भारतीय अदालतें डिजिटल फुटप्रिंट डिलीट कराने के अधिकार पर किस मुश्किल में पड़ीं?
जैसे-जैसे भारतीय अपने पुराने मुकदमों के डिजिटल निशान मिटाने के लिए याचिकाएं लगा रहे हैं, एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है: क्या निजता का अधिकार जनता के 'जानने के अधिकार' से बड़ा हो सकता है?

एक दशक पहले, यह समस्या न के बराबर थी. कोर्ट का केस खत्म होता था, अखबार की कतरनें आर्काइव्स में पीली पड़ जाती थीं और दुनिया आगे बढ़ जाती थी. लेकिन आज, एक अकेली गूगल सर्च कुछ ही सेकंड में किसी इंसान का पूरा अतीत खंगाल सकता है - चाहे वह गिरफ्तारी की रिपोर्ट हो, तलाक का फैसला हो या कोई ऐसा क्रिमिनल ट्रायल जिसमें वह बरी हो चुका हो.
जैसे-जैसे भारतीय अपने पुराने मुकदमों के डिजिटल निशानों को मिटाना चाह रहे हैं, अदालतों में 'राइट टू बी फॉरगॉटन' (RTBF ) की मांग करने वाली याचिकाओं की बाढ़ सी आ गई है. इसका मतलब है कि जब कोई निजी जानकारी गैर-जरूरी या गलत हो जाए, तो उसे इंटरनेट से हटाने या डीलिंक करने की ताकत.
लेकिन इंटरनेट शायद ही कभी कुछ भूलता है. कोर्ट से बरी हो चुके कई भारतीयों के लिए, कानूनी लड़ाई खत्म होने के बरसों बाद भी पुराने केस ऑनलाइन दिखते रहते हैं. इस डिजिटल रिकॉर्ड की वजह से उनके अतीत का साया उनका पीछा नहीं छोड़ता - नतीजतन, जॉब एप्लीकेशंस रिजेक्ट हो जाती हैं, बिजनेस डील्स अटक जाती हैं और निजी जिंदगी पर बुरा असर पड़ता है. निजता और 'पब्लिक मेमोरी' के बीच के इस बढ़ते टकराव ने अब भारत की अदालतों को एक बुनियादी सवाल से टकराने पर मजबूर कर दिया है: आखिर अतीत के कितने हिस्से को सच में मिटाया जा सकता है?
यह पूरी बहस पिछले महीने तब एक टर्निंग पॉइंट पर पहुंच गई, जब सुप्रीम कोर्ट ने मनी-लॉन्ड्रिंग की जांच से बरी हुए एक बिजनेसमैन के मामले में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स से न्यूज रिपोर्ट्स और कोर्ट रिकॉर्ड्स हटाने के आदेशों पर रोक लगा दी. निचली अदालतों ने यह दलील मान ली थी कि जब किसी व्यक्ति के पक्ष में फैसला आ जाता है, तो उस केस से जुड़ी पुरानी रिपोर्ट्स पब्लिक डोमेन से गायब हो जानी चाहिए. लेकिन जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने उन निर्देशों पर रोक लगा दी और साफ किया कि कंटेंट हटाने का वह पुराना आदेश कोई मिसाल नहीं बनेगा.
सुप्रीम कोर्ट का यह दखल न्यायपालिका की बढ़ती सावधानी का इशारा है. अदालतों को डर है कि अगर इस सिद्धांत को बहुत ज्यादा छूट दे दी गई, तो रसूखदार लोग अपने असुविधाजनक कानूनी इतिहास को मिटाने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. इस पूरे विवाद के केंद्र में एक संवैधानिक दुविधा है - क्या किसी व्यक्ति की साख समाज के 'जानने के अधिकार' पर भारी पड़ सकती है?
डिजिटल तकनीक ने कानूनी जानकारी के बचे रहने के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया है. पहले, कोर्ट केस की जानकारी समय के साथ धुंधली पड़ जाती थी. आज, ऑनलाइन डेटाबेस और सर्च इंजन जजमेंट्स, मीडिया रिपोर्ट्स और कानूनी टिप्पणियों को हमेशा के लिए सुरक्षित रखते हैं. इसी 'परमानेंस' यानी हमेशा बने रहने की खूबी ने कई लोगों को अदालतों से राहत मांगने पर मजबूर किया है.
