कानून बनाकर मुसलमानों को 'वंदे मातरम' गाने पर मजबूर करेगी सरकार?

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार संसद में वंदे मातरम को राष्ट्रगान जैसा दर्जा दिलाने के लिए एक नया विधेयक लाने जा रही है

वंदे मातरम् के गायन पर सरकार ने नया नियम जारी किया है.
वंदे मातरम् के गायन पर सरकार ने नया नियम जारी किया है. (File Photo: ITG)

19 दिसंबर 1927 को फैजाबाद जेल में एक 27 वर्षीय लड़के ने हंसते हुए फांसी के फंदे को चूम लिया. अंग्रेजों के ट्रेन लूटने के आरोप में सूली पर चढ़ाए गए इस नौजवान देशभक्त का नाम था अशफाक उल्ला खान.

पठान परिवार में पैदा हुआ अशफाक महज 20 साल की उम्र में आजादी की लड़ाई में कूद पड़ा था. पीएम मोदी ने वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने पर कहा कि अशफाक और बिस्मिल ने वंदे मातरम का नारा लगाते हुए फांसी का फंदा चूमा था.

हालांकि, जेल मैन्युअल और दूसरे ऐतिहासिक साक्ष्यों में इसका जिक्र नहीं है. पीएम मोदी के इस दावे पर कुछ लोग सहमत हैं तो कुछ साक्ष्य के आभाव में असहमत. अब इस घटना के करीब 99 साल बाद भारत सरकार वंदे मातरम को लेकर एक बड़ा फैसला लेने जा रही है.

दरअसल, 5 मई 2026 को पीएम मोदी के नेतृत्व में कैबिनेट की एक अहम बैठक हुई. इस बैठक में वंदे मातरम के लिए राष्ट्रगान जैसा ही प्रोटोकॉल लागू करने का फैसला हुआ. सरकार जल्द ही इसको लेकर संसद में एक संशोधन बिल लाकर नया नियम बनाने जा रही है.

ऐसे में एक बार फिर वंदे मातरम को लेकर नए सिरे से विवाद शुरू हो गया है. अब सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता और पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई के जरिए पूरे मामले को समझते हैं :

वंदे मातरम को लेकर क्या नियम बन रहे हैं और इसमें राज्यों की क्या भूमिका होगी?

सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता के मुताबिक, संविधान सभा में प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने 24 जनवरी 1950 को 'जन गण मन' को राष्ट्रगान और 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगीत की मान्यता देने के लिए संकल्प पेश किया था.

दिसंबर 2025 में वंदे मातरम के बारे संसद में आयोजित विशेष सत्र में कहा गया कि आजादी के पहले तुष्टीकरण की राजनीति की वजह से वंदे मातरम के कुछ छंदों के गान को रोक दिया गया था. उसके बाद मार्च 2025 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 'वंदे मातरम' के 6 छंदों के 3.1 मिनट में गायन के लिए सर्कुलर जारी किया था.

उसके अनुसार राष्ट्रीय पर्व, राष्ट्रपति और राज्यपाल से जुड़े कार्यक्रम आदि में राष्ट्रगान 'जन गण मन' के साथ राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' भी गाया जाएगा. स्कूलों में प्रार्थना के साथ भी इसे गाने की बात की गई थी. हालांकि, संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत शिक्षा समवर्ती सूची में है इसलिए स्कूलों में इस नियम को लागू करने के लिए राज्यों को भी जरूरी नियम बनाने होंगे.  

वंदे मातरम को लेकर मंत्रिमंडल के निर्णय से क्या बदलाव होंगे?

विराग गुप्ता बताते हैं कि केंद्रीय मंत्रिमडल ने वंदे मातरम को राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समान दर्जा देने के लिए 'राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम' की धारा 3 में बदलाव का निर्णय लिया है. संसद से कानून में बदलाव होने के बाद अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रगान में बाधा डालेगा या उसे रोकेगा तो उसे 3 साल तक की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.

दोबारा अपराध करने पर कम से कम 1 साल की सजा का प्रावधान होगा. हालांकि, संसद से कानूनी बदलाव के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि क्या इसका गायन सिनेमा हॉल आदि में भी जरुरी रहेगा. संसद से नया कानून बनने के बाद वंदे मातरम को धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के खिलाफ बताना राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान माना जा सकता है. ऐसी स्थिति में दोषी व्यक्ति को सजा हो सकती है.

