क्या नोएडा में मजदूर प्रदर्शन भड़कने में तेज गर्मी ने भी अहम भूमिका निभाई?
एक अध्ययन में सामने आया है कि नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन के पीछे तेज गर्मी के कारण उनमें आया 'हीट स्ट्रेस' भी हो सकता है

13 अप्रैल को नोएडा के औद्योगिक इलाके में हजारों फैक्ट्री मजदूर सड़कों पर उतर आए. करीब 300 फैक्टरियों को बंद करा दिया गया. हर न्यूज चैनल और अखबार ने इस प्रोटेस्ट के लिए एक ही बात को जिम्मेदार बताया- मजदूरों का शोषण और कम वेतन. हालांकि, यह पूरी कहानी नहीं है.
कंपनियों में काम करने वाले मजदूरों को लेकर फरवरी 2026 में हिट वॉच और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के जरिए एक सर्वे और रिसर्च की गई. ब्रेकिंग पॉइंट: हीट एंड द गार्मेंट फ्लोर नाम की इस सर्वे रिपोर्ट में इस तरह के विरोध प्रदर्शनों के लिए जलवायु परिवर्तन को एक प्रमुख कारण माना गया है.
बतौर रिपोर्ट, जलवायु परिवर्तन ही असली वजह है जो अप्रत्यक्ष तौर पर इस तरह के विरोध प्रदर्शनों को भड़का रहा है. दरअसल, नोएडा में विरोध प्रदर्शन 13 अप्रैल को नहीं, बल्कि यह 10 अप्रैल को ही शुरू हुए थे. इसकी शुरुआत तब हुई, जब फेज-2 होजियरी कॉम्प्लेक्स के हजारों गारमेंट मजदूरों ने हड़ताल कर दी. वे पड़ोसी राज्य हरियाणा के बराबर वेतन चाहते थे. हरियाणा सरकार ने हाल ही में न्यूनतम वेतन में 35 फीसद की बढ़ोतरी कर दी है, जिससे अकुशल मजदूरों का मासिक वेतन ₹11,274 से बढ़कर ₹15,220 हो गया.
इसके बाद ही नोएडा में मजदूरों का आंदोलन बहुत तेजी से फैला. मदरसन ग्रुप, रिचा ग्लोबल और दूसरे कई कपड़ा निर्यातकों की फैक्टरियों में भी हड़ताल शुरू हो गई. नोएडा के मजदूर अब ₹20,000 प्रतिमाह न्यूनतम सैलरी चाहते थे. उनका तर्क था कि PF और ESI कटने के बाद बचा हुआ पैसा दिल्ली-एनसीआर जैसे महंगे इलाके में गुजारा चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है.
15 अप्रैल को यह विरोध हिंसक हो गया और प्रदर्शन के दौरान गाड़ियां जला दी गईं. इस विरोध प्रदर्शन को लेकर 396 से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी थी, तब उत्तर प्रदेश सरकार ने अस्थायी वेतन बढ़ोतरी की घोषणा कर दी. जिला प्रशासन के जरिए किए गए घोषणा के मुताबिक, अकुशल मजदूर: ₹11,313 से बढ़कर ₹13,690 प्रति माह, अर्धकुशल: ₹12,445 से बढ़कर ₹15,059 और कुशल कर्मचारियों का वेतन ₹13,940 से बढ़ाकर ₹16,868 कर दिया गया.
प्रशासन का कहना है कि कंपनियां अंतिम वेतन दरें मई से तय करेंगी. हालांकि, रिसर्च कहता है कि विरोध प्रदर्शनों को कम करके आंका जाना इसके बढ़ने की प्रमुख वजह थी. इस दौरान शहर की गर्मी तेजी से बढ़ रही थी. प्रदर्शन शुरू होने के समय नोएडा में तापमान 36-39°C था और आगे 42°C तक जाने का अनुमान था. जो मजदूर आंदोलन में सबसे आगे थे, वे या तो ठेका मजदूर थे या दूसरे राज्यों से आए माइग्रेंट.
रिसर्च के मुताबिक, गारमेंट और होजियरी सेक्टर के कर्मचारियों पर गर्मी का काफी बुरा असर पड़ता है. ‘ब्रेकिंग पॉइंट: हीट एंड द गार्मेंट फ्लोर’ नाम के इस रिसर्च में तमिलनाडु, दिल्ली-NCR और गुजरात की 15 फैक्टरियों में कुल 115 गारमेंट मजदूरों को शामिल किया गया. इसमें 47 लोगों से काफी गहराई से सवाल-जवाब किए गए.
रिसर्च में पाया गया कि 87 फीसद मजदूरों ने पिछले 12 महीनों में गर्मी के कारण शरीर पर पड़ने वाले बुरे असर के बारे में बताए. उन्होंने कहा कि गर्मी के दिनों में उन्हें अक्सर सिरदर्द, चक्कर आना, कमजोरी और मांसपेशियों में ऐंठन जैसी समस्या होती है. इसके अलावा 69 फीसद मजदूरों ने कहा कि गर्मी के कारण उनका काम करने का तरीका प्रभावित हुआ है.