इसी जनवरी में, दिल्ली हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक ट्रायल कोर्ट के फैसले को अस्थायी रूप से ब्लॉक करने के लिए लीगल डेटाबेस 'इंडियन कानून' को निर्देश दिया था. कोर्ट ने महिला की निजता को लेकर चिंता जताई थी क्योंकि वह आदेश ऑनलाइन आसानी से सर्च किया जा सकता था. ऐसे फैसलों ने लोगों को इसी तरह की राहत मांगने के लिए बढ़ावा दिया है.
हालांकि, भारत में RTBF का कोई साफ कानूनी रूप मौजूद नहीं है. इसकी जड़ें सुप्रीम कोर्ट के 2017 के ऐतिहासिक 'निजता के फैसले' (जस्टिस के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ) में हैं, जिसने निजता को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार घोषित किया था. अपनी सहमति वाली राय में, जस्टिस संजय किशन कौल ने जानकारियों को एक हद तक 'हटाए जाने के अधिकार' की संभावना का जिक्र किया था, जिससे लोग समय के साथ गैर-जरूरी हो चुकी निजी जानकारी को हटवा सकें. लेकिन उन्होंने यह भी जोर दिया था कि ऐसा कोई भी अधिकार 'एब्सोल्यूट' यानी पूरी तरह से निरपेक्ष नहीं हो सकता. इसे अभिव्यक्ति की आजादी, कानूनी जिम्मेदारियों और जनता के सूचना के अधिकार जैसे दूसरे अहम हितों के साथ बैलेंस करना होगा.
इन चेतावनियों के बावजूद, देश भर की अदालतों से कोर्ट के फैसलों, सर्च इंजन के लिंक्स और मीडिया रिपोर्ट्स को हटाने या छिपाने की मांग लगातार बढ़ रही है. भारतीय अदालतों ने इसे लेकर अलग-अलग नजरिया अपनाया है. कुछ मामलों में, हाई कोर्ट्स ने निजता की रक्षा के लिए फैसलों में नामों को छिपाने की इजाजत दी है, खासकर वैवाहिक विवादों या महिलाओं से जुड़े मामलों में. वहीं कुछ अन्य मामलों में, जजों ने 'ओपन जस्टिस' के सिद्धांत का हवाला देते हुए ऐसी मांगों को ठुकरा दिया है.
राजस्थान हाई कोर्ट ने 2025 में एक कदम आगे बढ़ते हुए किशोरों से जुड़े मामलों में RTBF को 'एब्सोल्यूट' घोषित कर दिया था और कार्यवाही से जुड़े रिकॉर्ड नष्ट करने का निर्देश दिया था. लेकिन बाद में मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने बरी हुए एक व्यक्ति की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उसने फैसले से अपना नाम हटाने की मांग की थी. कोर्ट ने कहा कि ऐसे निर्देश 'एडहॉक' अदालती आदेशों के बजाय कानून के जरिए तय होने चाहिए. यह मुद्दा अब कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट के सामने पेंडिंग है.
अदालतों के सतर्क रहने की एक बड़ी वजह 'ओपन जस्टिस' का सिद्धांत है. न्यायिक कार्यवाही और रिकॉर्ड्स को आमतौर पर पब्लिक डॉक्युमेंट माना जाता है. लीगल एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि पुराने मुकदमों को मिटाने का अगर बिना रोक-टोक अधिकार दे दिया गया, तो ताकतवर लोग या कॉरपोरेट कंपनियां अपने असुविधाजनक सच को आसानी से दबा सकेंगी. उनका तर्क है कि भले ही कोई व्यक्ति आखिरकार बरी हो जाए, लेकिन यह तथ्य कि कोई जांच या ट्रायल हुआ था, वह ऐतिहासिक रिकॉर्ड का हिस्सा बना रहता है. पारंपरिक रूप से, अदालतों ने केवल कुछ ही मामलों में प्रकाशन पर रोक लगाई है - जैसे कि रेप सर्वाइवर्स या नाबालिगों की पहचान छिपाना या संवेदनशील वैवाहिक कार्यवाहियों को सुरक्षित रखना. इन अपवादों का मकसद पीड़ितों को नुकसान से बचाना है, न कि न्यायिक इतिहास को फिर से लिखना.
