उमर खालिद की जमानत पर सुप्रीम कोर्ट की दो बेंचों की राय अलग-अलग क्यों हैं?

उमर खालिद की लंबी हिरासत के बाद UAPA में जमानत को लेकर सुप्रीम कोर्ट की दो बेंचों की अलग-अलग राय ने न्यायिक विरोधाभास को सामने ला दिया है

उमर खालिद  (फाइल फोटो)
उमर खालिद (फाइल फोटो)

19 मई को कड़कड़डूमा स्थित ट्रायल कोर्ट ने उमर खालिद को 15 दिन की अंतरिम जमानत देने से  इनकार कर दिया. इससे एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि UAPA (अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट) के तहत 'जमानत नियम है और जेल अपवाद.’

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुयान की दो-जज वाली बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के उस पुराने आदेश की आलोचना की, जिसमें उमर खालिद की जमानत अर्जी खारिज की गई थी. इस बेंच ने अपना तर्क 2021 के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम के.ए. नजीब वाले फैसले के आधार पर दिया.

इस केस में सुप्रीम कोर्ट की दो बेंचों के अलग-अलग बयानों से भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है. दिल्ली पुलिस भी दुविधा में है. इतनी कि उसने सुप्रीम कोर्ट से इस पूरे मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेजने की अपील कर दी है. सुप्रीम कोर्ट के ही समान रैंक की दो बेंचें एक-दूसरे के विपरीत फैसले सुना रही हैं.

ऐसे में पुलिस यह जानना चाहती है कि आखिर कानून क्या है? फरवरी 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के विरोध प्रदर्शनों के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा भड़क उठी थी.

इस घटना में 53 लोगों की मौत हो गई और 700 से अधिक लोग घायल हो गए. उसी वर्ष सितंबर में दिल्ली पुलिस ने उमर खालिद (तब उनकी उम्र 33 वर्ष थी) को साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया. उन पर UAPA और दंड संहिता के तहत मामला दर्ज किया गया. उन्हें हिंसा के कथित मुख्य साजिशकर्ताओं में से एक माना गया था.

खालिद तब से तिहाड़ जेल में हैं. मुकदमे की सुनवाई अभी तक ठीक से शुरू भी नहीं हुई है. निचली अदालत ने उन्हें नियमित जमानत देने से इनकार कर दिया था. 18 अक्टूबर 2022 को दिल्ली हाई कोर्ट ने भी उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी और कहा कि वे सह-आरोपियों के साथ लगातार संपर्क में थे, उन पर लगे आरोप प्रथम दृष्टया सही पाए गए और उनके कथित काम 'आतंकवाद' की श्रेणी में आते हैं.

खालिद ने 2023 में इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में उठाया, जहां इसे 10 से ज्यादा बार टाल दिया गया. एक जज ने खुद को मामले से अलग कर लिया और अंत में खालिद ने फरवरी 2024 में बदली हुई परिस्थितियों का हवाला देते हुए याचिका वापस ले ली, ताकि वे निचली अदालत में फिर से अपनी किस्मत आजमा सकें.

उमर खालिद को अब तक केवल थोड़े समय के लिए सशर्त अंतरिम जमानत मिली है. 2022 में अपनी बहन की शादी के मौके पर उन्हें एक हफ्ते की जमानत मिली थी, जिसमें मीडिया से बात करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था.

2024 में परिवार की एक शादी के लिए उन्हें 7 दिन की अंतरिम जमानत मिली. 2025 में भी अपनी बहन की शादी के लिए उन्हें लगभग 14 दिन की अंतरिम जमानत दी गई. हर बार उन्होंने समय पर जेल में सरेंडर कर दिया.  

5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने खालिद की जमानत याचिका फिर से ठुकरा दी. कोर्ट ने कहा कि दंगों की योजना और भड़काने में उनकी कथित भूमिका UAPA के तहत जमानत न देने लायक है लेकिन उसी बेंच ने पांच अन्य आरोपियों को जमानत दे दी.

खालिद को एक साल बाद फिर कोशिश करने को कहा गया. खालिद का केस अब UAPA जमानत पर हर चर्चा का मुख्य उदाहरण बन गया है. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने कहा कि दोषी ठहराए जाने से पहले जमानत एक अधिकार है और अगर ट्रायल जल्दी नहीं हो सकता तो जमानत दे ही देनी चाहिए.

UAPA में जमानत इसलिए इतनी मुश्किल है क्योंकि सेक्शन 43D(5) कहता है कि अगर आरोप पहली नजर में सही लगें तो जमानत नहीं दी जा सकती. साधारण कानून में आरोपी को बेगुनाह माना जाता है और जमानत आसानी से मिल जाती है. वहीं, UAPA में उलटा है. आरोपी को ट्रायल से पहले ही पुलिस के केस को गलत साबित करना पड़ता है, जो बहुत मुश्किल है. 2019 के वटाली फैसले ने इसे और सख्त कर दिया. कोर्ट ने कहा कि जज पुलिस के कागजात को ज्यादातर सही मान ले और जमानत न दे. इसके बाद UAPA मामलों में जमानत मिलना दुर्लभ हो गया.

