इंडिया टुडे आर्काइव : फोटो जर्नलिस्ट रघु राय के शब्दों और कैमरे में दर्ज इंदिरा गांधी
फोटो जर्नलिस्ट रघु राय का 26 अप्रैल को निधन हो गया. उन्होंने इंडिया टुडे के 21 दिसंबर 2015 के अंक में यह आलेख लिखा था

जब 1966 में इंदिरा गांधी पहली बार प्रधानमंत्री बनीं, तब मुझे वे अनिच्छुक, संकोची और अनिश्चित स्वभाव से भरी दिखाई दी थीं. उस समय सोवियत संघ हमारा 'बिग ब्रदर' हुआ करता था. तत्कालीन प्रधानमंत्री अलेक्सी कोसिगिन भारत आए थे.
प्रोटोकॉल के अनुसार, इंदिरा जी को उनका स्वागत करना था. उन्हें हवाई अड्डे पर ही दो मिनट का भाषण देना था. मुझे याद है कि उनके हाथ कांप रहे थे और घबराहट के कारण उनकी आवाज लड़खड़ा रही थी.
कमाल की बात कि कुछ सालों के बाद उन्होंने 1980 में राष्ट्रपति लियोनिद ब्रेझनेव को सहारा देकर संभाला था. ब्रेझनेव खराब स्वास्थ्य के बावजूद भारत दौरे पर आए थे और बहुत कमजोर लग रहे थे. इंदिरा गांधी की यह मजबूती और आत्मविश्वास उनकी झिझक भरी शुरुआत से बिल्कुल विपरीत थे.
इंदिरा गांधी पर मेरी पहली किताब 'ए लाइफ इन द डे ऑफ इंदिरा गांधी' का विमोचन उन्होंने अपने घर पर किया था. जब संपादक और दूसरी हस्तियां अपनी प्रतियों पर दस्तखत कराने में व्यस्त थे, तब उन्होंने मेरी ओर देखा. उन्होंने पूछा, "रघु, क्या तुम अपनी प्रति पर हस्ताक्षर नहीं कराओगे?" जिस पर मैंने उत्तर दिया, "हम तो रोज़ मिलते रहते हैं." हमारे लिए इंदिरा गांधी कभी श्रीमती गांधी या मैडम प्राइम मिनिस्टर नहीं थीं, वे हमेशा 'इंदिराजी' थीं.
मेरा पक्के तौर पर मानना है कि एक प्रधानमंत्री के रूप में श्रीमती गांधी का कोई मुकाबला नहीं है. हमें शायद ही कभी ऐसा नेता मिला हो जिसने कला और संस्कृति में उनके जैसी गहरी रुचि दिखाई हो. लेकिन उनके भाग्य के उतार-चढ़ाव ने उन्हें एक बार फिर असुरक्षा की ओर धकेल दिया. आपातकाल के बाद मिली हार से पैदा हुए डर और 1980 में संजय की मृत्यु के बाद की असुरक्षा ने उन्हें अपने ही मंत्रियों तक के प्रति चौकन्ना कर दिया था.
उनकी अस्थिरता और असुरक्षा की राजनीति ने उनकी विरासत को बहुत प्रभावित किया है. यह वही राजनीति है जिसे हम आज भी देख रहे हैं. इंदिरा गांधी की विरासत पर अस्थिरता के बादल जरूर छाए रहे, लेकिन उनकी मृत्यु के 30 से अधिक वर्षों बाद भी वे बेजोड़ बनी हुई हैं.