न्यूज मीडिया संगठनों का कहना है कि हाल के सालों में पुरानी स्टोरीज को हटाने की मांग तेजी से बढ़ी है. ये मांगें अक्सर उन लोगों की तरफ से आती हैं जिनके नाम उनके खिलाफ केस खत्म होने के बरसों बाद भी सर्च रिजल्ट्स में दिखाई देते रहते हैं. बिजनेस लीडर्स और सरकारी अधिकारियों के लिए, साख पर इसका असर बहुत भारी पड़ सकता है.
यह मुद्दा 'द इंडियन एक्सप्रेस' से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है. एक्सप्रेस ने मनी-लॉन्ड्रिंग के एक मामले में आरोपी के बरी होने के बाद पुरानी रिपोर्ट्स को हटाने की मांग वाले अदालती निर्देशों को चुनौती दी है. सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इन 'टेकडाउन' आदेशों पर रोक लगा दी है और वह इस बात की जांच करने को तैयार हो गया है कि क्या RTBF का दायरा न्यायिक कार्यवाही की 'सच्ची मीडिया कवरेज' को हटाने तक बढ़ाया जा सकता है.
एक सीनियर एडिटर कहते हैं, "अगर आर्काइव्स गायब होने लगे, तो यह पब्लिक मेमोरी के काम करने के तरीके को पूरी तरह से बदल देगा. हर बार जब कोई अपना अतीत साफ करना चाहेगा, तो पत्रकारिता को फिर से नहीं लिखा जा सकता." 'इंडियन कानून' जैसे लीगल डेटाबेस ने भी एकतरफा टेकडाउन आदेशों का विरोध किया है और चेतावनी दी है कि कोर्ट रिकॉर्ड्स को हटाने से कानूनी जानकारी और रिसर्च तक लोगों की फ्री पहुंच कमजोर हो सकती है.
यह बहस सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है. यूरोपियन यूनियन (EU) में, RTBF को उनके 'जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन' में मजबूती से शामिल किया गया है, जो लोगों को सर्च रिजल्ट्स से अपनी पुरानी निजी जानकारी हटाने का अनुरोध करने की इजाजत देता है. हालांकि, अमेरिका ने मोटे तौर पर ऐसे किसी सिद्धांत को खारिज कर दिया है. वहां की अदालतों का मानना है कि जो सच्ची जानकारी कानूनी रूप से पब्लिश हो चुकी है, वह बाद में प्राइवेट नहीं हो सकती. भारत इस मामले में बीच का रास्ता अपनाता दिख रहा है. जहां पब्लिक रिकॉर्ड्स की अहमियत को बनाए रखते हुए निजता की चिंताओं को भी समझा जा रहा है.
इस डिजिटल युग ने 'भूल जाने' को लगभग नामुमकिन बना दिया है. कानूनी लड़ाइयों के बाद अपनी जिंदगी को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए, ऑनलाइन रिकॉर्ड्स का हमेशा के लिए दर्ज हो जाना बहुत नाइंसाफी भरा लग सकता है. लेकिन दूसरी तरफ समाज के लिए, पब्लिक रिकॉर्ड्स एक सामूहिक याद का काम करते हैं. भारत की अदालतें अब इन दोनों टकराती हुई कई तरह के मूल्यों के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश कर रही हैं.
साख और रिकॉर्ड की इस जंग में, भारत के RTBF और जनता के 'याद रखने के अधिकार' पर आखिरी फैसला लिखा जाना अभी बाकी है. पुराने 'एनालॉग' दौर में, चीजों का भूल जाना वक्त की फितरत थी. अखबार की कतरनें धूल फांकती थीं, कोर्ट की फाइलें आर्काइव्स में दब जाती थीं, और दागदार साख धीरे-धीरे धुल जाती थी. लेकिन इंटरनेट ने उस 'खामोश रहम' को हमेशा के लिए खत्म कर दिया है.