PoK में हत्याओं के बाद पाकिस्तान के 'कश्मीर नैरेटिव' को लगा भारी झटका

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में हुए विरोध प्रदर्शनों और इन्हें दबाने के लिए सरकार की तरफ से की गई हिंसक कार्रवाई की गूंज भारत की कश्मीर घाटी में भी सुनाई दे रही है

POK में प्रदर्शनकारियों पर चली गोली
POK में प्रदर्शनकारियों पर चली गोली

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) के रावलकोट शहर में सुरक्षा बलों के साथ हालिया झड़पों में कम से कम 30 लोगों की मौत हो गई. PoK में हो रहे इन विरोध प्रदर्शनों की गूंज भारत की कश्मीर घाटी तक पहुंची है.

घाटी में आम धारणा यह है कि राजनीतिक असहमति से निपटने के लिए पाकिस्तान सरकार के जरिए अपनाया गया हिंसक रवैया कश्मीर मुद्दे पर उसके नैतिक दावे को कमजोर करता है. साथ ही उसके रुख के विरोधाभासों को उजागर करता है.

PoK में इन प्रदर्शनों का नेतृत्व जम्मू कश्मीर जॉइंट आवामी एक्शन कमेटी (JAAC) कर रही है. यह 2023 में बना एक संयुक्त मंच है, जिसमें क्षेत्र के व्यापारी और नागरिक समाज संगठन शामिल हैं. 9 जून को हिंसा भड़कने से पहले स्थानीय सरकार ने क्षेत्रीय आतंकवाद-रोधी कानून के तहत JAAC पर प्रतिबंध लगा दिया था.

प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग PoK की विधानसभा में शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को समाप्त करने की है. यहां शरणार्थियों से मतलब उन लोगों से है जो जम्मू-कश्मीर छोड़कर पाकिस्तान में बस गए थे. श्रीनगर के जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक और केंद्रीय विश्वविद्यालय कश्मीर के सामाजिक विज्ञान संकाय के पूर्व डीन प्रोफेसर नूर अहमद बाबा का मानना है कि PoK में जो घटनाएं हो रही हैं वे पाकिस्तान और PoK दोनों सरकारों के लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा कर रही हैं.

नूर अहमत कहते हैं, "यह निश्चित रूप से एक मुश्किल स्थिति है और इस तरह की घटनाओं से कश्मीर मुद्दे पर उनका नैतिक दावा कमजोर पड़ सकता है." जब उनसे पूछा गया कि PoK में विरोध प्रदर्शन और राज्य की ओर से की गई हिंसा को कश्मीर घाटी में किस तरह देखा जाएगा तो उन्होंने कहा, "मुख्य मुद्दा प्रवासी कश्मीरियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को खत्म करने के प्रस्ताव से जुड़ा है. इससे यह भी संकेत मिलता है कि इस आंदोलन का नेतृत्व कर रही जम्मू कश्मीर जॉइंट आवामी एक्शन कमेटी शायद पूरे कश्मीर मुद्दों का बोझ साझा करने के पक्ष में नहीं है. यह स्थानीय राजनीतिक मामलों में अधिक भागीदारी और कश्मीरी प्रवासियों के लिए आरक्षित सीटें हटाकर अपने राजनीतिक सशक्तिकरण की इच्छा को भी जाहिर करता है."

PoK में क्रूर और हिंसक कार्रवाइयों पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि समस्याओं का समाधान समायोजन और शांतिपूर्ण संवाद के जरिए होना चाहिए. पाकिस्तान में आजाद जम्मू और कश्मीर कहलाने वाले PoK का अपना प्रधानमंत्री और विधानसभा है तथा इसे अर्ध-स्वायत्त व्यवस्था कहा जाता है. हालांकि,वास्तविक सत्ता और अधिकार पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था के हाथों में ही हैं.

दिल्ली-NCR स्थित शिव नाडर विश्वविद्यालय (SNU) के शिक्षाविद और राजनीतिक विश्लेषक डॉ. सिद्दीक वहीद के मुताबिक ये प्रदर्शन 21वीं सदी की एक वैश्विक समस्या का प्रतीक हैं. उन्होंने कहा, "दुनिया भर में जनता और सरकारों के बीच तनाव बढ़ रहा है. पाकिस्तान भी इससे अछूता नहीं है लेकिन वहां यह तनाव लगातार और अधिक तीखा होता जा रहा है."

इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, कश्मीर के पूर्व कुलपति रहे वहीद ने प्रोफेसर बाबा की बात से सहमति जताते हुए कहा कि PoK में प्रदर्शनों का हिंसक दमन कश्मीर पर पाकिस्तान की नैतिक स्थिति को कमजोर करता है.

उन्होंने कहा, "यह केवल नैतिक स्थिति को कमजोर ही नहीं करता, बल्कि किसी भी ऐसे राज्य की नैतिक साख को धूमिल करता है जो लोगों के खिलाफ हिंसा का इस्तेमाल करता है. चाहे वे उसके अपने नागरिक हों या किसी विरोधी देश के लोग हों." हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता मीरवाइज उमर फारूक ने भी PoK की स्थिति पर चिंता व्यक्त की.

उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "LoC (नियंत्रण रेखा) के पार से आ रही खबरों से बेहद दुखी हूं. प्रदर्शन कर रहे एक दर्जन से अधिक नागरिकों और पुलिसकर्मियों की मौत बेहद दुखद है. वहां की सरकार को यह समझना चाहिए कि जनता की शिकायतों और मांगों से निपटने के लिए बल प्रयोग सही तरीका नहीं है."

उन्होंने आगे लिखा, "जब लोग अपनी चिंताओं को व्यक्त करने के लिए सड़कों पर उतरते हैं तो यह संकेत होता है कि वे अपनी बात सुने जाने की उम्मीद रखते हैं. सत्ता में बैठे लोगों की जिम्मेदारी है कि वे उनकी बात सुनें, संवाद करें और मामले का शांतिपूर्ण समाधान निकालें, न कि उसे हिंसा, मनमानी गिरफ्तारियों और जान-माल के नुकसान तक पहुंचने दें."

सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने इन मौतों की संयुक्त राष्ट्र (UN) से जांच कराने की मांग की. उन्होंने 11 जून को श्रीनगर में मीडिया से कहा, "संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार संस्था को वहां जाकर इन हत्याओं की जांच करनी चाहिए. दुनिया को पता चलना चाहिए कि वहां क्या हो रहा है. अत्याचार किए जा रहे हैं."

जम्मू क्षेत्र में प्रभावशाली राजनीतिक ताकत भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने भी इस हिंसा को जम्मू-कश्मीर और PoK के बीच विकास के अंतर के रूप में पेश किया. जम्मू-कश्मीर BJP के मुख्य प्रवक्ता सुनील सेठी ने कहा, "वहां के लोग जम्मू-कश्मीर के विकास मॉडल को देख रहे हैं. खासकर तब से जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं. PoK के लोग भी वही अधिकार चाहते हैं लेकिन उन्हें अधिकारों की जगह गोलियां मिल रही हैं."

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