कोविड के बाद बच्चों में क्यों बढ़ रहे हैं भेंगापन के मामले?
छह साल से कम उम्र के बच्चों में भेंगापन की समस्या ज्यादा देखी जा रही है

लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में 14 फरवरी को आयोजित एक “कंटीन्यूइंग मेडिकल एजुकेशन” यानी सीएमई के दौरान बाल नेत्र रोग विशेषज्ञों ने एक चिंताजनक ट्रेंड की ओर ध्यान दिलाया. डॉक्टरों का कहना है कि कोविड-19 महामारी के बाद बच्चों में भेंगापन यानी स्ट्रैबिस्मस के मामलों में स्पष्ट बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है और इसके पीछे मोबाइल फोन व दूसरी डिजिटल स्क्रीन का बढ़ता इस्तेमाल एक बड़ी वजह बनकर उभरा है.
KGMU के ऑप्थल्मोलॉजी विभाग के प्रोफेसर सिद्धार्थ अग्रवाल के मुताबिक, अब ओपीडी में लगभग हर दिन कम से कम दो ऐसे बच्चे आ रहे हैं जिनमें आंखों के असंतुलन के लक्षण दिख रहे हैं. उनका कहना है कि महामारी के दौरान ऑनलाइन पढ़ाई, घर के भीतर सीमित गतिविधियां और मोबाइल पर गेम व वीडियो देखने की आदत ने बच्चों के विजुअल सिस्टम पर असामान्य दबाव डाला.
छह साल से कम उम्र के बच्चों में यह समस्या ज्यादा देखी जा रही है, क्योंकि इस उम्र में आंखों और दिमाग के बीच तालमेल विकसित हो रहा होता है. डॉक्टर बताते हैं कि जब बच्चा लंबे समय तक मोबाइल को बहुत पास से देखता है तो आंखों की फोकस करने वाली मांसपेशियां लगातार सिकुड़ी हुई अवस्था में रहती हैं. सामान्य स्थिति में आंखें पास और दूर की वस्तुओं के बीच फोकस बदलती रहती हैं, जिससे मसल्स को आराम मिलता है. लेकिन छोटी स्क्रीन पर लगातार नजर टिकाए रखने से यह प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने लगता है. धीरे-धीरे दोनों आंखों के बीच बाइनोक्युलर कोऑर्डिनेशन कमजोर पड़ सकता है और एक आंख अंदर या बाहर की ओर मुड़ने लगती है. यही स्थिति क्लिनिकली स्ट्रैबिस्मस कहलाती है.
विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अपजीत कौर ने समझाया कि डिजिटल आई स्ट्रेन पर हुई कई स्टडीज यह दिखाती हैं कि स्क्रीन देखने के दौरान बच्चे सामान्य से कम पलकें झपकाते हैं. इससे आंखों में सूखापन, थकान और कन्वर्जेंस स्ट्रेस बढ़ता है. एक्स्ट्राऑक्युलर मसल्स पर लगातार दबाव रहने से आंखों का तालमेल प्रभावित हो सकता है. जिन बच्चों में पहले से हल्का फोकसिंग दोष या हाइपरमेट्रोपिया जैसी समस्या होती है, उनमें यह जोखिम और बढ़ जाता है.
KGMU के अलावा प्रदेश के अन्य मेडिकल कॉलेजों में भी यही रुझान सामने आ रहा है. कानपुर के गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज के नेत्र विभाग के डॉक्टरों के अनुसार, पिछले दो से तीन वर्षों में बाल ओपीडी में स्क्रीन से जुड़ी शिकायतें तेजी से बढ़ी हैं. वहां के विशेषज्ञ बताते हैं कि पहले जहां भेंगापन के ज्यादातर मामले जन्मजात या पारिवारिक कारणों से जुड़े होते थे, वहीं अब एक बड़ा हिस्सा ऐसे बच्चों का है जिनका स्क्रीन टाइम रोज तीन से पांच घंटे तक पहुंच गया है.
