उड़ान 2.0 की घोषणा : क्या इस बार 'हवाई चप्पल' वाला सपना हकीकत बन पाएगा?
उड़ान योजना को विस्तार देते हुए केंद्र सरकार इसमें 28,840 करोड़ रुपए का निवेश करने जा रही है. इसके तहत 100 नए एयरपोर्ट और 200 आधुनिक हेलीपैड बनाने की योजना है

इस हफ्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने क्षेत्रीय हवाई संपर्क योजना-उड़ान (उड़े देश का आम नागरिक) को विस्तार देते हुए ‘संशोधित उड़ान’ को मंजूरी दी है. केंद्र सरकार की तरफ से इसे ही उड़ान 2.0 भी कहा जा रहा है.
इस योजना के तहत केंद्र सरकार ने कुल 28,840 करोड़ रुपए निवेश की योजना बनाई है. इस योजना को अगले दस साल यानी 2035-36 तक लागू किया जाएगा. नई उड़ान योजना के तहत 100 नए एयरपोर्ट और 200 आधुनिक हेलीपैड बनाए जाएंगे.
नई योजना के तहत एयरलाइंस को पांच साल तक सब्सिडी मिलेगी और छोटे एयरोड्रोम्स के संचालन-रखरखाव के लिए भी सीधे सरकारी बजट से मदद दी जाएगी.
मोदी सरकार इसे ‘टियर-2 और टियर-3 शहरों की हवाई क्रांति’ बता रही है. लेकिन सवाल यही है कि जब पुरानी उड़ान योजना के तहत बने नए एयरपोर्ट और रूट्स में से कई सारे बंद पड़े हैं, तो क्या नई योजना वाकई छोटे शहरों के लिए हवाई क्रांति लाने वाली साबित हो पाएगी?
2016 में जब उड़ान योजना की शुरुआत हुई, तो उस वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि उनका सपना है कि हवाई चप्पल पहनने वाला व्यक्ति भी हवाई यात्रा कर सके. इस योजना के तहत छोटे शहरों और दूरदराज के इलाकों को हवाई नेटवर्क से जोड़ने की कोशिश की गई. पिछली योजना में हवाई किराए को 2,500 रुपए प्रति घंटे तक सीमित रखने की बात भी कही गई थी. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2017 से अब तक 663 रूट्स ऑपरेशनलाइज्ड किए गए और उड़ान योजना के तहत 95 अनसर्व्ड/अंडरसर्व्ड एयरपोर्ट्स को दोबारा चालू किया गया. इससे करीब 1.6 करोड़ यात्री लाभान्वित हुए.
ये आंकड़े ऊपरी तौर पर तो यह दिखा रहे हैं कि योजना सफल रही, लेकिन हकीकत काफी अलग है. फरवरी 2026 में संसद में केंद्र सरकार द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, उड़ान योजना के तहत चालू किए गए 663 रूट में से 327 बंद हो चुके हैं. जिन 95 एयरपोर्ट को इस योजना के तहत शुरू किया गया था, उनमें से 15 अस्थाई रूप से नॉन-ऑपरेशनल हैं. 2023 में आई भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग की रिपोर्ट के मुताबिक सब्सिडी की तीन साल की अवधि खत्म होते ही अधिकांश रूट पर हवाई जहाजों का परिचालन बंद हो गया. सिर्फ 7-10 प्रतिशत रूट ही सब्सिडी खत्म होने के बाद भी टिक पाए.
कर्नाटक इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. दक्षिण भारत के इस राज्य में 42 रूट में से सिर्फ 11 चल रहे हैं. गुलबर्गा (कलबुरगी) से बेंगलुरु का रूट अक्टूबर 2025 में बंद हो गया. साथ ही जैसे ही सब्सिडी खत्म हुई, किराया 2,500 रुपए से बढ़कर 5,000 रुपए हो गया. उत्तर प्रदेश में सात नए एयरपोर्ट बने, जिनमें से छह कुशीनगर, अलीगढ़, आजमगढ़, चित्रकूट, श्रावस्ती और मुरादाबाद थोड़े ही दिनों में ‘घोस्ट एयरपोर्ट’ बन गए. फिलहाल सिर्फ अयोध्या का एयरपोर्ट चल रहा है.
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर सरकार की योजना जमीनी स्तर पर नाकाम क्यों हो रही है? इसका जवाब भी कैग की रिपोर्ट में मिलता है. रिपोर्ट के मुताबिक सब्सिडी खत्म होने के बाद किराया बढ़ जाता है. आमतौर पर टियर-3 शहरों में औद्योगिक गतिविधि, पर्यटन या व्यापार कम होने से बढ़े हुए किराए पर यात्रा करने के लिए यात्री नहीं पहुंचते. कई रूट पर लोड फैक्टर यानी यात्रियों की संख्या 50 प्रतिशत से नीचे रह जाती है.
कैग की रिपोर्ट में दूसरी वजह के तौर पर इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी को रेखांकित किया गया है. आमतौर पर नए एयरपोर्ट पर छोटे रनवे होते हैं और एयर ट्रैफिक कंट्रोल की सुविधा अपर्याप्त होती है. नेविगेशन में मदद करने वाले उपकरणों की कमी को भी कैग की रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है. ऐसे में कई एयरपोर्ट ऐसे हैं, जहां केवल दिन के उजाले में ही उड़ान की अनुमति है और वहां से रात की उड़ान नामुमकिन है.
इस पृष्ठभूमि में जिस उड़ान 2.0 योजना की घोषणा हुई है, जिसके तहत अगले 10 साल में 4 करोड़ अतिरिक्त यात्रियों को हवाई सफर का मौका देने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया है. केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कैबिनेट बैठक के बाद कहा, "यह योजना दूरदराज के इलाकों को मुख्यधारा से जोड़ेगी, पर्यटन-व्यापार बढ़ाएगी और संतुलित विकास सुनिश्चित करेगी."
सरकार का दावा है कि लंबी अवधि के लिए किया गया सब्सिडी प्रावधान, ऑपरेशंस और मेंटेनेंस में मदद और इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस करके नई योजना पुरानी गलतियों को सुधारने का काम करेगी. लेकिन विशेषज्ञ इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं हैं. नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) में वरिष्ठ पद पर काम करके रिटायर हुए एक अधिकारी कहते हैं, "पांच साल की सब्सिडी अच्छी है लेकिन उसके बाद क्या? अगर मांग पैदा नहीं हुई तो छठे साल फिर वही समस्या पैदा होगी. इंफ्रास्ट्रक्चर तो बन जाएगा, लेकिन ट्रेनिंग, स्टाफिंग और लोकल इकोनॉमिक एक्टिविटी पर भी उतना ही जोर देना होगा."
वे आगे कहते हैं, "नई योजना में चैलेंज मोड में एयरपोर्ट डेवलपमेंट अच्छा आइडिया है, लेकिन बिडिंग प्रक्रिया में पारदर्शिता और छोटी एयरलाइंस को प्राथमिकता देनी होगी. नहीं तो बड़े प्लेयर्स ही बाजी मार लेंगे. उम्मीद है कि सरकार पिछली गलतियों से सबक लेते हुए इस बार उड़ान योजना को सफल बनाने के लिए काम करेगी."