पाकिस्तान के रिहायशी इलाकों में सैन्य ठिकाने; क्या है भारत की दुविधा?

ऑपरेशन सिंदूर के वक्त भारत ने जवाबी कार्रवाई में काफी संयम बरता लेकिन ऐसे ढेरों सबूत मौजूद हैं जो दिखाते हैं कि पाकिस्तानी सेना ने अपने फायदे के लिए रिहायशी इलाकों में बनाए थे ठिकाने

पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान से क्या अनुरोध किया. (Photo: AP)
पाकिस्तानी पीएम शाहबाज शरीफ के साथ सेना प्रमुख आसिम मुनीर (फाइल फोटो)

ऑपरेशन सिंदूर में मिली सैन्य और रणनीतिक हार के ठीक एक साल बाद पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने भारत को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर भारत ने फिर कोई सैन्य कार्रवाई की तो उसके 'बहुत बड़े, खतरनाक और दर्दनाक' नतीजे होंगे.

लेकिन इस बयानबाजी के पीछे एक और बड़ी और विवादित सच्चाई सामने आई. मई 2025 के संघर्ष के दौरान कई सबूत सामने आए जिनसे पता चला कि पाकिस्तान की सेना ने गांवों, स्कूलों, एयरपोर्ट और रिहायशी इलाकों के बीच अपने ड्रोन, तोपें, रॉकेट और एयर डिफेंस सिस्टम तैनात किए थे.

एलओसी (LoC) और पाकिस्तान के अंदर के कई इलाकों, साथ ही पीओके (PoK) से मिले सबूत बताते हैं कि यह कोई गलती नहीं बल्कि एक सोची-समझी रणनीति थी. मकसद था सैन्य ठिकानों को आम लोगों के बीच छिपाना ताकि जवाबी कार्रवाई मुश्किल हो जाए और अगर हमला हो तो दुनिया के सामने नागरिकों के नुकसान का मुद्दा उठाया जा सके.

सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि जब सेना अपने हथियार और लॉन्च साइट्स आम आबादी के बीच रखती है तो युद्ध सिर्फ सीमा तक सीमित नहीं रहता बल्कि लोगों के घरों तक पहुंच जाता है.

विशेषज्ञों के मुताबिक इसके पीछे दो बड़े कारण हो सकते हैं. पहला, अगर सैन्य ठिकाने आम लोगों के बीच होंगे तो दुश्मन हमला करने से पहले कई बार सोचेगा क्योंकि नागरिकों के मारे जाने का खतरा बढ़ जाएगा. दूसरा, अगर हमला होता है और नागरिकों को नुकसान पहुंचता है तो उसका इस्तेमाल प्रचार, नैरेटिव वॉर और अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति पाने के लिए किया जा सकता है.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. एलओसी पर पाकिस्तान की सेना पर लंबे समय से आरोप लगते रहे हैं कि वह गांवों और आबादी वाले इलाकों के बीच मोर्टार और तोपें तैनात करती रही है. कई बार आतंकियों की घुसपैठ के लिए भी नागरिक घरों का इस्तेमाल लॉन्च पैड की तरह किया गया.

1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों के रिकॉर्ड में भी यह बात सामने आई थी कि पाकिस्तान ने गांवों और आबादी वाले इलाकों को फायरिंग पोजिशन की तरह इस्तेमाल किया था.

मई 2025 में जब भारत के 'ऑपरेशन सिंदूर' के जवाब में पाकिस्तान ने 'ऑपरेशन बुनियान-उल-मरसूस' चलाया था, उसने इस तरह की सैन्य तैनाती के तौर-तरीकों और उसके बड़े पैमाने पर दोबारा सबका ध्यान खींचा. कई रिपोर्ट्स और वायरल वीडियो में दावा किया गया कि पाकिस्तान और पीओके के कई नागरिक इलाकों को एक्टिव सैन्य ठिकानों में बदल दिया गया था.

8 और 9 मई 2025 की रात पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ कई ड्रोन हमले किए. रिपोर्ट्स के मुताबिक इन ड्रोन ऑपरेशन्स के लिए जिन जगहों का इस्तेमाल हुआ उनमें सियालकोट इंटरनेशनल एयरपोर्ट, पीओके के कोटली इलाके के जंदरोट में एक गर्ल्स स्कूल के पास बना ड्रोन लॉन्च साइट, हवेलियां के पधर इलाके का लॉन्च साइट और सिंध के इस्लामकोट स्थित माई बख्तावर इंटरनेशनल सिविल एयरपोर्ट शामिल थे.