वाराणसी स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज बीएचयू में बाल नेत्र रोग विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में भी स्मार्टफोन की पहुंच बढ़ने के बाद छोटे बच्चों में नजर संबंधी शिकायतें सामने आ रही हैं. डॉक्टरों का अनुभव है कि कई माता-पिता दो से तीन साल के बच्चों को भी वीडियो दिखाकर शांत रखने की आदत डाल देते हैं. इस उम्र में विजुअल सिस्टम तेजी से विकसित हो रहा होता है और लगातार नजदीक की स्क्रीन देखने से यह विकास असंतुलित हो सकता है.
मेरठ के लाला लाजपत राय मेमोरियल मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग ने हाल में अपने आंतरिक आंकड़ों की समीक्षा की. वहां के एक वरिष्ठ चिकित्सक के मुताबिक, कोविड के बाद बच्चों में डिजिटल आई स्ट्रेन, सिरदर्द, डबल विजन और आंखों के बहने की शिकायतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है. इनमें से कुछ मामलों में जांच के बाद इंटरमिटेंट स्ट्रैबिस्मस पाया गया, जो शुरुआती चरण में था लेकिन समय रहते इलाज न होने पर स्थायी रूप ले सकता है.
विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि भेंगापन केवल बाहरी दिखावट का मुद्दा नहीं है. प्रोफेसर विनीता सिंह बताती हैं कि अगर समय पर इलाज न किया जाए तो एम्ब्लियोपिया या लेजी आई विकसित हो सकती है. इस स्थिति में मस्तिष्क एक आंख से आने वाले संकेतों को नजरअंदाज करना शुरू कर देता है. परिणामस्वरूप उस आंख की दृष्टि स्थाई रूप से कमजोर हो सकती है. छोटे बच्चों में यह जोखिम ज्यादा होता है क्योंकि उनका ब्रेन विजुअल इनपुट के आधार पर ही विकसित हो रहा होता है.
आगरा के सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों के अनुसार, कई अभिभावक शुरुआत में आंखों के हल्के तिरछेपन को गंभीरता से नहीं लेते. उन्हें लगता है कि बच्चा कभी-कभी आंख घुमा रहा है या शरारत कर रहा है. लेकिन जब तक बच्चा स्कूल जाने लगता है, तब तक समस्या बढ़ चुकी होती है. डॉक्टरों का कहना है कि शुरुआती संकेतों में एक आंख का बार-बार भटकना, टीवी या मोबाइल देखते समय सिर टेढ़ा करना, बार-बार आंख मलना या डबल दिखने की शिकायत शामिल हो सकती है.
गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विशेषज्ञों का अनुभव है कि महामारी के दौरान गांवों में भी ऑनलाइन क्लास और मनोरंजन के लिए मोबाइल पर निर्भरता बढ़ी. कई परिवारों में एक ही फोन पर बच्चा घंटों गेम खेलता या वीडियो देखता रहा. बाहर खेलने और प्राकृतिक रोशनी में समय बिताने की आदत कम हो गई. शोध बताते हैं कि आउटडोर गतिविधियां आंखों के विकास के लिए लाभकारी होती हैं और मायोपिया व अन्य विजुअल समस्याओं के जोखिम को कम करती हैं.
डॉक्टरों के मुताबिक, तीन साल से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल या टैबलेट से पूरी तरह दूर रखना चाहिए. बड़े बच्चों के लिए भी स्क्रीन टाइम सीमित होना चाहिए. इंटरनेशनल पीडियाट्रिक ऑप्थल्मोलॉजी गाइडलाइंस यही सलाह देती हैं कि छोटे बच्चों का विजुअल सिस्टम स्ट्रेन के प्रति ज्यादा संवेदनशील होता है. इसलिए डिजिटल डिवाइस का उपयोग नियंत्रित और निगरानी में होना चाहिए.