क्या अब मुसलमानों समेत सभी नागरिकों के लिए वंदे मातरम का गाना अनिवार्य हो जाएगा?

सुप्रीम कोर्ट के वकील गुप्ता के मुताबिक, गृह मंत्रालय के सर्कुलर को कर्नाटक हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को रद्द करते हुए कहा था कि सरकार की एडवाइजरी स्वैच्छिक है और उसमें राष्ट्रगान को अनिवार्य नहीं बनाया गया है. हालांकि, कैबिनेट के फैसले के मुताबिक, संसद से कानून में बदलाव के बाद यह बाध्यकारी हो जाएगा. इसे संविधान के मौलिक अधिकारों के खिलाफ बताते हुए कुछ लोग अदालत में चुनौती दे सकते हैं.

कैबिनेट के फैसले या संसद से पारित कानून को अदालत में चुनौती मिली तो क्या होगा?

विराग बताते हैं कि बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के 1986 के फैसले के अनुसार अनुच्छेद 19 (1) (a) के तहत अभिव्यक्ति की आजादी में चुप रहने का अधिकार भी शामिल है.

पिछले मामलों में अनुच्छेद 25 में वर्णित अंतःकरण और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने नेगेटिव लिबर्टी के कांसेप्ट को मान्यता देते हुए राष्ट्रगान 'जन गण मन' को बाध्यकारी मानने से मना कर दिया था. जजों के अनुसार राष्ट्रगान को सम्मान देना जरूरी है, लेकिन इसे गाने को कानून रूप से जरूरी नहीं बनाया गया है.

मतलब यह हुआ कि वंदे मातरम को लेकर यह कानून बनता है तो इसके सम्मान में सबको खड़ा होकर आदर भाव जाहिर करना होगा. जिसे वंदे मातरम गाने की इच्छा नहीं है, वह बिना गाए भी सम्मान जाहिर कर सकते हैं.

क्या इसे अनिवार्य बनाने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ेगा?

सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग का कहना है कि 1971 के कानून के अनुसार राष्ट्रगान और उसके बाद अब राष्ट्रगीत दोनों के गाने के समय सम्मान करना जरूरी हो जाएगा. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के 1986 के फैसले के अनुसार किसी भी व्यक्ति को इन्हें गाने के लिए मजबूर करना मुश्किल होगा.

1976 में संविधान के 42वें संशोधन से नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों के प्रावधान को जोड़ा गया था. उसमें सिर्फ राष्ट्रगान यानी 'जन गण मन' का ही उल्लेख है. इसलिए राष्ट्रगान के समान राष्ट्रगीत के लिए नागरिकों की संवैधानिक जवाबदेही तय करने के लिए संसद से संविधान के अनुच्छेद 51 (A) (a) में भी संशोधन की जरूरत पड़ सकती है.

वंदे मातरम को लेकर मुस्लिम समुदाय की असहजता के बावजूद सरकार यह फैसला क्यों ले रही है?

पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई का कहना है कि वंदे मातरम को लेकर सरकार का फैसला, एक तरह से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है. इसमें कोई खर्चा नहीं होता, कोई मेहनत नहीं है लेकिन इसका फायदा ज्यादा है. आप जब चाहें शहरों के नाम बदल दीजिए. आप जब चाहें वंदे मातरम को लेकर नया नियम बना दीजिए. इससे बहुसंख्यक लोगों के बीच आपकी पैठ मजबूत हो जाती है. राजनीतिक दल अक्सर ऐसे संवेदनशील मुद्दे को पकड़ते हैं, जिससे उन्हें कम मेहनत में ज्यादा लाभ हो. इससे भले देश की अर्थव्यवस्था में कोई बदलाव नहीं आए, लेकिन भावनाओं के सहारे राजनीतिक दल चुनाव जीत लेते हैं.

मुस्लिम समुदाय को वंदे मातरम से क्या आपत्ति है और क्यों है?

