'संचार साथी' साइबर सिक्योरिटी तो देता है लेकिन क्या यह ऐप निगरानी का जरिया भी बन सकता है?
संचार साथी को फोन में जबरदस्ती प्री-इंस्टॉल कराने के निर्देश ने इस डर को बढ़ा दिया है कि एक मजबूत ऐंटी-फ्रॉड ऐप कहीं सरकारी निगरानी के औजार में न बदल जाए

भारत जैसे देश में, जहां स्मार्टफोन इंडस्ट्री अक्सर आपस में बंटी रहती है, विपक्ष और डिजिटल अधिकारों के समर्थक भी अलग-अलग सुर में बोलते हैं, उन्हें एक साथ लाना आसान नहीं होता. लेकिन सरकार का फोन कंपनियों को दिया गया यह आदेश कि वे संचार साथी ऐप को फोन में पहले से डालें और उसकी किसी भी सुविधा को बंद न होने दें. यह सबको एक मंच पर ले आया.
भले ही केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जल्दी-जल्दी सफाई दी कि ऐप इंस्टॉल या ऐक्टिवेट करना पूरी तरह “ वैकल्पिक” है और यूजर चाहे तो इसे कभी भी हटा सकता है, लेकिन इस पूरे विवाद ने एक बड़ी बात साफ कर दी है: डिजिटल प्राइवेसी को लेकर लोगों का सरकारी संस्थाओं पर भरोसा लगातार कम हो रहा है.
इस मामले की अहमियत सिर्फ आदेश में नहीं, बल्कि उस पर आए रिएक्शन में है. भारत में सरकारी ऐप कोई नई बात नहीं है. आरोग्य सेतु से लेकर डिजीलॉकर तक, लोग उन डिजिटल टूल्स के आदी हो चुके हैं जो कल्याणकारी योजनाओं और सरकारी कामकाज का हिस्सा बन चुके हैं.
ऊपर से देखें तो संचार साथी सरकार के डिजिटल टूलकिट में एक तार्किक जोड़ ही लगता है, एक ऐसा साइबरसिक्योरिटी ऐप जिसे लोगों की मदद के लिए बनाया गया है, न कि सरकार के लिए. लेकिन जैसे ही दूरसंचार विभाग (DoT) ने इसे हर नए फोन में डालने का आदेश दिया, शक और विरोध शुरू हो गया. सिंधिया की यह सफाई कि ऐप पूरी तरह वैकल्पिक है, तभी आई जब विरोध तेज़ हो चुका था.
दूरसंचार विभाग का मूल आदेश बिल्कुल साफ था. फोन कंपनियों को कहा गया था कि ऐप को प्री-इंस्टॉल करें, उसे फोन में साफ दिखने वाली जगह पर रखें और यह सुनिश्चित करें कि उसकी कोई भी सुविधा बंद या सीमित न की जा सके. जो डिवाइस पहले से बाजार में बिक रही थीं, उन्हें भी सॉफ्टवेयर अपडेट के जरिए यह ऐप भेजा जाना था.
कागज पर देखें तो यह ऐप विवादित नहीं है, बल्कि एक अच्छी पहल है. यह मोबाइल चोरी, फर्जी सिम, स्कैम कॉल और अन्य डिजिटल परेशानियों से निबटने में आम लोगों की मदद के लिए बनाया गया सरकारी प्लेटफॉर्म है. फिर भी, जैसे ही दूरसंचार विभाग का आदेश आया, आलोचकों ने कहा कि यह कदम निजी फोन में सरकार का दखल बढ़ाने जैसा है.
सरकार कहती रही कि इरादा पूरी तरह सही है और वह सिर्फ एक साइबरसिक्योरिटी टूल को ज्यादा लोगों तक पहुंचाना चाहती है. लेकिन जब सिंधिया को यह कहना पड़ा कि ऐप “अनिवार्य नहीं” है और यूजर चाहें तो इसे हटा सकते हैं, तब यह साफ हो गया कि दिक्कत सिर्फ ऐप को लेकर नहीं थी. असली चिंता उस संदेश को लेकर थी जो इस तरह के आदेश के साथ भेजा गया था.
