टाइगर ग्लोबल केस : सुप्रीम कोर्ट के किस फैसले ने मॉरीशस और सिंगापुर के इन्वेस्टर्स को डरा दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने मॉरीशस की कंपनी टाइगर ग्लोबल के खिलाफ एक ऐसा फैसला दिया है जिससे उसे कैपिटल गेन टैक्स के तौर पर भारत सरकार को करीब 1.6 अरब डॉलर देने पड़ सकते हैं

सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने भारत के कंपनी जगत को हिला दिया है. फैसला यह है कि प्राइवेट इक्विटी फर्म टाइगर ग्लोबल ने 2018 में ई-कॉमर्स फर्म फ्लिपकार्ट में अपनी जो हिस्सेदारी अमेरिकी रिटेलर वॉलमार्ट को बेची थी, उस पर कैपिटल गेन टैक्स लगेगा.
इस आदेश ने अगस्त 2024 का दिल्ली हाई कोर्ट का वह फैसला पलट दिया है, जिसमें मॉरीशस की टाइगर ग्लोबल पर टैक्स की मांग खारिज कर दी गई थी. अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश का मतलब है कि टाइगर ग्लोबल को केंद्र सरकार को कैपिटल गेन्स टैक्स के तौर पर 14,500 करोड़ रुपये (लगभग 1.6 अरब डॉलर) देने होंगे. इस फैसले से आगे के लिए यह मिसाल कायम हो सकती है कि भारत बाहर के देशों में होने वाले सौदों में टैक्स के सिद्धांत किस तरह लागू करता है.
कैपिटल गेन्स या पूंजीगत लाभ किसी संपत्ति या निवेश को बेचने से होने वाला मुनाफा होता है. सुप्रीम कोर्ट का मानना था कि 2017 के बाद शेयरों की बिक्री से होने वाला पूंजीगत लाभ आयकर अधिनियम, 1961 के तहत कर योग्य है और इस पर भारत-मॉरीशस दोहरा कराधान टालने के समझौते (DTAA) के प्रावधान लागू होते हैं.
कोर्ट को यह देखना था कि क्या टाइगर ग्लोबल भारत-मॉरीशस DTAA के तहत कैपिटल गेन्स टैक्स में छूट का दावा कर सकती है या क्या मॉरीशस की कंपनियों ने सिर्फ 'फ्रंट एंटिटी' के तौर पर काम किया और जो आखिरकार अमेरिका से नियंत्रित हो रही थीं. अदालत ने पाया कि टाइगर ग्लोबल मामले में मॉरीशस का ढांचा सिर्फ भारत के कर दायरे से बचने के लिए था.
यह विवाद इसलिए उठा क्योंकि टाइगर ग्लोबल ने निवेश तब किया था जब भारत ने मॉरीशस के साथ संधि में संशोधन नहीं किया था. यह निवेश मॉरीशस के रास्ते हुआ था और संधि में संशोधन इसीलिए किया गया था कि कैपिटल गेन्स टैक्स में छूट से रोका जा सके. संशोधित कानून के तहत, भारतीय कर अधिकारी विदेशी निवेश के लिए चुने गए तौर-तरीके से आगे भी देख सकते हैं और इस कदम के पीछे की असली मंशा की जांच कर सकते हैं. इसमें कोई रहस्य नहीं है कि टाइगर ग्लोबल ने 2018 के इस सौदे से मोटा मुनाफा कमाया था.
2000 में, केंद्र सरकार ने साफ किया कि अगर मॉरीशस की कंपनी के पास टैक्स रेजिडेंसी सर्टिफिकेट (TRC) है तो उसे मॉरीशस निवासी माना जाएगा और उसे DTAA के फायदे मिलेंगे. यह आधार कई सौदों के लिए एक मानक बन गया, जिनसे भारत में भारी-भरकम निवेश हुआ.
2016 में, भारत ने भारत-मॉरीशस DTAA में बदलाव किया और आगे के लिए पूंजी लाभ कर की छूट को खत्म कर दिया. ध्रुव एडवाइजर्स के सीईओ दिनेश कनाबर ने एक मीडिया आलेख में कहा "लेकिन 1 अप्रैल, 2017 से पहले किए गए निवेशों के लिए स्पष्ट प्रावधान किया गया था, और ऐसे निवेशों से होने वाले मुनाफे पर पुरानी संधि ही लागू होती थी, जिसके तहत भारत में पूंजीगत लाभ पर कर नहीं लगता था."