1908 में वरिष्ठ बैरिस्टर सर सैयद अली इमाम ने पहली बार सार्वजनिक रूप से वंदे मातरम का विरोध किया और इसे गैर-इस्लामिक बताया. उन्होंने कहा, “जब मैं देखता हूं कि भारत 'वंदे मातरम' जैसे सांप्रदायिक नारे को राष्ट्रीय नारे के रूप में पेश कर रहा है, तो मेरा दिल निराशा से भर जाता है. इससे संदेह पैदा होता है कि राष्ट्रवाद की आड़ में हिंदू राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है.”

1920 में इस्लाम दर्शन पत्रिका ने वंदे मातरम को मूर्ति पूजा का एक रूप बताया था. रियात-ए-इस्लाम पत्रिका ने वंदे मातरम का उच्चारण करना गैर-इस्लामी करार दिया था. 1923 में, राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में भी इसका विरोध किया गया था. कांग्रेस अध्यक्ष मोहम्मद अली जौहर ने वंदे मातरम गाने से इनकार कर दिया और जैसे ही गाना शुरू हुआ, वे अपनी कुर्सी छोड़कर चले गए.

देखा जाए तो मुस्लिमों का वंदे मातरम को लेकर मुख्य तौर पर विरोध की दो वजह हैं. पहली यह कि इसमें हिंदू देवियों का जिक्र है. यह मूर्ति पूजा को बढ़ावा देता है, जो इस्लाम में स्वीकार्य नहीं है और धर्मनिरपेक्ष भी नहीं है. दूसरा यह कि कुछ मुस्लिम समुदाय के लोगों का कहना कि वंदे मातरम उपन्यास 'आनंदमठ' से इसे लिया गया है, जिसमें मुसलमानों को देश का दुश्मन बताया गया है.

मोदी सरकार के इस फैसले के पीछे मकसद क्या है?

पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई के मुताबिक, अभी सरकार इस तरह के फैसले लेकर विपक्ष को असहज करना चाहती है. सरकार नैरेटिव की लड़ाई जीतना चाहती है. विपक्ष अल्पसंख्यकों की राजनीति करता है, यह पॉलिटिकल नैरेटिव है. सरकार इस फैसले के जरिए इस नैरेटिव को मजबूत कर अपना फायदा हासिल करना चाहती है. सरकार इसके जरिए विपक्ष का इम्तिहान लेती है कि वह उस चक्रव्यूह में फंसे. ताकी BJP को यह कहने का मौका मिले कि विपक्ष मुस्लिमों के साथ है. अगर विपक्ष सरकार के समर्थन में होता है तो सरकार कहेगी कि देखिए विपक्षी पार्टियां आपकी सगी नहीं है. एक तरह से यह शह और मात का खेल है.

सरकार के इस फैसले से क्या बड़ा विवाद शुरू हो सकता है?

रशीद किदवई के मुताबिक समस्या वंदे मातरम को लेकर किसी नए कानून या नियम बनाने से नहीं है. दरअसल, वंदे मातरम को लेकर विभिन्न समुदायों में जो झिझक थी, उसको लेकर एक आम राय बनी थी. वह राय यह थी कि उसके पहले दो छंद गाए जाएंगे.

अगर ऐसा होता है तो इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं है. पूरे वंदे मातरम को लेकर व्यवहारिक तौर पर दो समस्याएं हैं- पहली कि यह काफी लंबा है. दूसरी - मूर्ति पूजा को नहीं मानने वाले लोग इसके बाकी हिस्से को मानने से इनकार करते हैं. देश के पहले शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद ने भी पहले दो छंद गाने का समर्थन किया था.

शिक्षाविद फीरोज बख्त अहमद ने अंग्रेजी अखबार के लिए अपने एक आर्टिकल में लिखा है, "1 जनवरी, 1952 को दिल्ली में एक प्रसिद्ध संगीतकार कृष्ण कुमार के जरिए गाए गए वंदे मातरम को सुनते हुए, मौलाना आजाद ने इसकी प्रशंसा करते हुए कहा कि यह सुंदर और प्रेरणादायक है." बख्त कहते हैं कि अब समय आ गया है कि तथाकथित मुस्लिम नेता वंदे मातरम के मुद्दे का राजनीतिकरण करना बंद कर दें.
 

Read more!