राम बाई का दबदबा

मध्य प्रदेश विधानसभा की 27 सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव में अगर भाजपा नौ से कम सीटें जीतती है तो प्रदेश सरकार को सत्ता में बने रहने के लिए राम बाई का समर्थन बहुत महत्वपूर्ण हो जाएगा

पूछ बढ़ी बसपा विधायक राम बाई
पूछ बढ़ी बसपा विधायक राम बाई

वह मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड के बदनाम इलाकों से ताल्लुक रखती हैं. उनका परिवार कथित रूप से न केवल इस इलाके के मुनाफे वाले व्यवसायों को नियंत्रित करता है बल्कि राज्य में आधिकारिक ट्रांसफर पोस्टिंग पर भी उसका दबदबा है. सत्ता में चाहे कोई भी पार्टी हो, इस परिवार के विशेषाधिकार में रत्तीभर कमी नहीं आती. पथरिया की विधायक राम बाई की कमलनाथ की अगुवाई वाली पिछली कांग्रेस सरकार में जो धमक हुआ करती थी, भाजपा की नई-नवेली सरकार में भी वह बदस्तूर जारी है. बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की यह नेता राज्य में किसी भी सत्तारूढ़ सरकार के लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों हैं और हर सरकार उन्हें इतना महत्व क्यों देती है?

 
राम बाई के प्रभाव का एक कारण मध्य प्रदेश विधानसभा में दोनों मुख्य दलों के विधायकों की संख्या है. 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 114 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और उसने समाजवादी पार्टी (सपा) के एक विधायक, चार निर्दलीय और राम बाई सहित दो बसपा विधायकों के समर्थन से सरकार बनाई.


कमलनाथ सरकार को बचाए रखने के लिए अपनी अहमियत को भांपते हुए 40 साल की राम बाई ने जल्द ही मुखर होना शुरू कर दिया. अगर उनकी 'मांगें पूरी नहीं हुईं तो अधिकारियों को अंजाम भुगतने को तैयार रहने' की धमकी देते उनके वीडियो सामने आए. कमलनाथ सरकार ने उन्हें एक 'बी' टाइप बंगला आवंटित किया, जो आमतौर पर मंत्रियों और वरिष्ठ नौकरशाहों को आवंटित होता था. लेकिन राम बाई के लिए सबसे बड़ा कलंक तो अभी आना बाकी था.


15 मार्च, 2019 को, दमोह जिले के हटा शहर के एक व्यापारी और स्थानीय नेता देवेंद्र चौरसिया की कस्बे के बाहरी इलाके में स्थित उनके कोलतार संयंत्र में की हत्या कर दी गई. दमोह जिला पंचायत सदस्य ने हत्या से तीन दिन पहले ही बसपा को छोड़कर कांग्रेस का हाथ थामा था. राम बाई के पति गोविंद, उनके देवर चंदू, भतीजे गोलू और चचेरे भाई लोकेश उन सात लोगों में शामिल थे जिन पर हत्या के आरोप में मुकदमा दर्ज कराया गया. राम बाई इसे अपने खिलाफ सियासी साजिश करार देती हैं.


जांच शुरू हुई तो पुलिस ने मोबाइल टावर लोकेशन डेटा के आधार पर आरोप पत्र से गोविंद का नाम हटा दिया और कहा गया कि गोविंद के मोबाइल की लोकेशन हत्या वाले स्थान के आसपास नहीं थी. दो गवाहों ने भी बयान दिए कि गोविंद हत्या के समय कहीं और थे. राम बाई के आरोपी परिवार के सदस्य, जो फरार हो गए थे, ने बाद में समर्पण कर दिया. गोविंद और चंदू का लंबा आपराधिक रिकॉर्ड है—लगभग 50 मामले उनके खिलाफ दर्ज हैं. उन्हें ट्रिपल मर्डर केस में दोषी ठहराया गया था और उम्रकैद की सजा हुई थी. चौरसिया की हत्या के समय दोनों जमानत पर बाहर थे. राम बाई के खिलाफ भी धमकी देने, दंगा, जबरन कब्जा और चोट पहुंचाने के आरोप में मामले दर्ज हैं.


हत्या से एक महीने पहले, चौरसिया दमोह जिला पंचायत अध्यक्ष शिवचरण पटेल के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए थे. यह कथित रूप से स्थानीय राजनीति से प्रेरित था और कहा जाता है कि एक केंद्रीय मंत्री और क्षेत्र के एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने इसमें बहुत रुचि ली थी. राम बाई, जो पहले पंचायत की उपाध्यक्ष थीं, ने पटेल का समर्थन किया था. हालांकि अविश्वास प्रस्ताव तो गिर गया, लेकिन माना जाता है कि इससे राम बाई का परिवार उनसे बहुत नाराज हो गया था.


इस साल मार्च में, मध्य प्रदेश की सत्ता कांग्रेस के हाथ से सरकार भाजपा के पास चली गई. विधानसभा में भाजपा ने अपने 107 विधायकों के साथ, कांग्रेस के 25 विधायकों के इस्तीफा देने और दो विधायकों की मौत के कारण और 27 सीटें खाली होने के चलते बहुमत की सरकार बना ली है. लेकिन इससे राम बाई का दबदबा कम नहीं हुआ क्योंकि वे भी उन विधायकों में शामिल थीं जो मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार के खिलाफ तख्तापलट का हिस्सा थे.


