लोकसभा स्पीकर के फैसले पर टिका तृणमूल कांग्रेस का भविष्य
लोकसभा स्पीकर अलग-अलग दावों और एंटी-डिफेक्शन नियमों के आधार पर तय करेंगे कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के विद्रोही सांसदों को एक अलग गुट के रूप में मान्यता मिलेगी या उन्हें अयोग्य ठहरा दिया जाएगा

तृणमूल कांग्रेस (TMC) के करीब 20 लोकसभा सांसदों ने बगावत कर दी है. बारासात की सांसद काकोली घोष बागी गुट का नेतृत्व कर रही हैं.
विद्रोही लोकसभा सांसदों के एक समूह ने दावा किया है कि उन्होंने केंद्र में BJP के नेतृत्व वाली NDA (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) में औपचारिक रूप से शामिल होने का फैसला कर लिया है.
इसकी वजह से TMC के अस्तित्व पर संकट गहरा गया है. साथ ही संसद में संख्या, एंटी-डिफेक्शन नियम और ममता बनर्जी की पार्टी के भविष्य को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
विधानसभा चुनाव में BJP से बुरी हार के बाद TMC की संगठन और सांसदों के बीच नाराजगी लगातार बढ़ रही थी. फिर 8 जून को यह धमाका हुआ. उस दिन काकोली घोष ने घोषणा कर दी कि TMC के लगभग 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर NDA को समर्थन देने की इच्छा व्यक्त की है. बता दें कि TMC के लोकसभा में 28 और राज्यसभा में 12 सांसद हैं.
इस राजनीतिक घटना का समय बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की राजधानी में जब TMC सांसद BJP नेताओं से मिलकर समर्थन दे रहे थे तभी कुछ दूरी पर विपक्षी इंडिया ब्लॉक के नेताओं की बैठक हो रही थी. इस बैठक में ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी भी उपस्थित थे.
घोष ने कहा, “हमने जनता के फैसले को स्वीकार कर लिया है और हमारा मानना है कि हमारा भविष्य का राजनीतिक मार्ग NDA के अनुरूप होना चाहिए. मेरे साथ ही TMC के लगभग 20 सांसदों ने BJP के नेतृत्व वाले NDA को समर्थन देने का फैसला किया है.”
इस दावे के बाद तुरंत ही यह सवाल उठने लगे कि क्या बागी सांसदों के पास दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता से बचने के लिए आवश्यक संख्या बल है? क्या काकोली घोष के पास TMC की संसदीय संरचना के भीतर अभी भी कोई औपचारिक अधिकार है?
इस विवाद की जड़ में लोकसभा अध्यक्ष को भेजे गए दो परस्पर विरोधी पत्र हैं. 20 मई को ममता बनर्जी ने ओम बिरला को पत्र लिखकर कहा है कि वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी को तत्काल प्रभाव से लोकसभा में पार्टी का मुख्य सचेतक नियुक्त कर दिया गया है. पत्र में उन्होंने खुद को TMC की संस्थापक अध्यक्ष और संसदीय दल की अध्यक्ष बताया था.
हालांकि विद्रोही गुट का कहना है कि यह बदलाव लोकसभा सचिवालय की तरफ से प्रोसेस ही नहीं हुआ. ऐसे में आधिकारिक तौर काकोली घोष अभी भी पार्टी की चीफ व्हिप हैं. बागी सांसदों के करीबी सूत्रों का कहना है कि इससे उनकी दलील और मजबूत होती है कि उन्होंने NDA को समर्थन देने से पहले संसदीय नियमों का पालन किया और बाकी सांसदों से सलाह ली.
काकोली घोष ने खुद कहा कि उन्हें चीफ व्हिप पद से हटाना न तो वैध था और न ही प्रभावी. उन्होंने जोर देकर कहा, “अभी मैं लोकसभा में TMC की चीफ व्हिप ही बनी हुई हूं. भले ही पार्टी चेयरपर्सन ने मेरी जगह किसी और को नियुक्त करने की घोषणा कर दी हो लेकिन इससे रातोंरात संवैधानिक और संसदीय स्थिति नहीं बदल जाती.”
TMC का वरिष्ठ नेतृत्व इसे पूरी तरह खारिज कर रहा है. पार्टी सूत्रों का कहना है कि घोष का यह दावा कानूनी रूप से बहुत कमजोर है. उनका तर्क है कि असली फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ममता बनर्जी के पत्र को स्वीकार करते हैं या नहीं, जिसमें कल्याण बनर्जी को चीफ व्हिप बनाया गया है.
इस विवाद का कानूनी महत्व बहुत ज्यादा है. संविधान की 10वीं अनुसूची (एंटी-डिफेक्शन कानून) के मुताबिक, अगर किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरे गठबंधन या पार्टी में विलय (मर्ज) करना चाहें या कानूनी तरीके से अलग होना चाहें तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता.
