नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का असल फायदा किसे मिलेगा?
IGI पर 'पीक-ऑवर' की भीड़भाड़ का असर जेवर पर 2029-30 से ही पड़ना शुरू होगा, तभी दिल्ली का बड़ा ट्रैफिक नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट की तरफ मुड़ेगा

रनवे अब तैयार है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 मार्च को उत्तर प्रदेश के जेवर में 11,282 करोड़ रुपए के ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट- नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पहले फेज़ का उद्घाटन किया. केंद्र सरकार इसे दिल्ली-NCR के दूसरे इंटरनेशनल गेटवे (इंदिरा गांधी इंटरनेशनल यानी IGI एयरपोर्ट के बाद) के तौर पर पेश कर रही है.
उद्घाटन समारोह तो आसान काम था. असल और मुश्किल सवाल, जिससे एयरलाइंस, यात्रियों और कार्गो ऑपरेटर्स को आने वाले कई सालों तक जूझना होगा, वह यह है: यह एयरपोर्ट आखिर है किसके लिए? इसका जवाब एयरपोर्ट के ही 'फीजिबिलिटी डॉक्यूमेंट' में छिपा है, जिसे इंडिया टुडे ने खंगाला है. यह जवाब उद्घाटन के भाषणों से कहीं ज्यादा सटीक है.
2018 में, 'प्राइसवाटरहाउसकूपर्स' (PwC) ने इस प्रोजेक्ट को देख रही 'यमुना एक्सप्रेसवे इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी' (YEIDA) के लिए एयरपोर्ट की 'टेक्नो-इकोनॉमिक फीजिबिलिटी रिपोर्ट' तैयार की थी. डिमांड का पता लगाने के लिए, PwC ने एक बहुत ही कारगर तरीका अपनाया. उसने तीन दिनों तक दिल्ली के IGI एयरपोर्ट के तीनों टर्मिनलों पर यात्रियों का सर्वे किया, ताकि यह पता चल सके कि वे असल में आ कहां से रहे हैं.
इसके नतीजे काफी चौंकाने वाले और बड़ी उम्मीदों की हवा निकालने वाले थे. IGI आने वाले 57.5 प्रतिशत यात्री दिल्ली (NCT) से होते हैं. यूपी का गौतम बुद्ध नगर जिला (जिसमें नोएडा और जेवर आते हैं) IGI के कुल ट्रैफिक में सिर्फ 5.71 प्रतिशत का ही योगदान देता है. गाजियाबाद का हिस्सा 1.51 प्रतिशत है. यूपी के सभी जिले मिलकर IGI के घरेलू यात्रियों में सिर्फ 11-12 प्रतिशत और अंतरराष्ट्रीय ट्रैफिक में 4-5 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखते हैं. ये आंकड़े हमें जमीनी हकीकत बताते हैं कि असल में 'शॉर्ट-टर्म' डिमांड कहां है.
PwC ने नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के संभावित यूजर्स को तीन ग्रुप्स में बांटा है. पहला और सबसे सीधा ग्रुप है जिसे रिपोर्ट में "एक्सक्लूसिव हिंटरलैंड" कहा गया है. इसमें वे इलाके आते हैं जहां जेवर असल में IGI के मुकाबले ज्यादा फायदेमंद है: आगरा, मथुरा, अलीगढ़ और गौतम बुद्ध नगर जिले के दक्षिणी हिस्से.
आगरा से जेवर पहुंचने में करीब 2.5 घंटे लगते हैं, जबकि IGI पहुंचने में 3.5 घंटे लगते हैं. अनुमान था कि 2022-23 में इस बेल्ट से 1 करोड़ से ज्यादा यात्री मिल सकते थे, जो 2049-50 तक बढ़कर 3 करोड़ हो जाएंगे. यह नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का सबसे मजबूत बाजार है. एक ऐसा क्षेत्र जिसके पास अपना कोई कमर्शियल एयरपोर्ट नहीं है, जिसे IGI के मुकाबले जेवर की दूरी कम होने का सीधा फायदा मिलता है, और जहां ताजमहल के कारण टूरिज्म का तगड़ा खिंचाव है.
PwC सर्वे के मुताबिक, IGI से होकर जाने वाले 18 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय यात्रियों ने कहा कि वे अपनी ट्रिप के दौरान आगरा जाएंगे और इनमें से करीब 60 प्रतिशत ने शहर के करीब किसी एयरपोर्ट को तरजीह दी. नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट बिल्कुल वही एयरपोर्ट साबित हो सकता है.
और फिर आता है नोएडा. यहां 'फीजिबिलिटी रिपोर्ट' पूरी तरह से बेबाक है. इसके मुताबिक, भले ही नोएडा से IGI और जेवर पहुंचने का समय लगभग एक जैसा है, लेकिन दूरी के मामले में IGI करीब 25 किलोमीटर पास पड़ता है. रिपोर्ट का निष्कर्ष था: "नोएडा रीजन के लोगों का झुकाव IGI एयरपोर्ट की तरफ ही ज्यादा रहेगा, जब तक कि नोएडा से जेवर एयरपोर्ट के बीच मेट्रो लिंक जैसे कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स पूरे नहीं हो जाते."
इसी संदर्भ में, 16,000 करोड़ रुपए की लागत वाले 'गाजियाबाद-जेवर रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम' (RRTS) को 2031 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है. जब तक इनमें से कोई एक कॉरिडोर पूरा नहीं हो जाता, तब तक पांच लाख से ज्यादा की आबादी वाला नोएडा शहर, जेवर एयरपोर्ट का स्वाभाविक ग्राहक नहीं है.