दूरसंचार विभाग ने अपनी टेक्निकल एजेंसी सी-डॉट की मदद से संचार साथी बनाया है. यह उन सेवाओं को एक जगह लाता है जो पहले अलग-अलग पोर्टलों और सरकारी दफ्तरों में बिखरी हुई थीं. इसका सबसे अहम हिस्सा है सेंट्रल इक्विपमेंट आइडेंटिटी रजिस्टर, जिसकी मदद से लोग चोरी हुए फोन का आइएमईआइ नंबर ब्लॉक कर सकते हैं. इससे फोन हर नेटवर्क पर बेकार हो जाता है और अगर कहीं दोबारा चालू किया जाए तो अलर्ट भी मिलता है.
इसके साथ टैफकॉप है, जो यूजर को दिखाता है कि उनके नाम पर कितने मोबाइल नंबर चल रहे हैं. यह बहुत जरूरी है, क्योंकि नकली दस्तावेज और दूसरों की पहचान का गलत इस्तेमाल भारत के टेलीकॉम सेक्टर की बड़ी समस्या रही है. एक और फीचर चक्षु है, जहां लोग अपने कॉल या एसएमएस लॉग से ही स्कैम कॉल और फिशिंग मैसेज रिपोर्ट कर सकते हैं. एक फीचर यह भी जांचता है कि फोन का आइएमईआइ असली है या नहीं. जो लोग इंटरनेशनल नंबर से आने वाली फेक लोकल कॉल का शिकार होते हैं, उनके लिए भी इसमें आसान रिपोर्टिंग का रास्ता है. इन सभी सेवाओं का मकसद असली सुरक्षा समस्याओं को हल करना है, खासकर उस दौर में जब डिजिटल धोखाधड़ी तेजी से बढ़ रही है.
सरकार के मुताबिक, यह ऐप काफी असरदार रहा है. इसने लाखों चोरी हुए फोन ढूंढने में मदद की है और फर्जी सब्सक्राइबर वेरिफिकेशन बंद कराकर करोड़ों नकली या अनवेरिफाइड सिम बंद कराए हैं. बैंक, पुलिस और टेलीकॉम कंपनियां भी चुपचाप इसके अलर्ट पर भरोसा करती हैं ताकि फ्रॉड नेटवर्क्स को पकड़ा जा सके. एक साइबर सुरक्षा टूल के रूप में इसकी अहमियत पर शायद ही कोई बहस हो. चिंता तब शुरू हुई जब यह सवाल उठा कि अगर यह ऐप हर नए स्मार्टफोन में जबरन और स्थायी तौर पर डाल दिया जाए, तो यह क्या-क्या कर सकता है, भले ही अभी उसका ऐसा इस्तेमाल न हो रहा हो.
दूरसंचार विभाग के मूल आदेश में ऐप को न हटाने देने और उसकी सभी खासियतें बंद न होने देने वाली भाषा बहुत लोगों को हठी और ज्यादा सरकारी दखल जैसी लगी. सिंधिया के सफाई देने से पहले ही विपक्षी नेताओं ने इस आदेश को सरकार को निगरानी का खुला लाइसेंस बता दिया था.
यह डर इसलिए भी बढ़ता है क्योंकि ऐप को अपने काम के लिए जो परमिशन चाहिए, वे काफी संवेदनशील हैं. एक टैप में स्कैम कॉल रिपोर्ट करने के लिए ऐप को कॉल लॉग तक पहुंच चाहिए. किसी नंबर की जांच करने या यूजर के नाम पर कितने कनेक्शन चल रहे हैं, यह पता करने के लिए उसे डिवाइस आइडेंटिफायर और सब्सक्राइबर इनफॉर्मेशन पढ़नी पड़ती है. फर्जी मैसेज रिपोर्ट करने के लिए एसएमएस मेटाडेटा चाहिए और डॉक्यूमेंट अपलोड करने के लिए कैमरा और स्टोरेज की परमिशन.
इन कामों के लिए यह सब सामान्य है. सरकार की प्राइवेसी पॉलिसी भी कहती है कि डेटा तभी इस्तेमाल होता है जब यूजर खुद कोई ऐक्शन ले और वह डेटा सरकारी सर्वरों पर सुरक्षित रखा जाता है. लेकिन जब बात ऐप को जबरन फोन में डालने की आती है, चाहे कुछ समय के लिए ही क्यों न हो, तो लोग स्वाभाविक रूप से चिंता करते हैं कि आज जो परमिशन सिर्फ फ्रॉड रिपोर्ट करने के लिए जरूरी हैं, क्या वे कल किसी ज्यादा दखल देने वाले इस्तेमाल का रास्ता बना सकती हैं.