इलाज के संदर्भ में विशेषज्ञ बताते हैं कि हर भेंगापन का मामला सर्जरी तक नहीं पहुंचता. डॉ. लतिका टंडन के अनुसार, समय पर जांच होने पर चश्मे, आई एक्सरसाइज, विजन थेरेपी और पैच थेरेपी से सुधार संभव है. पैच थेरेपी में मजबूत आंख को कुछ समय के लिए ढककर कमजोर आंख को सक्रिय किया जाता है, ताकि दिमाग दोनों आंखों से आने वाले संकेतों को बराबर महत्व दे. गंभीर या स्थायी मामलों में ही सर्जरी की जरूरत पड़ती है.
मनोवैज्ञानिक पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. कई डॉक्टरों ने बताया कि स्कूल जाने वाले बच्चों में आंखों के तिरछेपन के कारण आत्मविश्वास में कमी और साथियों के चिढ़ाने जैसी समस्याएं देखी जाती हैं. समय पर इलाज न होने पर यह सामाजिक और भावनात्मक विकास को प्रभावित कर सकता है. विशेषज्ञों की सलाह साफ है. माता-पिता को बच्चों का स्क्रीन टाइम तय सीमा में रखना चाहिए. मोबाइल को आंखों से कम से कम 30 से 40 सेंटीमीटर दूर रखकर उपयोग करना चाहिए. हर 20 मिनट बाद नजर को दूर की वस्तु पर केंद्रित करने की आदत डालनी चाहिए. कमरे में पर्याप्त रोशनी होनी चाहिए और अंधेरे में स्क्रीन देखने से बचना चाहिए. सबसे अहम, बच्चों को रोजाना बाहर खेलने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.
प्रदेश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों के अनुभव एक ही दिशा में इशारा करते हैं कि डिजिटल युग में बच्चों की आंखें नई चुनौतियों का सामना कर रही हैं. मोबाइल पूरी तरह से दोषी नहीं है, लेकिन उसका अनियंत्रित और लंबे समय तक उपयोग आंखों के विकास पर असर डाल सकता है. अगर अभिभावक सजग रहें, शुरुआती लक्षणों को पहचानें और समय पर नेत्र विशेषज्ञ से परामर्श लें, तो भेंगापन जैसी गंभीर समस्या को काफी हद तक रोका या नियंत्रित किया जा सकता है.
उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में भेंगापन के इलाज की सुविधाएं धीरे-धीरे मजबूत हुई हैं. लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी, कानपुर के गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज, वाराणसी के इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज बीएचयू और गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज जैसे बड़े सरकारी संस्थानों में बाल नेत्र रोग विशेषज्ञ उपलब्ध हैं, जहां स्ट्रैबिस्मस की जांच के लिए समर्पित ओपीडी चलती है. यहां विजन असेसमेंट, रिफ्रैक्शन टेस्ट, ऑर्थोप्टिक मूल्यांकन, पैच थेरेपी और जरूरत पड़ने पर सर्जिकल करेक्शन की सुविधा भी मिलती है.
आयुष्मान भारत और राज्य स्वास्थ्य योजनाओं के तहत आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को ऑपरेशन और इलाज में राहत मिलती है, जिससे निजी अस्पतालों पर निर्भरता कम होती है. जिला अस्पतालों में भी अब रेफरल सिस्टम के जरिए गंभीर मामलों को मेडिकल कॉलेजों तक पहुंचाने की व्यवस्था बेहतर की गई है.
डॉक्टरों का मानना है कि यह केवल मेडिकल मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता का विषय भी है. जिस तरह बच्चों के खानपान और टीकाकरण पर ध्यान दिया जाता है, उसी तरह डिजिटल आदतों पर भी निगरानी जरूरी है. क्योंकि बचपन में आंखों की सेहत ही आगे की पूरी जिंदगी की दृष्टि की बुनियाद तय करती है.