TMC के लोकसभा में कुल 28 सांसद हैं. विद्रोही गुट के समर्थक दावा कर रहे हैं कि उन्होंने यह दो-तिहाई का आंकड़ा पार कर लिया है. यह विद्रोह एक दिन में नहीं उभरा था. चुनाव हारने के तुरंत बाद ही काकोली घोष ने पार्टी से दूरी बना ली थी. उन्होंने कई संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दे दिया, जिसमें अखिल भारतीय महिला तृणमूल कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष और बारासात जिला अध्यक्ष के पद शामिल थे. लोकसभा की सदस्यता बरकरार रखते हुए उन्होंने पार्टी के कामकाज की खुलकर आलोचना की और TMC के फैसलों में पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म I-PAC की भूमिका पर सवाल उठाए.
काकोली घोष ने पार्टी नेतृत्व पर आरोप लगाया कि उन्होंने पुराने और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को किनारे कर दिया है. उन्होंने कहा कि सलाहकारों (कंसल्टेंट्स) पर बहुत ज्यादा भरोसा करने से पार्टी की संगठनात्मक ताकत कमजोर हो गई है. उन्होंने भर्ती घोटाले (स्कूल टीचर्स की भर्ती) और राशन वितरण घोटाले जैसी भ्रष्टाचार की घटनाओं का भी जिक्र किया.
साथ ही बंगाल में महिलाओं की सुरक्षा मुद्दों को ठीक से निपटाने पर भी चिंता जताई. दरअसल मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की अध्यक्षता में हुई एक प्रशासनिक समीक्षा बैठक में उनके शामिल होने के बाद से ये अटकलें और तेज हो गईं थी कि वे TMC से पूरी तरह अलग होने की तैयारी कर रही हैं और हुआ भी ऐसा ही.
जब ममता बनर्जी ने काकोली घोष दस्तीदार को चीफ व्हिप पद से हटा दिया और उनकी जगह कल्याण बनर्जी को नियुक्त कर दिया तब तनाव और बढ़ गया. इसके जवाब में घोष ने स्पीकर ओम बिरला के पास शिकायत की और कल्याण पर आरोप लगाया कि वे संसद में महिला सांसदों के साथ बार-बार गाली-गलौज करते हैं और महिलाओं के प्रति अपमानजनक व्यवहार करते हैं.
कल्याण बनर्जी ने इन आरोपों से इनकार कर दिया. खबर है कि यह मामला लोकसभा की एथिक्स कमिटी ( नैतिकता समिति) को भेजा जा सकता है. TMC के लोकसभा सांसदों के विद्रोह के साथ ही पार्टी को दिल्ली में एक और बड़ा झटका लगा है. पिछले हफ्ते वरिष्ठ राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय TMC और राज्यसभा दोनों से इस्तीफा दे चुके हैं. उनका कार्यकाल 2029 तक था.
रॉय ने कहा, “मैंने राज्यसभा सभापति से मुलाकात की और अपना इस्तीफा सौंप दिया. मेरा कार्यकाल 2029 तक था लेकिन सिद्धांत के आधार पर मैंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया. अब मेरे लिए पार्टी में रहना मुश्किल हो गया था.” वहीं 10 जून को TMC नेता सुष्मिता देव ने भी राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा से मुलाकात के बाद उनके भी BJP में शामिल होने की अटकलें लग रही हैं.
इस बीच BJP के वरिष्ठ नेताओं जैसे- केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव, शुभेंदु अधिकारी और लोकसभा सांसद बिप्लब कुमार देब ने बागी TMC सांसदों के साथ चर्चा की. दिल्ली में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं. दिलचस्प बात यह है कि यह सब तब हुआ जब ममता बनर्जी खुद दिल्ली में थीं.
BJP और NDA के लिए बागी सांसदों का समर्थन संसद में उनकी स्थिति को और मजबूत करेगा जिससे विधयेकों को पास कराना आसान हो जाएगा. हालांकि TMC के लिए यह विद्रोह पार्टी के इतिहास में सबसे गंभीर संगठनात्मक और संसदीय संकट है.
अब लड़ाई सीधे संसद में आ गई है. लोकसभा स्पीकर के फैसले पर निर्भर करेगा कि वे प्रतिद्वंद्वी दावों, पत्रों और दल-बदल कानून को कैसे देखते हैं. इससे तय होगा कि बागी TMC सांसदों को एक अलग मान्यता प्राप्त गुट माना जाएगा या उन्हें अयोग्य ठहराने की कार्रवाई की जाएगी.
हालांकि, कानूनी सवालों से आगे एक बड़ी राजनीतिक सच्चाई यह है कि बंगाल विधानसभा चुनाव में TMC की हार के बाद शुरू हुआ अस्थिरता का दौर अब पार्टी के सांसदों तक पहुंच गया है. यह TMC जैसे भारत के सबसे प्रभावशाली क्षेत्रीय दलों में से एक के भविष्य को बदल सकता है और शायद बंगाल के भविष्य को भी.