लश्कर-ए-तैयबा के हेडक्वॉर्टर में हुई हत्या इस आतंकी संगठन के बारे में क्या बताती है?
लश्कर-ए-तैयबा के लिए फंडिंग का जुगाड़ करने वाले चौधरी बिलाल आरिफ सलाफी की हत्या संगठन में अंदरूनी खींचतान को उजागर करती है

लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के सीनियर कमांडर चौधरी बिलाल आरिफ सलाफी की पाकिस्तान के मुरीदके स्थित भारी सुरक्षा वाले हेडक्वॉर्टर मरकज-ए-तैयबा परिसर में दिनदहाड़े हत्या हो गई. यह घटना जाहिर करती है कि आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा में फैली खींचतान सिर्फ अंदरूनी झगड़े तक सीमित नहीं है.
यह कलह LeT के भीतर गहरी फूट का स्पष्ट संकेत बन गई है. शुरुआत में यह मामला कोई छोटी-मोटी गुटबाजी लग रही थी, जो अब एक चौंकाने वाली हकीकत की ओर इशारा कर रही है. एक ऐसी स्थिति जहां फंडिंग की ताकत और शीर्ष नेतृत्व से करीबी, वफादारी और आंतरिक अनुशासन पर हावी होती दिख रही है.
LeT संयुक्त राष्ट्र की तरफ से घोषित आतंकवादी संगठन है. उसकी अंधेरी और गुप्त कार्यप्रणाली को लेकर यह एक असामान्य खुलासा है. यह खुलासा उस आतंकी संगठन के बारे में भी है, जो 26/11 मुंबई हमलों और कश्मीर में लगातार हिंसा के लिए जिम्मेदार रहा है.
यह घटना संगठन के अंदर सिर्फ किसी प्रतिद्वंद्विता का मामला नहीं है, बल्कि लश्कर-ए-तैयबा के भीतर संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर करती है. विश्लेषकों के मुताबिक इससे पता चलता है कि पाकिस्तान के सबसे मजबूत प्रॉक्सी आतंकी नेटवर्क के अंदर एक बड़ी दरार है.
भारतीय सुरक्षा एजेंसियां इस घटना को सिर्फ लश्कर-ए-तैयबा की कमजोरी नहीं, बल्कि पाकिस्तानी डीप स्टेट की असफलता के तौर पर देख रही हैं. पाकिस्तान अभी भी संयुक्त राष्ट्र के जरिए प्रतिबंधित इस आतंकवादी संगठन को खुलकर मदद दे रहा है. यही वजह है कि यह मुरीदके से बिना किसी रोक-टोक के काम करता रहा है. इसके हेडक्वॉर्टर में आवासीय कॉलोनियां, प्रशिक्षण केंद्र और अलग-अलग वित्तीय साम्राज्य सब कुछ मौजूद हैं.
यह घटना ईद की नमाज के तुरंत बाद लाहौर के पास स्थित लश्कर-ए-तैयबा के मुख्यालय में हुई. सलाफी नमाज अदा करने के बाद बाहर निकला था और अन्य सदस्यों से बात कर रहा था, तभी लश्कर के दूसरे सीनियर मेंबर गाजी उबैदुल्लाह खान और उसकी पत्नी ने उस पर हमला कर दिया. दोनों एक ही कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए पहुंचे थे.
गाजी उबैदुल्लाह खान ने सलाफी पर कई गोलियां दागीं, जबकि उसकी पत्नी ने बार-बार चाकू से वार किया. यह हमला इतना जबरदस्त संगठन के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले परिसर के अंदर सलाफी मौके पर ही मर गया.
जानकारों ने सामने आई जानकारियों का हवाला देते हुए बताया कि यह हमला संगठनात्मक गुटबाजी की वजह से नहीं, बल्कि एक पुरानी व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण हुआ था.
लगभग चार साल पहले सलाफी ने कथित तौर पर खान के दामाद अबू बकर की हत्या कर दी थी. इस गंभीर घटना के बावजूद संगठन ने सलाफी के खिलाफ कोई सजा या कार्रवाई नहीं की. सलाफी संगठन में बिना किसी रोक-टोक के काम करता रहा. उसे यह सुरक्षा लश्कर-ए-तैयबा के सीनियर मेंबर जकी-उर-रहमान लखवी से निकट संबंधों की वजह से मिली थी.
