नंदीग्राम से रायटर्स बिल्डिंग तक : कहानी शुभेंदु अधिकारी की

शुभेंदु अधिकारी ने बंगाल की राजनीति को बहुत करीब से देखा, समझा और फिर उसी राजनीति की दिशा बदल दी

Suvendu Adhikari
शुभेंदु अधिकारी कभी पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सबसे खास सिपहसालार थे

पश्चिम बंगाल की हवा में इतिहास के करवट लेने की आहट सुनाई दे रही है. लाल से लेकर नीले-सफेद झंडों तक का सफर देख चुके बंगाल ने अब भगवा रंग को भी सत्ता की चौखट तक पहुंचते देख लिया है. और इस पूरे राजनीतिक महाकाव्य के केंद्र में खड़े हैं, शुभेंदु अधिकारी.

जिस जमीन पर कभी ममता बनर्जी उन्हें अपना सबसे भरोसेमंद सेनापति मानती थीं, उसी जमीन से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उनके नाम का ऐलान पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री के रूप में किया. राजनीति कभी-कभी इतनी नाटकीय हो जाती है कि वह किसी उपन्यास की तरह लगने लगती है. किरदार वही रहते हैं, उनके पक्ष बदल जाते हैं.

शुभेंदु अधिकारी कोई अचानक उभरे नेता नहीं हैं. यह कहानी उस राजनेता की है जिसने बंगाल की राजनीति को बहुत करीब से देखा, समझा और फिर उसी राजनीति की दिशा बदल दी. ईस्ट मेदिनीपुर के कांथी की गलियों से निकलकर सत्ता के शिखर तक पहुंचने वाले इस नेता के पिता शिशिर अधिकारी तीन बार सांसद रहे और यूपीए-2 सरकार में ग्रामीण विकास राज्यमंत्री भी रहे. शुभेंदु ने कांग्रेस से अपना करियर शुरू किया, कांथी के काउंसिलर बने और 1998 में तृणमूल का दामन थामा.

लेकिन असली कहानी शुरू होती है साल 2007 से. नंदीग्राम की धरती आक्रोशित नारों और विरोध की आवाजों से गूंज रही थी. वाममोर्चा सरकार के प्रस्तावित केमिकल हब के खिलाफ ग्रामीणों का आंदोलन धीरे-धीरे जनविद्रोह में बदल रहा था. उसी दौर में शुभेंदु अधिकारी गांव-गांव घूमकर लोगों को संगठित कर रहे थे. राजनीतिक विश्लेषक आज भी मानते हैं कि नंदीग्राम आंदोलन सिर्फ ममता बनर्जी की राजनीतिक वापसी का आधार नहीं था बल्कि शुभेंदु अधिकारी के राजनीतिक व्यक्तित्व का जन्म भी वहीं हुआ था.

शुभेंदु के मुख्यमंत्री चुने जाने के मौके पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह

जिस आंदोलन ने वामपंथ की तीन दशक पुरानी सत्ता को गिराया, उसी आंदोलन ने शुभेंदु को बंगाल की राजनीति का अपरिहार्य चेहरा बना दिया. तृणमूल कांग्रेस के भीतर उनका कद लगातार बढ़ता गया. वे विधायक बने, सांसद बने और फिर मंत्री बने. धीरे-धीरे उन्हें ममता बनर्जी सरकार में 'नंबर दो' कहा जाने लगा. लेकिन सत्ता के गलियारों में सिर्फ कद नहीं, समीकरण भी बदलते रहते हैं. अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव और पार्टी के भीतर बदलती प्राथमिकताओं ने शुभेंदु को धीरे-धीरे उस जगह ला खड़ा किया, जहां उन्हें लगने लगा कि उनके राजनीतिक कद को कम किया जा रहा है.

फिर आया दिसंबर 2020. बंगाल की राजनीति में यह महीना किसी भूकंप से कम नहीं था. शुभेंदु अधिकारी ने बीजेपी का दामन थाम लिया. बहुत लोगों ने इसे अवसरवाद कहा तो बहुतों ने महत्वाकांक्षा. विरोधियों ने आरोप लगाए कि केंद्रीय एजेंसियों के दबाव से बचने के लिए उन्होंने पाला बदला. लेकिन राजनीति में आखिरकार वही कथा बचती है जो जनता के बीच असर छोड़ जाती है.

