भारतीय पुरुषों के लिए ‘साइलेंट किलर’ बन रही उनकी लाइफस्टाइल!

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) के मुताबिक, लंबे समय तक बैठे रहकर काम करने वाली जीवनशैली, अस्वस्थ खानपान, तनाव और सीमित शारीरिक गतिविधियां बीमारियों के स्वरूप को बदल रही हैं

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

केंद्र सरकार के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) के आंकड़े बताते हैं कि अस्वस्थ भारतीय पुरुषों को लेकर हमारी पारंपरिक सोच को अब बदलने की जरूरत है. अब यह जरूरी नहीं कि चाय की दुकान पर बैठकर धूम्रपान करने वाला व्यक्ति ही सेहत के सबसे बड़े खतरे का सामना कर रहा हो.

बढ़ते मामलों से संकेत मिलता है कि सबसे अधिक जोखिम उस दफ्तर में काम करने वाले कर्मचारी को हो सकता है जो लैपटॉप के सामने घंटों बैठा रहता है. जो लंबी दूरी तय करके काम पर जाता है और लगातार तनाव झेलता है. ऐसी जीवनशैली के कारण उसके शरीर के मेटाबॉलिक संकेतक, जैसे ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर का स्तर धीरे-धीरे खराब होते जा रहे हैं.

दशकों तक भारत में पुरुषों के लिए चलाए गए जनस्वास्थ्य अभियानों का मुख्य फोकस तंबाकू रहा है. सिगरेट, बीड़ी और चबाने वाले तंबाकू को पुरुषों के स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा जोखिम माना जाता रहा है. हालांकि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के जरिए 2023-24 में कराए गए NFHS-6 के आंकड़े संकेत देते हैं कि अब खासकर शहरी भारत में एक नया खतरा उभर रहा है और ये खतरा हैं- मेटाबॉलिक बीमारियां.

सर्वेक्षण के मुताबिक, 15 साल और उससे अधिक आयु के 36.3 फीसद पुरुष किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते हैं. वहीं 20.9 फीसद पुरुषों में ब्लड शुगर का स्तर पहले से अधिक या बहुत अधिक पाया गया है. वे इसे नियंत्रित करने के लिए दवाएं ले रहे हैं. इसी तरह 22.1 फीसद पुरुषों का रक्तचाप सामान्य से अधिक है या वे हाइपरटेंशन के इलाज पर हैं.

शहरी क्षेत्रों में स्थिति और अधिक चिंताजनक है. यहां 23.9 फीसद पुरुषों में हाई ब्लड शुगर और 26.2 फीसद पुरुषों में हाई ब्लड प्रेशर पाया गया है. हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक ये आंकड़े देश में बीमारियों के स्वरूप और बोझ में बदलाव का संकेत देते हैं. तंबाकू अभी भी एक बड़ा जोखिम है लेकिन तेजी से बढ़ती चुनौती अब ऐसी बीमारियां हैं जो असंतुलित खानपान, आरामतलबी और तनाव से जुड़ी हैं.

यह प्रवृत्ति NFHS-6 रिपोर्ट के अन्य मानकों में भी दिखाई देती है. शहरी क्षेत्रों में एक-तिहाई से अधिक पुरुष (36.3 फीसद) अधिक वजन वाले या मोटापे के शिकार हैं. शोधकर्ताओं का कहना है कि मोटापा, डाइबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर अक्सर एक साथ पाए जाते हैं. ये मिलकर ऐसे जोखिमों का समूह बनाते हैं जो आगे चलकर हृदय रोग, स्ट्रोक और गुर्दे की समस्याओं की आशंका को काफी बढ़ा देते हैं.

डॉक्टरों का कहना है कि पिछली पीढ़ियों की तुलना में आज के समय में जोखिमों की प्रकृति काफी बदल चुकी है. पहले स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं मुख्य रूप से संक्रामक रोगों, खराब स्वच्छता या तंबाकू सेवन से जुड़ी होती थीं लेकिन आज का शहरों में रहने वाले नौकरी-पेशा वाले लोग अधिक समय तक कुर्सी पर बैठकर काम करते हैं. इतना ही नहीं ये लोग ट्रैफिक में लंबा समय बिताते हैं, कम नींद लेते हैं, अधिक कैलोरी वाला भोजन करते है और शारीरिक गतिविधियां बहुत कम करते हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव से निपटने के लिए अलग रणनीति अपनाने की जरूरत है. बीमारियों की अगली बड़ी लहर को रोकने के लिए पोषण, नियमित शारीरिक गतिविधि, समय-समय पर स्वास्थ्य जांच, कार्यस्थल पर स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं और डायबिटीज (मधुमेह) व हाई ब्लड प्रेशर को लेकर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है.

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