सबसे गंभीर बात यह है कि 78 फीसद मजदूरों ने उत्पादन लक्ष्य पूरा करने के लिए शौचालय जाने का ब्रेक भी छोड़ दिया, जिससे उनके शरीर में गर्मी का तनाव (हीट स्ट्रेस) बढ़ गया. ऐसे लोगों में हीट स्ट्रेस उन मजदूरों की तुलना में लगभग दोगुना हो गया जो ब्रेक लेते थे.
लगभग 45 फीसद मजदूरों के टॉयलेट के कलर से पता चला कि उनके शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) हो जाती है. इतना ही नहीं गर्मी में इनके किडनी पर भी असर पड़ता है. ज्यादातर फैक्ट्रियों के फ्लोर गर्मी की चपेट में हैं. सर्वे किए गए 15 में से 11 फैक्टरियों की छत धातु या ऐस्बेस्टस की बनी थी. जेट-डाईंग मशीनें 125-130°C तापमान पर चलती हैं. 7 फैक्टरियों में तापमान या नमी मापने का कोई उपकरण ही नहीं था. जिन 4 फैक्टरियों में उपकरण थे, वहां सेंसर सिर्फ खरीदार (बायर) के आने पर ही चालू किए जाते थे.
इस मौसम के दौरान इन मजदूरों की कमाई भी कम जाती है. दिल्ली के अनौपचारिक मजदूरों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि औसत तापमान में 1°C की बढ़ोतरी से मजदूरों की दैनिक कमाई 16 फीसद कम हो जाती है और मेडिकल खर्च 14 फीसद बढ़ जाता है.
जर्नल ऑफ पॉलिटिक इकोनॉमी ने दिल्ली-NCR की गारमेंट फैक्टरियों पर एक रिसर्च किया. इसमें पता चला कि तापमान में हर 1°C बढ़ोतरी से फैक्ट्री का उत्पादन 2 फीसद कम हो जाता है. 2025 के स्प्रिंगर नेचर के रिसर्च में 3,000 अनौपचारिक मजदूरों पर जांच की गई, जिसमें गारमेंट मजदूरों में 98.5 फीसद हीट-संबंधित प्रोडक्टिविटी लॉस यानी उत्पादकता में कमी पाई गई.
गर्मी का बोझ इन मजदूरों के साथ ही घर तक जाता है. दिल्ली में रात का ठंडा होना 2001 से अब तक 42 फीसद कम हो गया है. दिन और रात के बीच तापमान का अंतर 15°C से घटकर 2025 में सिर्फ 8.6°C रह गया है. ज्यादातर आंदोलनरत मजदूर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आए प्रवासी हैं, जो तंग और बिना हवा वाले कमरों में रहते हैं.
एक रिसर्च में सामने आया है कि रात में तापमान 25°C से ऊपर रहने पर नींद बहुत खराब हो जाती है. नतीजा मजदूर अगले 12 घंटे की शिफ्ट में अच्छी नींद लिए बिना ही पहुंच जाते हैं. भारत के श्रम कानून में इन समस्याओं का कोई समाधान नहीं है.
सरकार ने 2020 के व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियां कानून के जरिए काम के घंटे बढ़ाकर 12 घंटे कर दिए थे. नोएडा मजदूरों की मुख्य शिकायतों में से एक इस फैसले का विरोध भी है. देश का कानून गर्मी को व्यावसायिक खतरे के रूप में मान्यता ही नहीं देता.
1948 का फैक्ट्रीज एक्ट सिर्फ बंद फैक्ट्री कमरों पर लागू होता है और अनौपचारिक या खुले में काम करने वाले मजदूरों पर बिल्कुल लागू नहीं होता. हीटवेव को भारत के 12 राष्ट्रीय आपदा सूची में शामिल नहीं किया गया है, इसलिए राज्य राहत के लिए सिर्फ 10 फीसद ही धनराशि मिलती है.
काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवॉयरमेंट एंड वॉटर (CEEW) ने 15 राज्यों के हीट एक्शन प्लान की समीक्षा की. उनमें से सिर्फ 2 राज्यों ने मजदूरों के समूह स्तर पर गर्मी का जोखिम आकलन किया था. उत्तर प्रदेश का हीट एक्शन प्लान पानी, छाया और ORS की बात करता है, लेकिन फैक्ट्री फ्लोर की गर्मी को लेकर कोई कानूनी रूप से लागू नियम नहीं तय करता है.
इस समस्या को पूरी तरह समझना तब तक संभव नहीं है, जब तक हम जलवायु के कारक को स्वीकार न करें. पिछले कुछ समय में कई रिसर्च ने यह कहा है कि काम की स्थितियों में निश्चित रूप से बहुत बड़ा सुधार जरूरी है.
हालांकि, ज्यादा गर्मी का तनाव ही मजदूरों की तकलीफ का मुख्य कारण है. भारतीय अर्थव्यवस्था में 85 फीसद मैनपावर अनौपचारिक (इनफॉर्मल) है और देश के 57 फीसद जिलों में गर्मी का जोखिम उच्च से बहुत उच्च स्तर का है. एक और झुलसाने वाली गर्मी का मौसम आने वाला है. ऐसे में क्या हम मजदूरों पर कारखाना या उद्योगों में पड़ने वाले गर्मी के बोझ को नजरअंदाज कर सकते हैं?