2021 का विधानसभा चुनाव बंगाल के इतिहास के सबसे आक्रामक चुनावों में गिना गया. हर सभा युद्धभूमि लगती थी और हर नारा किसी राजनीतिक शंखनाद की तरह सुनाई देता था. इस चुनाव का सबसे बड़ा प्रतीक नंदीग्राम सीट बन गई थी. एक तरफ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी थीं, तो दूसरी तरफ उनके कभी सबसे भरोसेमंद सहयोगी रहे शुभेंदु अधिकारी. यह सिर्फ दो नेताओं की लड़ाई नहीं थी, विश्वास और विद्रोह की भी लड़ाई थी.

जब नतीजे आए तो बंगाल ने देखा कि नंदीग्राम ने अपनी बेटी नहीं बल्कि अपने बागी बेटे को चुना है. शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हरा दिया. भले ही बीजेपी तब सत्ता तक नहीं पहुंच सकी, लेकिन तीन सीटों से 77 सीटों तक पहुंचना बंगाल में उसके लिए ऐतिहासिक छलांग थी. उस छलांग के सबसे बड़े शिल्पकार शुभेंदु ही माने गए.

उसके बाद के पांच वर्षों में उन्होंने विपक्ष के नेता के तौर पर खुद को लगातार सक्रिय रखा. जंगलमहल, मेदिनीपुर, पुरुलिया, बांकुड़ा... वे इलाके जो कभी तृणमूल का अभेद्य गढ़ माने जाते थे, वहां शुभेंदु ने बीजेपी के लिए जमीन तैयार की. राजनीति आक्रामक थी लेकिन बेहद संगठित. बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व, खासकर अमित शाह का भरोसा उन पर लगातार बढ़ता गया.

और अब 2026 में, पंद्रह वर्षों तक बंगाल की सत्ता पर काबिज रहीं ममता बनर्जी की सरकार हार चुकी है. बीजेपी ने 207 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया है. शुभेंदु ने ममता को लगातार दूसरी बार हराया है. भवानीपुर सीट पर इस बार जीत का अंतर 15,105 वोट रहा. नंदीग्राम सीट पर तृणमूल कांग्रेस की पवित्रा कर को उन्होंने 9,665 वोटों से हराया. वही शुभेंदु जिन्होंने नंदीग्राम आंदोलन में ममता के लिए जमीन तैयार की थी, उन्होंने उसी जमीन को ममता के पैरों के नीचे से खींच लिया.

कोलकाता में अमित शाह जब मंच से यह घोषणा कर रहे थे कि शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल बीजेपी विधायक दल के नेता चुने गए हैं तो यह बंगाल की राजनीति में एक युगारंभ और एक युगांत की घोषणा की तरह थी.

राजनीति का यह चक्र कितना विचित्र है. कभी जो सेनापति था, वही आज राजा बनकर उभरा है. कभी सारदा चिट फंड में जिस व्यक्ति से सीबीआई ने पूछताछ की थी, अब वही सबकुछ तय करेगा.

सबकी निगाह अब इस बात पर टिकी है कि मुख्यमंत्री के रूप में शुभेंदु अधिकारी बंगाल को किस दिशा में ले जाते हैं. क्या वे बीजेपी के वैचारिक एजेंडे को बंगाल की सांस्कृतिक आत्मा के साथ संतुलित कर पाएंगे? क्या वे उस राज्य में स्थिरता ला पाएंगे जहां दशकों से राजनीति संघर्ष और टकराव की जमीन रही है? 

सवाल बहुतेरे हैं लेकिन तमाम सवालों से पहले बनता हुआ इतिहास फिलहाल केवल एक दृश्य दर्ज कर रहा है, नंदीग्राम की धूल भरी पगडंडियों से चलकर एक नेता रायटर्स बिल्डिंग और नबन्ना की सत्ता तक पहुंच चुका है. बंगाल की राजनीति जो कभी ममता बनर्जी के नाम से शुरू होकर उन्हीं पर खत्म होती थी, अब एक नए नाम के साथ नया अध्याय लिख रही है - शुभेंदु अधिकारी.

Read more!