स्कूलों और सिविल एयरपोर्ट जैसी जगहों के सैन्य इस्तेमाल को लेकर गंभीर चिंता जताई गई क्योंकि इससे आम लोगों की जान खतरे में पड़ सकती है.

रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि पाकिस्तान का चीनी मूल का SH-15 आर्टिलरी सिस्टम पंजाब के बरेला शरीफ गांव से चलाया गया था. सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों और वीडियो में यह हथियार गांव के बीच खड़ा दिखाई दिया.

एक दूसरा SH-15 सिस्टम रावलाकोट एडवांस लैंडिंग ग्राउंड के पास तैनात बताया गया, जहां से जम्मू-कश्मीर के पुंछ इलाके में फायरिंग की गई थी.

इसी तरह पाकिस्तान के चर्चित फतह रॉकेट सिस्टम को पंजाब के शकरगढ़ कस्बे में आबादी के बीच तैनात किए जाने की बात भी सामने आई. वायरल वीडियो में लोग रॉकेट लॉन्चर के पास खड़े होकर फायरिंग के दौरान खुशी मनाते दिखे.

इसके अलावा कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि पंजाब के गुजरात जिले के कोटला गांव में एयर डिफेंस गन सिस्टम लगाया गया था. वहीं जफरवाल में एक नागरिक घर की छत पर RBS-70 एयर डिफेंस सिस्टम तैनात था. कुछ आर्टिलरी सिस्टम स्कूलों के पास भी लगाए गए थे.

इन घटनाओं ने यह चिंता और बढ़ा दी है कि पाकिस्तान की सेना व्यवस्थित तरीके से नागरिक इलाकों का सैन्य इस्तेमाल कर रही है.

भारतीय अधिकारियों और कई स्वतंत्र विशेषज्ञों का लंबे समय से आरोप रहा है कि पाकिस्तान सीमा पर जानबूझकर नागरिक इलाकों को निशाना बनाता है ताकि भारत पर मानवीय और प्रशासनिक दबाव बनाया जा सके और सीमावर्ती लोगों में डर फैलाया जा सके.

सैन्य विशेषज्ञों के मुताबिक युद्ध के अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत अगर किसी जगह का इस्तेमाल हथियार रखने, लॉन्चिंग, फायरिंग या सैन्य सपोर्ट के लिए किया जा रहा हो तो वह जगह वैध सैन्य लक्ष्य मानी जा सकती है.

88 घंटे तक चले ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत ने कई ऐसे इलाकों पर सीधा हमला करने से परहेज किया जहां सैन्य ठिकाने नागरिक आबादी के बीच थे, ताकि आम लोगों को नुकसान कम से कम पहुंचे.

दूसरी तरफ, जानकारों का कहना है कि पाकिस्तानी सेना के गांवों, स्कूलों, हवाई अड्डों और रिहायशी इलाकों में बार-बार हथियार तैनात करने से खुद पाकिस्तान के आम लोगों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं. वहां के आम लोग इस बात से बिल्कुल अनजान हैं कि उनके आस-पास सेना की इस तैनाती से उन पर कानूनी और शारीरिक रूप से कितना बड़ा खतरा मंडरा रहा है. इससे आम जनता के इलाकों और फौजी ठिकानों के बीच का फर्क ही खत्म हो जाता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत यह फर्क बनाए रखना बेहद जरूरी माना गया है.

मई 2025 की आमने-सामने की जंग के बाद, भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, पाकिस्तान के इस तरह हथियार तैनात करने के तौर-तरीकों पर विवाद बना रहेगा. रणनीतिक, मानवीय और कूटनीतिक स्तर पर इस पर पैनी नजर रखी जाएगी.

कुल मिलाकर, 'ऑपरेशन बुनियान-उल-मरसूस' की घटनाओं ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि आम आबादी के बीच सैन्य साजो-सामान छिपाने के कितने खतरनाक नतीजे हो सकते हैं. एक ऐसी हरकत, जो लड़ाई के वक्त सीधे-साधे कस्बों और गांवों को युद्ध के मैदान में बदल देने का खतरा पैदा करती है.

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