इसी प्रावधान के तहत टाइगर ग्लोबल ने तर्क दिया कि 2018 में कमाए गए मुनाफे पर DTAA के तहत टैक्स नहीं लगाया जा सकता. एक 'ग्रैंडफादरिंग' प्रावधान (या क्लॉज) मौजूदा स्थितियों, लोगों या संपत्तियों को पुराने नियमों के तहत जारी रखने की इजाजत देता है.
अब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि TRC, निवास या संधि के फायदों के लिए हकदार होने का पक्का सबूत नहीं है. अदालत ने कहा कि टैक्स लगाने का भारत का सॉवरिन अधिकार किसी विदेशी सॉवरिन के पक्ष में इसलिए नहीं छोड़ा जा सकता कि किसी इकाई के पास दूसरे देश की ओर से जारी TRC है.
कनाबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ कानून की व्याख्या की है, बल्कि उस क्षेत्र में भी दखल दिया है कि टैक्स पॉलिसी कैसी होनी चाहिए. कोर्ट ने कहा कि कर संधियों में दुरुपयोग रोकने के मजबूत प्रावधान होने चाहिए, संधि के मामलों में जनरल एंटी-अवॉयडेंस रूल्स (GAAR) को लागू किया जाना चाहिए, और केंद्र सरकार जब संधियों पर बातचीत करे तो संधि के दुरुपयोग पर मुख्य रूप से बात करनी चाहिए.
कनाबर कहते हैं कि यहां बड़ा सवाल यह है कि क्या अदालत केंद्र सरकार के सोच-समझकर किए गए पुराने नीतिगत फैसले पर सवाल उठा सकती है. इस फैसले ने लंबे समय से चली आ रही उम्मीदों को ध्वस्त किया है और इससे भविष्य में निवेश पर असर पड़ सकता है.
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला पुरानी होल्डिंग्स से जुड़ी हर बड़ी निकासी-बिकवाली के लिए मुश्किलों का नया पिटारा खोल देगा. नांगिया ऐंड कंपनी एलएलपी के राकेश नांगिया और मनीष बावा कहते हैं कि अब मॉरीशस में बोर्ड मीटिंग करना या स्थानीय प्रशासनिक फीस देना ही काफी नहीं होगा. राजस्व विभाग यह जान सकता है कि होल्डिंग कंपनी के पास स्वतंत्र रूप से फैसला लेने का अधिकार है या नहीं, संधि वाले अधिकार क्षेत्र में कोई असली आर्थिक गतिविधि हो रही है या नहीं, और क्या गैर-संधि वाले अधिकार क्षेत्र में मूल कंपनी से वाकई फंड आ रहा है.
कानूनी फर्म बीटीजी अद्वय के कर प्रमुख अमित बैद कहते हैं, "अब तक DTAA के फायदों का दावा कैसे किया जाता रहा है, उसमें यह बहुत बड़ा, 180-डिग्री का बदलाव है और सुप्रीम कोर्ट ने इसे बरकरार रखा है कि अगर संधि में ग्रैंडफादरिंग के प्रावधान हैं तो उनमें GAAR के नियम लागू हो सकते हैं." कोर्ट ने स्पष्ट किया कि GAAR ऐसे किसी भी अरेंजमेंट पर लागू हो सकता है जहां 1 अप्रैल, 2017 को या उसके बाद 'टैक्स बेनिफिट' का दावा किया गया है. इस तरह अगर उसमें कमर्शियल हित की कमी है तो निवेश की कट-ऑफ तारीख और अरेंजमेंट कितना पुराना है, दोनों ही अप्रासंगिक हो जाते हैं.
बैद कहते हैं, "इस फैसले के मॉरीशस और सिंगापुर-आधारित इकाइयों का इस्तेमाल करने वाले प्राइवेट इक्विटी फंडों, हेज फंडों और एफपीआई (विदेशी पोर्टफोलियो निवेश) के लिए गंभीर नतीजे होंगे, इनमें 2017 से पहले के निवेश भी शामिल हैं. हालांकि इससे बंद मामले अपने आप नहीं खुल जाएंगे, लेकिन जहां कानून की इजाजत है, उन मामलों में फिर से आकलन की कार्यवाही में कर विभाग के हाथ काफी मजबूत हो जाएंगे."