इसी सुरक्षा के कारण सलाफी जवाबदेही से बचता रहा, जिससे समय के साथ उबैदुल्लाह खान के परिवार में गहरा आक्रोश बढ़ता गया. न्याय न मिलने की वजह से उबैदुल्लाह खान और उसकी पत्नी ने बदला लेने का मौका ढूंढा और मौका पाकर सलाफी पर हमला कर दिया.
खुफिया सूत्रों के मुताबिक, सलाफी लश्कर-ए-तैयबा के वित्तीय नेटवर्क में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था. शेखुपुरा में फंडरेजिंग (चंदा इकट्ठा करने) का काम देखता था और हर साल लगभग 40 लाख पाकिस्तानी रुपए जमा करता था. ये पैसे संगठन की गतिविधियों जैसे- हथियार खरीदने और लॉजिस्टिक्स के लिए जरूरी थे.
फंडिंग के लिए उसकी अहमियत और शीर्ष नेतृत्व से निकट संबंधों की वजह से अबू बकर की हत्या में शामिल होने के बावजूद उसे सुरक्षा मिलती रही. यह घटना साफ दिखाती है कि लश्कर में पैसे का योगदान सीधे तौर पर प्रभाव और सुरक्षा में बदल जाता है. इसके विपरीत, उबैदुल्लाह खान संगठन की ऑपरेशनल रीढ़ था. वह एक अनुभवी आतंकवादी था, जिसने 1993 से 2003 तक जम्मू-कश्मीर में सक्रिय रहकर कई आतंकी घटनाओं में हिस्सा लिया था.
बाद में पाकिस्तान लौटकर वह मुरीदके में ट्रेनर की भूमिका निभाने लगा. दशकों की सेवा के बावजूद, जब उसे व्यक्तिगत नुकसान हुआ तो संगठन ने उसे कोई संस्थागत समर्थन नहीं दिया. सलाफी के खिलाफ कोई कार्रवाई न होने से यह धारणा मजबूत हुई कि लश्कर में वफादारी और फील्ड अनुभव की कीमत फंडिंग जुटाने से कम है.
स्थानीय पुलिस और प्रशासन की भूमिका ने इस पूरी कहानी में एक और आयाम जोड़ दिया. शेखुपुरा के प्रशासनिक अधिकारियों ने अबू बकर की हत्या में सलाफी को क्लीन चिट दे दी थी. माना जाता है कि यह फैसला लखवी की स्थिति के प्रभाव में लिया गया था. यह एक बड़े पैटर्न को दिखाता है, जिसमें कानून शक्तिशाली लोगों के हितों के साथ खड़ा दिखता है, न कि निष्पक्ष न्याय के साथ.
इससे संगठन के अंदर की व्यवस्था और मजबूत होती है. इस घटना में शामिल सभी लोग तैयबा कॉलोनी में रहते थे, जो मुरीदके में लश्कर-ए-तैयबा के जरिए नियंत्रित आवासीय इलाका है. यहां संगठन के ऑपरेटिव्स और वरिष्ठ सदस्यों को घर दिए जाते हैं. जफर इकबाल जैसे लोगों का भी इसी कॉलोनी में रहना यह दिखाता है कि लश्कर का पूरा इकोसिस्टम कितना गहराई से संगठित और जड़ें जमाए हुए है.
फिर भी, इतने कड़े नियंत्रण वाले माहौल में भी अनसुलझे विवाद इतने खतरनाक रूप में सामने आ सकते हैं कि संगठन के सबसे सुरक्षित केंद्र में ही खून-खराबा हो जाए. भारतीय नजरिए से देखें तो यह घटना सिर्फ आंतरिक कलह से कहीं ज्यादा और बहुत कुछ जाहिर करती है.
यह पाकिस्तान में संगठित आतंकवादी ढांचे के अस्तित्व को उजागर करती है, जो मुख्यालय, आवासीय कॉलोनियां, प्रशिक्षण केंद्र और फंडिग के सिस्टम के साथ खुलकर काम कर रहा है. इससे पता चलता है कि आंतरिक सुरक्षा, सिलेक्टिव अकाउंटेबिलिटी और वित्तीय नेटवर्क को चलाने की भूमिकाओं से ऊपर रखने की वजह से ऐसे संगठनों में दरारें पैदा हो सकती हैं.
मुरीदके की यह हत्या लश्कर-ए-तैयबा के भीतर मौजूद एक बुनियादी असंतुलन को उजागर करती है. इससे पता चलता है कि जो लोग पैसे देते हैं और नेतृत्व से करीबी रखते हैं, उन्हें सुरक्षा मिलती है, जबकि लंबे समय से ऑपरेशनल काम करने वाले लोग बेकार समझे जाते हैं.