ऐप लॉन्च होने पर इसका विरोध शुरू नहीं हुआ. गुस्सा तब फूटा, जब सरकार ने इसे हर नए फोन में डालने की कोशिश की. भारत जैसे देश में, जहां स्मार्टफोन बैंकिंग, बातचीत, पहचान और राजनैतिक राय जताने का सबसे बड़ा जरिया बन चुका है, साइबर सिक्योरिटी और निगरानी के बीच की लाइन बहुत पतली है. और इसे सिर्फ नीति से नहीं, लोगों की धारणा से भी बचाया जाता है.
लोगों की चिंता यह नहीं है कि सरकार अभी उनके कॉल लॉग खंगाल रही है, इसका कोई सबूत नहीं है. डर यह है कि फोन के सिस्टम लेवल पर बैठा ऐसा ऐप, जिसे खास तरह की पहुंच मिलती है, नागरिकों को सरकार की "अच्छी नीयत" पर निर्भर बना देता है. प्राइवेसी विशेषज्ञ अक्सर कहते हैं कि निगरानी तंत्र एकदम से नहीं बनते. वे धीरे-धीरे बढ़ते हैं, तकनीकी क्षमताओं के सहारे, जो कई बार कानून और संस्थागत सुरक्षा से तेज दौड़ती हैं.
संचार साथी को लेकर डर यह नहीं है कि ऐप आज क्या कर रहा है. डर यह है कि अगर हालात या राजनीति की चाहत बदल जाए तो इसका ढांचा कल क्या कर सकता है. यह प्लेटफॉर्म पहले से पुलिस डेटाबेस, टेलीकॉम नेटवर्क और फाइनेंशियल सिस्टम से जुड़ा हुआ है. सिद्धांततः, इसे इस तरह बदला जा सकता है कि यह पहचान, डिवाइस और लोगों के व्यवहार को ऐसे पैमाने पर जोड़ दे, जैसा भारत की डिजिटल गवर्नेंस में पहले नहीं हुआ.
यह संभावना भले दूर की कौड़ी लगे, लेकिन उसकी अहमियत तब बढ़ जाती है जब ऐप को फोन में बिना यूजर की मंजूरी के डाला जाता हुआ दिखे. इससे फोन यानी इंसान का सबसे निजी डिजिटल साथी एक तरह से सरकारी सुरक्षा ग्रिड का डिफॉल्ट हिस्सा बन जाता है.
इस ऐप का ढांचा एक ताकतवर, केंद्रीकृत सिस्टम खड़ा करता है, जो सरकार के कंट्रोल में है. इस तरह के सिस्टम को गलत इस्तेमाल से रोकने के लिए कड़े निगरानी तंत्र की जरूरत होती है. लेकिन भारत का डेटा प्रोटेक्शन सिस्टम अभी ट्रांजिशन में है और पूरी तरह काम करने वाला कोई स्वतंत्र रेगुलेटर नहीं है. इसलिए लोगों को भरोसा नहीं है कि ऐसी निगरानी अभी मौजूद है.
लगभग हर आधुनिक कल्याणकारी देश को पब्लिक सिक्योरिटी और निजी आजादी के बीच संतुलन बैठाना पड़ता है. भारत की स्थिति और मुश्किल है. यहां टेलीकॉम फ्रॉड बहुत आम है और मोबाइल यूजर्स की बड़ी संख्या पहचान चोरी और साइबर अपराध के लिए आसान जमीन बनाती है.
संचार साथी की इन समस्याओं से निबटने में उपयोगिता किसी भी तरह से कम नहीं है. इसने सच में भारत की टेलीकॉम सिक्योरिटी में बड़ी कमियां भरी हैं और लोगों को ऐसी ताकत दी है जो कोई प्राइवेट ऐप नहीं दे पाया. लेकिन किसी ऐप का उपयोगी होना राज्य को यह हक नहीं देता कि वह चुपचाप लोगों के निजी डिवाइसों में जगह बना ले. स्वैच्छिक ऐप भरोसा पैदा करता है. जबरदस्ती वाला ऐप शक पैदा करता है.
सरकार ने जब इस ऐप को अनिवार्य बनाने वाला कदम पीछे लिया, तो उसने इसी सच को माना. लेकिन ऐसा करने से पहले जो बहस शुरू हुई है, वह आने वाली डिजिटल गवर्नेंस नीतियों के साथ बनी रहेगी.