टाटा ट्रस्ट पर कंट्रोल के लिए फिर बढ़ रही खींचतान
पिछले साल अक्टूबर में टाटा ट्रस्ट के एक ट्रस्ट से गैर-पारसी सदस्यों को हटाए जाने के बाद ट्रस्टियों के बीच सत्ता संघर्ष शुरू हुआ जो अब थमने का नाम नहीं ले रहा है

133 साल पुराने टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टियों के बीच चल रही रस्साकशी फिलहाल थमती नहीं दिख रही. टाटा ग्रुप की मुख्य कंपनी टाटा संस में 66 फीसद हिस्सेदारी रखने वाली इस संस्था में पिछले अक्टूबर में ट्रस्टियों के बीच कुछ मतभेद शुरू हुए थे.
मुख्य रूप से बोर्ड में नियुक्तियों और टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर चले ये मतभेद अब नियंत्रण की बुरी लड़ाई में बदल गए हैं. ताजा घटनाक्रम यह है कि टाटा ट्रस्ट के अंतर्गत आने वाले एक ट्रस्ट- बाई हीराबाई जमशेदजी टाटा नवसारी चैरिटेबल इंस्टीट्यूशन से दोनों गैर-पारसी उपाध्यक्षों को हटाने की कोशिश की जा रही है.
टीवीएस ग्रुप के चेयरमैन वेणु श्रीनिवासन तो पहले ही ट्रस्टी पद से इस्तीफा दे चुके हैं, लेकिन दूसरे ट्रस्टी और पूर्व रक्षा सचिव विजय सिंह ने अभी इस्तीफा नहीं दिया है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों को टाटा ट्रस्ट के सीईओ सिद्धार्थ शर्मा ने इस्तीफा देने को कहा था.
बाई हीराबाई ट्रस्ट की स्थापना दिसंबर 1923 में हुई थी. यह सर रतन टाटा ट्रस्ट एंड एलाइड ट्रस्ट का हिस्सा है, जो टाटा ट्रस्ट के अंतर्गत आने वाले दो मुख्य ट्रस्टों में से एक है. दूसरा मुख्य ट्रस्ट सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट एंड एलाइड ट्रस्ट है. बाई हिराबाई ट्रस्ट के ट्रस्टियों के मौजूदा बोर्ड में शामिल हैं: नोएल टाटा (जो टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन भी हैं), विजय सिंह, जिमी एन. टाटा, जहांगीर एच.सी. जहांगीर और डेरियस खंबाटा.
श्रीनिवासन ने आरोप लगाया है कि उनका इस्तीफा तथ्यों को छिपाकर लिया गया और यह धोखे का काम था. एक मीडिया इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि टाटा ट्रस्ट ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एम.एच. कानिया की एक महत्वपूर्ण कानूनी राय छिपा ली थी. स्वर्गीय रतन टाटा ने साल 2000 में पूर्व मुख्य न्यायाधीश एम.एच. कानिया से बाई हिराबाई ट्रस्ट की बोर्ड में गैर-जोरोस्ट्रियन (गैर-पारसी) लोगों की नियुक्ति के बारे में राय मांगी थी.
रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व मुख्य न्यायाधीश एम.एच. कानिया ने अपनी राय में साफ लिखा था कि बोर्ड में गैर-पारसी लोगों को रखने पर कोई रोक नहीं है. वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह को हटाने की यह कार्रवाई पूर्व ट्रस्टी मेहली मिस्त्री की याचिका के बाद हुई. मिस्त्री ने महाराष्ट्र के चैरिटी कमिश्नर से जांच की मांग की थी और आरोप लगाया था कि श्रीनिवासन और सिंह दोनों ही अपने पद के लिए योग्यता की शर्तें पूरी नहीं करते थे.
न्यायमूर्ति कानिया की 2000 की राय में साफ कहा गया था कि अन्य समुदायों के लोगों को ट्रस्टी बनाने पर कोई पाबंदी नहीं है. हालांकि, पहले लंबे समय तक केवल पारसी ही ट्रस्टी बनते थे. कानिया ने अपनी राय में यह भी लिखा था कि “वसीयत और कोडिसिल (वसीयत के पूरक) के तहत व्यक्तिगत दान को छोड़कर, अधिकांश दान किसी खास समुदाय या वर्ग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सभी समुदायों के लाभ के लिए हैं.”
अक्टूबर 2025 में मेहली मिस्त्री ने टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा पर सवाल उठाते हुए 77 वर्षीय विजय सिंह की टाटा संस बोर्ड में दोबारा नियुक्ति पर आपत्ति जताई थी. टाटा ट्रस्ट को टाटा संस बोर्ड में एक-तिहाई डायरेक्टर्स की नियुक्ति का अधिकार है. टाटा संस बोर्ड में नॉमिनी डायरेक्टर बनना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इन डायरेक्टर्स को आर्टिकल 121 के तहत महत्वपूर्ण फैसलों पर वीटो (रोकने) का अधिकार होता है.
हालांकि, बाद में मेहिल मिस्त्री को टाटा के प्रमुख ट्रस्टों के बोर्ड से बाहर कर दिया गया था. नोएल टाटा, श्रीनिवासन और सिंह के गुट ने सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट के बोर्ड में मिस्त्री की पुनर्नियुक्ति के खिलाफ मतदान किया. इसके बाद रतन टाटा के करीबी रहे मेहली मिस्री ने टाटा ट्रस्ट के तीन ट्रस्टों से इस्तीफा दे दिया. ऐसे में अब श्रीनिवासन और सिंह से बदला लेने की बारी मिस्त्री की थी, जिसके लिए उन्होंने कानूनी कोशिश शुरू कर दी.