप्रीम कोर्ट का पुराना कोई आदेश नहीं हैं इसलिए चुनाव अधिकारी के खिलाफ अवमानना का कोई मामला नहीं बनता.
अब यहां पर एक सवाल यह भी बनता है कि इस तरह के मामलों में केस कौन दायर कर सकता है? इस पर एडवोकेट गुप्ता कहते हैं, "ऐसे मामलों में पुलिस या सीबीआई में केस दायर हो सकता है. यह मामला चंडीगढ़ से जुड़ा है जो केन्द्रशासित प्रदेश है. वहां पर पुलिस केन्द्र सरकार के अधीन है. सीबीआई भी केन्द्र सरकार के अधीन है. इसीलिए मामला दर्ज होने की संभावना कम हो जाती है."
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में सुनवाई हो रही है. हाईकोर्ट ने चुनाव से सम्बन्धित मामले में त्वरित राहत का अंतरिम आदेश देने से इंकार कर दिया था इसलिए याचिकाकर्त्ता पार्षद कुलदीप कुमार टीटा ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है. मुख्य मामला तय होने के बाद चुनाव अधिकारी के अपराध पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों जगहों पर सुनवाई हो सकती है.
इस पूरे मामले में अगर पीठासीन अधिकारी दोषी पाए जाते हैं तो, उन पर किस कानून के तहत शिकायत और एफआईआर दर्ज कराई गई है उसी के मुताबिक उनकी सजा भी तय की जाएगी. एडवोकेट विराग कहते हैं कि सिर्फ गलत काम करने के लिए आपराधिक सजा नहीं हो सकती.
उसके लिए आपराधिक मनोवृत्ति को भी बताना जरूरी है. अगर पूरे मामले में भ्रष्ट आचरण और गैर कानूनी तरीके से पैसे लेने के सबूत सामने आते हैं तो फिर यह गम्भीर अपराध होगा. नये कानूनों के अनुसार घूस देकर काम कराने वाले के खिलाफ भी आपराधिक मामला दर्ज हो सकता है. घूस लेकर गलत काम करने के मामलों में जेल होने के साथ सरकारी अधिकारी की नौकरी से बर्खास्तगी भी हो सकती है.