विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद नॉर्थ-साउथ के विभाजन की बात पर तूफान क्यों उठ गया?

कांग्रेस के हाथ से उत्तर के दो राज्यों के निकल जाने के बाद उत्तर-दक्षिण के बीच के अंतर पर बहस छिड़ गई है.

राजस्थान में चुनाव के नतीजे आने के बाद जश्न मानते बीजेपी के कार्यकर्ता

3 दिसंबर 2023 को चार विधानसभा चुनावों के नतीजे आए - राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना. जाहिर है कि इसमें एक दक्षिण भारत और 3 उत्तर भारत के राज्य शामिल थे. तीनों उत्तर भारतीय राज्यों में जहां बीजेपी ने जीत हासिल की तो वहीं इकलौते दक्षिण भारतीय राज्य तेलंगाना में कांग्रेस ने बाजी मारी. इससे पहले दक्षिण के राज्यों में से एक कर्नाटक में कांग्रेस ने कुछ वक्त पहले ही सरकार बनाई है लेकिन इन नतीजों में उत्तर के दो राज्य कांग्रेस के हाथ से निकल गए.

सोशल मीडिया पर मचा बवाल

नतीजों के हवाले से लोगों ने उत्तर-दक्षिण के बीच कथित अंतर की बात करनी शुरू कर दी और नॉर्थ के लोगों के खिलाफ उल्टे-सीधे पोस्ट लिखे गए. जहां कुछ लोगों ने दक्षिण के लोगों को ज्यादा समझदार बताया तो कुछ ने हिंदी पट्टी को ही कोसना शुरू कर दिया. पोस्ट न केवल बेवकूफी से भरे थे बल्कि अपमानजनक भी थे. पूरी बहस के बीच कांग्रेस की इकाई प्रोफेशनल्स कांग्रेस के चेयरमैन प्रवीण चक्रवर्ती ने भी ट्वीट करते हुए लिखा,

"नॉर्थ-साउथ की खाई और भी ज्यादा गहरी और स्पष्ट होती जा रही है"

इस पोस्ट को प्रवीण चक्रवर्ती ने कुछ ही समय बाद डिलीट कर दिया, मगर ये तो सोशल मीडिया है. स्क्रीनशॉट लेने वाले धुरंधर इसी फिराक में मोबाइल हाथ में लेकर बैठे रहते हैं कि एक मौका मिले और हम टूट पड़ें. हुआ भी यही. बीजेपी के सदस्य सी आर केसवन ने इस पोस्ट का स्क्रीनशॉट नत्थी करते हुए अपने ट्विटर हैंडल से लिखा,

"भारत को जाति के आधार पर विभाजित करने और सनातन धर्म को उखाड़ फेंकने के वंशवादी कांग्रेस पार्टी के एजेंडे को हमारे लोगों ने सिरे से खारिज कर दिया है. अब उनकी विषैली योजना भारत पर उत्तर-दक्षिण विभाजन करके आक्रमण करने की है. 2024 में कांग्रेस इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दी जाएगी." 

इसके बाद कई पत्रकारों और नेताओं ने इस मसले पर ट्ववीट करते हुए अपनी राय रखी. जहां कांग्रेस नेता कार्ति पी चिदंबरम ने तेलंगाना चुनाव के नतीजों के बाद बोल्ड अक्षरों में 'द साउथ!' लिखा तो वहीं कॉलमनिस्ट सुधींद्र कुलकर्णी  ने लिखा कि नॉर्थ-साउथ की खाई एक झूठ है. यह न तो सच है और न ही जरूरी. कांग्रेस को इस बात पर तसल्ली करने के बजाय कि वह अब दक्षिण में दो राज्यों पर शासन करती है, आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि वह उत्तर में शून्य राज्य पर शासन क्यों करती है.  

नतीजों के दौरान पत्रकार निधि राजदान ने भी इस मुद्दे पर अपनी बात रखी. उन्होंने कहा, 

"छत्तीसगढ़ में अब बीजेपी ने बढ़त बना ली है. एमपी में इतनी निर्णायक जीत हासिल करना अविश्वसनीय है. इससे पता चलता है कि वे हिंदी पट्टी में ताकतवर बने हुए हैं. तेलंगाना में कांग्रेस की जीत महत्वपूर्ण है, जिसने उत्तर दक्षिण विभाजन को मजबूत किया है. क्या कर्नाटक के बाद कांग्रेस अति आत्मविश्वास में आ गई? विचार करने के लिए बहुत सारे प्रश्न हैं."


निधि राजदान की इस ट्वीट पर रिप्लाई करते हुए भाजपा नेता सुब्रमणियम स्वामी ने लिखा, 

"हिंदी पट्टी को हिंदुत्व, राम मंदिर और स्वदेशी पसंद है. यहां तक ​​कि 1977 के चुनावों में भारत को श्रीमती जी (इंदिरा गांधी) की तानाशाही से मुक्त कराने में भी यह हिंदी पट्टी ही थी जिसने आम चुनावों में कांग्रेस और श्रीमती जी (इंदिरा गांधी) और संजय गांधी का सफाया करके भयावह आपातकाल को उखाड़ फेंका था. दक्षिण ने श्रीमती गांधी के लिए मतदान किया था."

जहां कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर उपजी इस चिंगारी को हवा देने का काम किया तो वहीं कई लोगों ने मुखर रूप से विरोध करते हुए इसे बेबुनियाद और विभाजनकारी राजनीति का हिस्सा बताया. लोगों ने इस बात को दर्ज किया कि उत्तर में ये 2 राज्य हारने से पहले 2018 में यहीं के लोगों ने कांग्रेस को जिताया था. अचानक 5 साल के बाद हिंदी पट्टी के मतदाताओं की समझदारी में फर्क तो आ नहीं सकता. 

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