INDIA ब्लॉक की मुश्किलों ने छिपाई कांग्रेस की असली समस्या?

केरल के अलावा असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में कांग्रेस और उसके सहयोगियों की हार के बाद राहुल गांधी सवाल उठ रहे हैं लेकिन ये कितने वाजिब हैं?

राहुल गांधी (फाइल फोटो)
राहुल गांधी (फाइल फोटो)

8 जून को दिल्ली में भारतीय राष्ट्रीय विकासशील समावेशी गठबंधन (INDIA) की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई. इस बैठक में गठबंधन के भीतर की दरारें खुलकर सामने आ गईं. 2023 में BJP के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए बने लगभग दो दर्जन विपक्षी दलों के इस गठबंधन की चुनाव परिणामों के बाद यह पहली बैठक थी.

तमिलनाडु में कांग्रेस के सबसे करीबी सहयोगी रहे द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) ने बैठक का बहिष्कार किया और कांग्रेस पर विश्वासघात का आरोप लगाया. DMK का कहना था कि तमिलनाडु चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस ने उनका साथ छोड़ दिया. वहीं, केरल में कांग्रेस नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) से हारने वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) की प्रमुख पार्टी CPI(M) भी बैठक में शामिल नहीं हुई.

बैठक में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने कांग्रेस पर एकतरफा फैसले लेने और चुनाव प्रचार के दौरान सहयोगियों पर हमला करने का आरोप लगाया. बैठक के बाहर की बात करें तो इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने इससे भी आगे बढ़ते हुए कहा कि अगर कांग्रेस BJP को चुनौती देना चाहती है तो उसे गांधी परिवार से आगे बढ़ना होगा.

इसके बाद CPI(M) के वरिष्ठ नेता और केरल के पूर्व मुख्यमंत्री, अब विपक्ष के नेता पिनराई विजयन ने भी राहुल गांधी पर निशाना साधा. 8 जून के अपने भाषण में राहुल ने कहा था कि वे राजनीतिक रूप से विजयन को गले नहीं लगा सकते क्योंकि केरल में दोनों आमने-सामने की लड़ाई में हैं. विजयन ने जवाब देते हुए राहुल को संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गले लगाने की याद दिलाई और कहा कि उनकी राजनीति INDIA गठबंधन को कमजोर कर रही है और अप्रत्यक्ष रूप से BJP की मदद कर रही है.

इन सभी आरोपों में दो अलग-अलग विफलताओं को एक साथ मिला दिया गया है. पहली, कांग्रेस का चुनावी पतन, जिसके लिए राहुल गांधी वास्तव में जिम्मेदार हैं. दूसरी, INDIA गठबंधन का कमजोर पड़ना, जिसके लिए वे काफी हद तक जिम्मेदार नहीं हैं. पिछले कुछ हफ्तों की आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति में दोनों बातों को अलग करना मुश्किल हो गया है, शायद इसलिए कि सब किसी एक दोषी की तलाश में हैं.

इस मामले में आरोपी के तौर पर राहुल का नाम सबसे आगे है. एक ऐसा नेता जिसके नेतृत्व में पार्टी एक दशक से लगातार अधिकांश चुनाव हारती रही हो, वह सवालों से नहीं बच सकता. उनके नेतृत्व में कांग्रेस मजबूत संगठन खड़ा नहीं कर पाई, राज्यों में भरोसेमंद नेतृत्व तैयार नहीं कर पाई और विधानसभा चुनावों के लिए ऐसा संदेश नहीं बना पाई जो मतदाताओं तक पहुंचे. कुछ गिने-चुने राज्यों तक सिमटती कांग्रेस की मौजूदगी इसी विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है.

लेकिन दूसरे आरोप में दोषारोपण गलत दिशा में जाता है, क्योंकि जिन राज्यों में चुनाव हुए वहां ज्यादातर जगह INDIA गठबंधन का कोई सक्रिय चुनावी गठजोड़ था ही नहीं. पश्चिम बंगाल इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है. वहां INDIA गठबंधन जैसा कोई चुनावी समझौता था ही नहीं जिसे तोड़ा जा सके.

मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी चुनाव से काफी पहले ही कांग्रेस के साथ गठबंधन से इनकार कर चुकी थीं और कोई बातचीत भी नहीं हुई थी. कांग्रेस ने वाम दलों के साथ चुनाव लड़ा जबकि तृणमूल अकेले मैदान में उतरी. जो गठबंधन बना ही नहीं, उसके टूटने की बात नहीं की जा सकती.

केरल का मामला और भी स्पष्ट है. कांग्रेस नेतृत्व वाले UDF और CPI(M) नेतृत्व वाले LDF के बीच दशकों से प्रतिस्पर्धा रही है. दोनों बारी-बारी से सत्ता में आते रहे हैं. वहां INDIA गठबंधन जैसा कोई चुनावी समझौता कभी संभव ही नहीं था. कांग्रेस ने वाम मोर्चे को हराकर विजयन का कार्यकाल समाप्त किया. इसे विपक्षी एकता के टूटने के रूप में पेश करना उस राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को गलत समझना है जो INDIA गठबंधन बनने से बहुत पहले से मौजूद है.

तमिलनाडु वह मामला है जिस पर DMK सबसे ज्यादा जोर देती है लेकिन यहां भी घटनाक्रम उसके आरोपों का समर्थन नहीं करता. कांग्रेस चुनाव में DMK की सहयोगी थी और राहुल गांधी पूरे अभियान के दौरान इस गठबंधन के साथ खड़े रहे. उन्होंने उन सहयोगियों की सलाह भी नहीं मानी जो अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कषगम (TVK) के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए पहले ही पाला बदलने की बात कर रहे थे. कांग्रेस ने TVK की ओर रुख केवल चुनाव परिणाम आने के बाद किया यानी गठबंधन चुनाव से पहले नहीं, परिणामों के बाद टूटा. DMK की नाराजगी हार की पीड़ा ज्यादा दिखाती है, न कि यह कि कांग्रेस ने उसकी हार करवाई.

पुडुचेरी में टूट स्थानीय कारणों से हुई। कांग्रेस के बागी नेताओं ने सीट बंटवारे के समझौते की अवहेलना कर DMK उम्मीदवारों के खिलाफ नामांकन भर दिया, जिससे छोटे सहयोगी दल भी नाराज हो गए. यह विवाद जमीनी स्तर की गुटबाजी से पैदा हुआ, दिल्ली से दिए गए किसी निर्देश से नहीं. असम में तो INDIA गठबंधन जैसा कोई मोर्चा था ही नहीं. कांग्रेस का पुराना महागठबंधन 2021 में टूट चुका था और उसकी जगह कोई नया मजबूत गठबंधन नहीं बन पाया.

इन पांचों राज्यों में एक समान पैटर्न दिखाई देता है. जहां गठबंधन कमजोर हुआ, वहां कारण क्षेत्रीय नेताओं के फैसले थे या ऐसी पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विताएं थीं जो INDIA गठबंधन से कहीं पहले की हैं. सच यह है कि INDIA गठबंधन की ताकत हमेशा उसके घटक दलों के अपने-अपने राज्यों में प्रदर्शन पर निर्भर रही है, न कि दिल्ली में बैठकर बनाई गई किसी एकता पर. जब DMK तमिलनाडु में और तृणमूल बंगाल में हारी, तो गठबंधन के दो सबसे मजबूत स्तंभ कमजोर हो गए. यह राजनीतिक गणित है, विश्वासघात नहीं.

इसीलिए हर सामूहिक विफलता का दोष एक व्यक्ति पर मढ़ना नुकसानदेह है. विजयन राहुल पर गठबंधन को कमजोर करने का आरोप लगाते हैं. वहीं राहुल अपने 8 जून के भाषण में सहयोगी दलों को इस भ्रम में रहने के लिए दोषी ठहराते हैं कि मौजूदा व्यवस्था में चुनाव पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष हैं.

दोनों तर्कों में कुछ सच्चाई हो सकती है लेकिन इनमें से कोई भी विपक्ष की मदद नहीं करता. कोई भी गठबंधन उतना ही प्रभावी होता है जितनी मजबूत उसकी चुनावी साझेदारियां और साझा राजनीतिक कहानी होती है. इसके अलावा, कोई गठबंधन उतना ही टिकाऊ होता है जितना सम्मान उसके कार्यकर्ता एक-दूसरे को देते हैं. संकट के समय बलि का बकरा ढूंढना असली काम की जगह नहीं ले सकता.