फिर 2021 में के.ए. नजीब का फैसला आया. तीन जजों की बेंच ने कहा. “UAPA का सेक्शन 43D(5) लागू होने पर भी अगर कोई व्यक्ति बहुत लंबे समय से जेल में है और मुकदमा जल्दी शुरू नहीं हो रहा, तो जमानत दी जा सकती है. यह संविधान के अनुच्छेद 21 का अधिकार है.”

UAPA जमानत रोकता है लेकिन संविधान व्यक्ति की आजादी की रक्षा करता है. वटाली और नजीब के मामले में कोई विरोध नहीं है लेकिन जज को तय करना पड़ता है कि वह किस नजरिए से मामला देखेगा.

जनवरी 2026 की बेंच (जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया) ने वटाली वाले नजरिये से इस केस को देखा था. उन्होंने UAPA के सख्त कानूनी प्रावधान को लागू करते हुए उमर खालिद और शरजील इमाम दोनों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं. चार महीने बाद, 18 मई की बेंच ने नजीब वाले नजरिए को अपनाया.  

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुयान की इस बेंच ने जम्मू-कश्मीर के सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत दे दी. अंद्राबी NIA के नार्को-टेरर मामले में लगभग छह साल जेल में थे और उनका मुकदमा अभी तक शुरू भी नहीं हुआ था. इस बेंच ने दोहराया कि UAPA में भी जमानत नियम है, जेल अपवाद. कोर्ट ने साफ कहा कि सेक्शन 43D(5) संविधान के अनुच्छेद 21 को नहीं मिटा सकता. साथ ही यह भी कहा कि जितने गंभीर आरोप हों मुकदमा उतना ही तेज चलना चाहिए.

जस्टिस भुयान ने लिखा कि छोटी बेंच बड़ी बेंच के फैसले से बंधी होती है. वह बड़े बेंच के जरिए तय किए गए कानून को कमजोर या अनदेखा नहीं कर सकती. अगर किसी पुराने फैसले पर सच में संदेह हो तो न्यायिक अनुशासन कहता है कि उसे ऊपर (बड़ी बेंच) को रेफर कर दिया जाए, न कि चुपके से उसमें किसी तरह से कोई समझौता किया जाए.

उन्होंने जनवरी 2026 वाले फैसले और 2024 के गुरविंदर सिंह वाले फैसले का जिक्र किया. इस मामले में कोर्ट ने तीन-जजों वाले नजीब के फैसले से हटकर एक अलग रास्ता अपनाया था. दिलचस्प बात यह कि दोनों फैसले जस्टिस अरविंद कुमार के जरिए ही लिखे गए थे.

18 मई के आदेश में सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत दी गई थी, उमर खालिद को नहीं. इस बेंच ने खालिद को जेल में रखने वाले तर्क की आलोचना तो की लेकिन बराबर रैंक की बेंच होने के कारण उस फैसले को पलट नहीं सकती थी. 19 मई को खालिद की जो याचिका खारिज हुई, वह नियमित जमानत की नहीं थी. वह मात्र 15 दिन की अंतरिम जमानत (emergency relief) की थी. अपनी मां की सर्जरी के बाद उनकी देखभाल करने और एक चाचा की चालीसवीं (चहल्लुम) में शामिल होने के लिए, खालिद ने कोर्ट से यह अपील की थी.

दिल्ली के कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बाजपेयी खालिद की इस याचिका से प्रभावित नहीं हुए. उन्होंने तर्क दिया कि चाचा नजदीकी रिश्तेदार नहीं थे. अगर रिश्ता इतना करीबी होता तो खालिद चाचा की मौत के समय ही जमानत मांगते न कि हफ्तों बाद.

मां की सर्जरी भी मामूली थी. सिर्फ गांठ निकालने की. 71 वर्षीय पिता और पांच बहनें उनकी देखभाल आसानी से कर सकती हैं, भले ही वे कहीं और रहती हों. ऐसे में कोर्ट ने कहा कि ये कारण उचित नहीं लगते, इसलिए जमानत नहीं मिल सकती.

ट्रायल कोर्ट के जज आमतौर पर उस व्यक्ति को जमानत देने से हिचकते हैं, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अभी-अभी जमानत देने से इनकार किया हो. खासकर जब सुप्रीम कोर्ट ने खुद कहा हो कि एक साल बाद फिर आना. इस पूरे विवादित मामले में दिल्ली पुलिस सबसे ज्यादा भ्रम में है. पुलिस चाहती है कि सुप्रीम कोर्ट इस पूरे विवाद का जल्द अंत कर दे.

सुप्रीम कोर्ट की समान रैंक वाली दो-दो जजों की बेंचें अब एक ही कानून (UAPA) पर विपरीत दिशा में खींच रही हैं. दिल्ली दंगे की साजिश मामले में दो अन्य आरोपियों तसलीम अहमद और खालिद सैफी की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच के सामने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने कहा कि इस मतभेद को एक बड़ी बेंच को सौंप दिया जाए ताकि कानून को एक बार और हमेशा के लिए साफ कर दिया जाए.

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