मार्च की शुरुआत में, राम बाई को भाजपा विधायकों ने दिल्ली भेजा और गुरुग्राम के एक होटल में ठहराया. तत्कालीन कांग्रेसी मंत्रियों जयवर्धन सिंह और जीतू पटवारी उन्हें भोपाल लेकर आए और उसके वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हुए थे. राम बाई ने तब भाजपा का समर्थन करने की बात से इनकार किया था और कहा था कि वे अपनी बेटी से मिलने दिल्ली गई थीं. जब सरकार अंतत: गिर गई तो उन्होंने भाजपा के लिए समर्थन की घोषणा की और दावा किया कि उनसे मंत्री पद का वादा किया गया था. हालांकि, उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया पर राम बाई ने जून में राज्यसभा चुनावों में भाजपा उम्मीदवारों के लिए मतदान किया.


भाजपा भले ही विधानसभा में बहुत आरामदायक स्थिति में है फिर भी उसने राम बाई को अपने साथ खुश रखना जारी रखा है. और ऐसा क्यों है, इसे समझिए. हालांकि भाजपा के पास 107 सीटें हैं और कांग्रेस के विधायक लगातार इस्तीफे दे रहे हैं, लेकिन भगवा पार्टी 27 विधानसभा सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव तक बहुत फूंक-फूंककर कदम रख रही है. भाजपा को सत्ता में बने रहने के लिए इनमें से कम से कम नौ सीटें जीतने की जरूरत है. हालांकि कांग्रेस को सत्ता में लौटने और अपने दम पर सरकार बनाने के लिए सभी 27 सीटें जीतनी होंगी.


हालांकि, एक तीसरा परिदृश्य भी है. अगर भाजपा नौ सीटों से कम और कांग्रेस 18 से अधिक सीटें जीत जाती है तो उसे सात विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होगी. यह समर्थन निर्दलीय, बसपा और सपा के विधायकों से आएगा. ऐसे में सत्ता में बने रहने के लिए राम बाई का समर्थन अहम होगा. अगर भाजपा नौ से अधिक सीटें जीत जाती है और  आरामदायक बहुमत के साथ सरकार बनाती है तो राम बाई की अच्छी किस्मत पर ग्रहण लग सकता है.


बसपा विधायक को हाल ही में तब एक अप्रत्याशित चुनौती का सामना करना पड़ा जब दमोह के एक भाजपा नेता और राज्य के पूर्व वित्त मंत्री जयंत मलैया के बेटे सिद्धार्थ मलैया ने चौरसिया हत्या मामले में उनके खिलाफ बोला. उन्होंने चौरसिया के बेटे सोमेश के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और हटा में एक बंद का आह्वान किया जो सफल रहा.


फिर, जून में, चौरसिया हत्या के मामले में एक नया मोड़ आ गया. अनुसूचित जाति समुदाय से आने वाले एक युवा कमल अहिरवार ने चौरसिया परिवार के सदस्यों पर आरोप लगाया कि दोनों परिवारों के बीच कथित संपत्ति विवाद के कारण उन्हें जान से मारने की कोशिश की गई है. मामले में मृत व्यवसायी के परिवार के चार सदस्यों पर मुकदमा दर्ज किया गया था. दिलचस्प बात यह है कि चौरसिया हत्या मामले में अहिरवार की मां विद्या रानी, गवाहों में से एक थीं. उनके बयान के आधार पर ही पुलिस ने यह निष्कर्ष निकाला था कि राम बाई के पति उस स्थान पर नहीं थे जहां चौरसिया की हत्या हुई थी.


शायद, यह संकेत है कि राज्य में सरकार बदलने के बाद भी राम बाई का इलाके में वर्चस्व तनिक भी कम नहीं हुआ है क्योंकि दमोह पुलिस ने अपनी जांच में अहिरवार परिवार और गोविंद के बीच एक संभावित लिंक को देखने से इनकार कर दिया. पुलिस ने अहिरवार की शिकायत में नामित आरोपियों पर समर्पण की खातिर दबाव बनाने के लिए चौरसिया परिवार के दो रिश्तेदारों को भी हिरासत में लिया था. बाद में उन्हें छोड़ दिया गया. 13 अगस्त को, चौरसिया परिवार के लिए राहत की खबर तब आई जब मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने दमोह पुलिस को आदेश दिया कि अगली सुनवाई तक उनके खिलाफ कोई भी कार्रवाई न की जाए.

चौरसिया के बेटे सोमेश ने आरोप लगाया, ''मेरे परिवार के सदस्यों के खिलाफ हत्या और एससी/एसटी अत्याचार अधिनियम के तहत मुकदमे इसलिए दर्ज कराए गए हैं ताकि हम अपने पिता की हत्या के मामले की जांच को आगे न बढाएं. हमने दमोह पुलिस की ओर से दर्ज किए गए हत्या के इस मामले से राम बाई के पति गोविंद का नाम हटा देने के खिलाफ दमोह के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में एक मुकदमा दायर किया है. हमें इसमें फैसले का इंतजार है.''


राम बाई का दावा है कि यह सब एक राजनैतिक साजिश का हिस्सा है. अपने बचाव में वे कहती हैं, ''देवेंद्र चौरसिया मामला अदालत में विचाराधीन है, इसलिए मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहूंगी. चौरसिया पिछले कुछ समय से अस्वस्थ थे. चौरसिया परिवार ने मामले में 30 लोगों का नाम लिया है. लेकिन अब तक कोई हथियार नहीं मिला है जिससे चौरसिया की हत्या की गई हो.'' उन्होंने जयंत मलैया पर भी निशाना साधा. वे कहती हैं, ''मुझे पता है कि जो कुछ भी हो रहा वह सब जयंत मलैया की शह पर हो रहा है. लेकिन मुझे ईश्वर की अदालत पर विश्वास है और जानती हूं कि अंतत: मुझे न्याय मिलेगा.''

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