यहीं राहुल गांधी की आलोचना को सही दिशा मिलनी चाहिए. कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी यह नहीं है कि वे ममता बनर्जी या एम.के. स्टालिन को साथ नहीं रख पाए. असली समस्या यह है कि पार्टी उन राज्यों में अपने दम पर खड़ी नहीं हो पा रही जहां से राष्ट्रीय सत्ता का रास्ता निकलता है.

लोकसभा में सबसे ज्यादा सांसद भेजने वाले पांच राज्य उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार और तमिलनाडु मिलाकर 543 में से 249 सीटें देते हैं, यानी लगभग आधी संसद. कांग्रेस के पास इनमें सिर्फ 32 सीटें हैं और उनमें से भी अधिकांश DMK, समाजवादी पार्टी, RJD, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) जैसे सहयोगियों के सहारे मिली हैं.

विधानसभाओं की तस्वीर और भी खराब है. इन पांच राज्यों में कुल 1,462 विधानसभा सीटें हैं लेकिन कांग्रेस के पास केवल 72 सीटें हैं. चुनाव से कुछ महीने पहले बनाया गया कोई भी गठबंधन उस पार्टी की कमजोरी की भरपाई नहीं कर सकता जिसकी जड़ें देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में कमजोर हो चुकी हों.

उपलब्ध फैक्ट के आधार पर कांग्रेस को दोबारा से अपने संगठन को मजबूत करने की शुरुआत इन राज्यों में मजबूत करने से होनी चाहिए, न कि BJP का मुकाबला सहयोगी दलों के भरोसे करने से. लड़ाई को सहयोगियों के भरोसे छोड़ने की प्रवृत्ति ने ही कांग्रेस को निर्भर और कमजोर बना दिया है.

दूसरी समस्या कांग्रेस के भीतर है और राहुल गांधी इसे बेहतर ढंग से सुलझा सकते हैं. जिन राज्यों में कांग्रेस अभी भी प्रतिस्पर्धी है, वहां भी उसके नेता आपसी संघर्ष में उलझे हैं. कर्नाटक में पार्टी ने सिद्धारमैया की जगह डी.के. शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाया है लेकिन दोनों के बीच की पुरानी प्रतिस्पर्धा खत्म नहीं हुई.

केरल में नेतृत्व का सवाल सुलझा, पर पुराने घाव बाकी हैं. राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट की खींचतान फिर उभर आई है. तेलंगाना में केंद्रीय पर्यवेक्षक मीनाक्षी नटराजन और मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के बीच मतभेद हैं. पंजाब में भी चुनाव से पहले पार्टी अंदरूनी संघर्ष से जूझ रही है.

ये ऐसे विवाद हैं जिन्हें राहुल गांधी सुलझा सकते हैं, क्योंकि ये गठबंधन से नहीं बल्कि कांग्रेस की अपनी संरचना से जुड़े हैं. विजयन या DMK से संबंध सुधारने से उन्हें तुरंत राजनीतिक लाभ न मिले लेकिन अपने राज्यों की इकाइयों में एकजुटता लाना कांग्रेस के अस्तित्व, पार्टी को दोबारा से मजबूत करने और विस्तार के लिए बेहद जरूरी है.

राज्यों में कांग्रेस के पतन की जिम्मेदारी राहुल गांधी की है लेकिन INDIA गठबंधन के बिखरने की जिम्मेदारी उनकी नहीं है जो इन विधानसभा चुनावों के लिए वास्तव में बना ही नहीं था. दोनों बातों को मिलाकर देखने से एक ओर राहुल अपनी वास्तविक विफलताओं से बच निकलते हैं, तो दूसरी ओर उन गलतियों का बोझ भी उन पर डाल दिया जाता है जिनके लिए कई क्षेत्रीय नेता जिम्मेदार हैं.

कांग्रेस पार्टी को दोबारा से मजबूत करना है तो यह काम किसी राष्ट्रीय चुनाव से पहले नए गठबंधन की घोषणा से नहीं होगा. वह तभी संभव है जब पार्टी धीरे-धीरे राज्यों में अपने पैरों पर फिर से खड़ा होने की कोशिश करे.

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