होर्मुज पर अब दोहरी नाकाबंदी! भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर क्या हैं अनुमान?
ताजा हालात में रुपए पर दबाव बढ़ना तय है. क्रिसिल का अनुमान है कि अगर RBI मुद्रा अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए उपाय अपनाता है, तो मार्च 2027 तक रुपए का औसत मूल्य प्रति डॉलर 93 के आसपास रहेगा

11 अप्रैल को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान जंग खत्म करने के लिए बातचीत कर रहे थे. वहीं, दूसरी तरफ इजरायल लेबनान पर हमला कर रहा था, जिससे युद्धविराम को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे थे. हालांकि यह बातचीत बिना किसी सहमति पर पहुंचे ही खत्म हो गई है.
अब अमेरिका ने कहा है कि वह 13 अप्रैल से होर्मुज स्ट्रेट की नाकाबंदी करेगा ताकि ईरानी पोर्ट से कोई भी शिप आगे न जा पाए. इसके जवाब में ईरान की सेना और रिवॉल्यूशनरी गार्ड ने धमकी दी है कि अब इस क्षेत्र का कोई भी बंदरगाह सुरक्षित नहीं रहेगा.
ऊर्जा क्षेत्र में सप्लाई चेन टूटने की वजह से अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है. भारत के लिए भी अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है, क्योंकि भारत के कच्चे तेल का लगभग 45-50 फीसद हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात किया जाता है.
कतर भारत की द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की 65 फीसद जरूरतों को पूरा करता है. ईरान ने कतर के ऊर्जा और पेट्रोकेमिकल संपत्तियों पर हमले किए हैं. साफ है कि आने वाले समय में भारत के ऊर्जा सप्लाई पर इसका असर पड़ेगा.
वहीं, दूसरी ओर भारत के निर्यात का लगभग 13 फीसद हिस्सा पश्चिम एशिया को जाता है, जिसमें इंजीनियरिंग उत्पाद, रत्न और आभूषण, खाद्य उत्पाद, रसायन और निर्माण सामग्री शामिल हैं. क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के जरिए 10 अप्रैल को जारी एक रिसर्च नोट में कहा गया है, "अगर शांति को लेकर जारी प्रयास असफल रहे , तो हम मानते हैं कि संघर्ष दो महीने से अधिक समय तक चलेगा. इससे पश्चिम एशिया से ऊर्जा आपूर्ति में और ज्यादा समस्या पैदा होगी, जिसमें धीमी गति से सुधार होने की संभावना है."
इस रिसर्च पेपर में आगे कहा गया है, "इस वित्तीय वर्ष में ब्रेंट क्रूड का औसत मूल्य 100 डॉलर प्रति बैरल रहने की संभावना है. जबकि भारत सहित चुनिंदा देशों के लिए होर्मुज स्ट्रेट आंशिक रूप से खुला रह सकता है."
बता दें कि युद्धविराम की घोषणा के बाद ब्रेंट क्रूड के दाम में कुछ गिरावट आई है. 10 अप्रैल को क्रूड का दाम 96.4 डॉलर प्रति बैरल था. दुनिया के लगभग एक चौथाई तेल और गैस का परिवहन होर्मुज स्ट्रेट से होता है, लेबनान पर इजरायल के हमलों के कारण ईरान ने फिर से इस पर रोक लगा दी है. ईरान का कहना है कि लेबनान पर हमले रोकना शांति समझौते का हिस्सा है, लेकिन इजरायल और अमेरिका दोनों इससे असहमत हैं.
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने कहा कि जंग अगर बढ़ती है तो जो मांग का संकट था, वह आपूर्ति के संकट में बदल सकता है. इसका दूसरा प्रभाव घरेलू मोर्चे पर धीमी आर्थिक वृद्धि और उच्च महंगाई होगा. उपभोग, जो अब तक विकास का मजबूत इंजन रहा है, कृषि आय में धीमी वृद्धि और खुदरा महंगाई के बढ़ने के कारण कमजोर पड़ सकता है.
इस वित्तीय वर्ष में उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति औसतन 5.4 फीसद रहने का अनुमान है, जो मुख्य रूप से ईंधन की बढ़ती कीमतों से बढ़ेगी. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने मुद्रास्फीति को काबू में रखने के लिए पहले ही ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है. अगर ऊर्जा आपूर्ति में बाधा बनी रही और मुद्रास्फीति बढ़ गई तो RBI ब्याज दरों में वृद्धि भी कर सकता है.
केंद्रीय बैंक ने यह भी कहा कि मौजूदा संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा और कमोडिटी कीमतों में भारी अस्थिरता के कारण निकट भविष्य में मुद्रास्फीति के अनुमान अनिश्चित हो सकते हैं. इसने इस वर्ष अल नीनो जैसी स्थिति की संभावना पर भी प्रकाश डाला, जिससे खाद्य कीमतों में और ज्यादा अनिश्चितता आएगी.
इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए, वित्त वर्ष 2027 के लिए उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति 4.6 फीसद रहने का अनुमान है. वित्त वर्ष 2026 के 11 महीने में यह औसत 1.9 फीसद था. RBI ने पहली बार कोर मुद्रास्फीति (जिसमें अत्यधिक अस्थिर खाद्य और ईंधन की कीमतें शामिल नहीं हैं) का अनुमान भी जारी किया है और वित्त वर्ष 2027 में इसके औसतन 4.4 फीसद रहने की संभावना जताई है.
इस बीच, निर्यात में गिरावट के कारण चालू खाता घाटा बढ़ेगा. आयात बिल में विशेष रूप से तेल, गैस और उर्वरक आयात के कारण वृद्धि हो सकती है, जिससे चालू खाता घाटा अनुपात सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में 2.5 फीसद तक पहुंच जाएगा.
रुपए पर और दबाव बढ़ेगा. क्रिसिल का अनुमान है कि अगर RBI मुद्रा अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए उपाय अपनाता है, तो मार्च 2027 तक रुपए का औसत मूल्य प्रति डॉलर 93 के आसपास रहेगा. अनिश्चितता के माहौल के बीच HDFC म्यूचुअल फंड की एक रिसर्च रिपोर्ट में अर्थव्यवस्था को लेकर कुछ पॉजिटिव बातें कही गई है. इनमें से एक है तेल की कीमतों में गिरावट, जिससे चालू खाता दर (CAD) और रुपए पर दबाव कम होगा. पूंजी प्रवाह में सुधार होगा और भारत के भुगतान संतुलन पर दबाव घटेगा.
साथ ही, RBI के दखल से महंगाई कंट्रोल में रह सकती है और नीतिगत दरों में किसी भी बड़ी वृद्धि का जोखिम कम हो सकता है. हालांकि, वेस्ट एशिया में तनाव का फिर से बढ़ना, मानसून के दौरान अपर्याप्त बारिश, तेल की ऊंची कीमतें, उर्वरक पर ज्यादा सब्सिडी और उत्पाद शुल्क में कमी के चलते राजकोषीय संकट के जोखिम बने हुए हैं.