तीसरा ग्रुप है दिल्ली का 'स्पिलओवर' यानी वहां से छलक कर आने वाला ट्रैफिक. पूर्वी दिल्ली, दक्षिण-पूर्वी दिल्ली और मध्य दिल्ली के कुछ हिस्सों के यात्रियों के लिए, नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट एक भरोसेमंद विकल्प तभी बन सकता है जब IGI पूरी तरह से भर जाए. दिल्ली का एयरपोर्ट फिलहाल अपनी क्षमता का करीब 87 प्रतिशत इस्तेमाल कर रहा है, और वित्त वर्ष 2024-25 में वहां से 7.92 करोड़ यात्रियों ने उड़ान भरी.
फीजिबिलिटी रिपोर्ट का अनुमान है कि IGI पर 'पीक-ऑवर' की भीड़भाड़ का असर जेवर पर 2029-30 से ही पड़ना शुरू होगा, तभी दिल्ली का बड़ा ट्रैफिक नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट की तरफ मुड़ेगा. और तब भी, PwC का अनुमान था कि दिल्ली के हवाई ट्रैफिक का सिर्फ 30 प्रतिशत हिस्सा ही ड्राइविंग की दूरी के लिहाज से नोएडा एयरपोर्ट के करीब है. द्वारका, जनकपुरी या उसके आस-पास से आने वाले यात्रियों के लिए IGI ही इकलौती पसंद बना रहेगा.
नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के लिए सबसे बड़ा और फौरी फायदा 'कार्गो' का है. PwC एनालिसिस के मुताबिक, IGI पर होने वाले कार्गो मूवमेंट का करीब 75 प्रतिशत हिस्सा दिल्ली-NCR से आता है, और गौतम बुद्ध नगर व गाजियाबाद मिलकर 'हिंटरलैंड कार्गो मूवमेंट' में 50 प्रतिशत का योगदान देते हैं. इसके मायने बहुत बड़े हैं. माल का एक बहुत बड़ा हिस्सा जो अभी ट्रकों के जरिए पूरी दिल्ली पार करके IGI तक भेजा जाता है, उसे जेवर के रास्ते कहीं ज्यादा आसानी से भेजा जा सकेगा.
नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पहले फेज़ में एक इंटीग्रेटेड कार्गो हब (शुरुआती क्षमता 2.5 लाख मीट्रिक टन, जिसे बढ़ाकर 18 लाख मीट्रिक टन किया जा सकेगा) के अलावा, 40 एकड़ का एक डेडिकेटेड MRO (मेंटेनेंस, रिपेयर और ऑपरेशंस) फैसिलिटी भी शामिल है. ऐसा मुख्य रूप से YEIDA कॉरिडोर से आने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और औद्योगिक सामानों की वजह से है.
फीजिबिलिटी रिपोर्ट में ट्रैफिक के अनुमान भी फेज के हिसाब से दिए गए हैं. PwC ने अनुमान लगाया था कि 2025-26 तक नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट करीब 73.5 लाख यात्रियों को हैंडल करेगा. लेकिन उद्घाटन में हुई देरी और फिलहाल किसी 'रैपिड रेल लिंक' के न होने को देखते हुए, यह आंकड़ा थोड़ा ज्यादा ही आशावादी लगता है.
इस एयरपोर्ट के पहले फेज़ की डिजाइन क्षमता सालाना 1.2 करोड़ यात्रियों की है. इसका 3,900 मीटर लंबा इकलौता रनवे बड़े 'वाइड-बॉडी' विमानों को संभाल सकता है. इंडिगो यहां की पहली कैरियर (एयरलाइन) होगी, और अकासा एयर ने भी यहां से घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानें शुरू करने के संकेत दिए हैं. शॉर्ट-टर्म में 1.2 करोड़ यात्रियों का वह लक्ष्य हासिल होगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कितनी एयरलाइंस और यात्री यहां आते हैं.
PwC एनालिसिस कहता है कि एयरलाइंस नए रूट तभी खोलेंगी जब उनके पास ट्रैफिक का एक न्यूनतम 'थ्रेशोल्ड' होगा. लेकिन नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के 'एक्सक्लूसिव हिंटरलैंड' वाले यात्री तब तक IGI से ही उड़ान भरते रहेंगे, जब तक कि एयरलाइंस उन्हें वहां न जाने की कोई ठोस वजह नहीं दे देतीं.
नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट यकीनन एक बहुत बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है जो एक असली समस्या को हल कर रहा है. पश्चिमी यूपी और आगरा-मथुरा-अलीगढ़ बेल्ट में किसी कमर्शियल एयरपोर्ट का न होना, और YEIDA क्षेत्र के औद्योगिक सामानों को दिल्ली के रास्ते भेजने की भारी लागत, इस एयरपोर्ट को बहुत उपयोगी बनाती है. लेकिन नोएडा के यात्रियों के लिए, यह पूरा 'फीजिबिलिटी केस' काफी हद तक उस इंफ्रास्ट्रक्चर पर टिका है जो आज की तारीख में मौजूद ही नहीं है. रनवे तो खुल गया है. लेकिन 'कैचमेंट' यानी यात्रियों को यहां तक लाने वाला नेटवर्क अभी भी बन ही रहा है.