किस तेजी से फैल रहा है कोरोना का नया वेरिएंट, भारत कितना तैयार?
भारत में कोरोना वायरस का नया वेरिएंट तेजी से फैल रहा है. निरंतर निगरानी, कमजोर वर्गों की सुरक्षा और जन-जागरूकता के जरिए भारत इस समस्या को आसानी से हरा सकता है

दुनिया भर में कोविड-19 के मामलों में एक बार फिर बढ़ोतरी देखी जा रही है. इस बार कोरोना वायरस के नए वेरिएंट के फैलने की बात कही जा रही है. शुरुआती संकेत बताते हैं कि यह नया स्ट्रेन ज्यादा तेजी से फैल सकता है, लेकिन अभी इसकी गंभीरता बढ़ने का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है.
पिछले कुछ हफ्तों में एशिया और यूरोप के कई देशों में संक्रमण के मामले धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं. यह बढ़ोतरी ओमिक्रॉन के सबवैरिएंट्स के कारण हुई है. अंतरराष्ट्रीय निगरानी रिपोर्ट्स के मुताबिक, दुनिया के कुछ हिस्सों में हर हफ्ते केसों की संख्या में अनुमानित 10-15 फीसद की बढ़ोतरी हुई है.
भारत में कोविड-19 के इस नए वेरिएंट्स के मामले अब भी कम हैं, लेकिन कई शहरों में रोजाना केस बहुत कम (दो अंकों) से बढ़कर कई सौ तक पहुंच गए हैं. मुंबई, बेंगलुरु और केरल के कुछ हिस्सों जैसे शहरों में छोटे-छोटे क्लस्टर बनने लगे हैं. हालांकि, अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीज अभी भी बहुत कम और स्थिर हैं.
नया वेरिएंट नियमित जीनोमिक निगरानी के जरिए पहचाना गया है. इसमें कुछ ऐसे म्यूटेशन हैं जो इसे ज्यादा तेजी से फैलने में मदद कर सकते हैं, खासकर भीड़भाड़ वाली या बंद जगहों पर. विशेषज्ञों का कहना है कि वायरस में ऐसे बदलाव होना स्वाभाविक है. SARS-CoV-2 वैक्सीनेशन और पहले संक्रमण से बनी सामूहिक इम्यूनिटी के कारण लगातार खुद को बदल रहा है.
शुरुआती रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस बार ज्यादातर मरीजों में हल्के लक्षण ही दिख रहे हैं. जैसे गला खराब होना, थकान, हल्का बुखार और नाक बंद होना. पहले की तरह गंभीर सांस की बीमारी नहीं हो रही है. भारत के लिए स्थिति इस बार थोड़ी बेहतर है. इसकी वजह है कि देश की बड़ी आबादी को अब हाइब्रिड इम्यूनिटी (वैक्सीन + पहले संक्रमण) मिल चुकी है, जिससे गंभीर बीमारी का खतरा काफी कम हो गया है. लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि बुजुर्गों, कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों और उन व्यक्तियों को अभी भी खतरा है, जिन्हें डायबिटीज, हृदय रोग जैसी बीमारियां हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि ये बीमारियां भारत में बहुत आम हैं, इसलिए हमें सतर्क रहने की जरूरत है.
इस बीमारी पर निगरानी और इसके रोकथाम के लिए भारत काफी सक्रिय है. इंडियन SARS-CoV-2 जीनोमिक्स कंसोर्टियम (INSACOG) के नेतृत्व में जीनोमिक निगरानी कार्यक्रम चलाया जा रहा है. INSACOG राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं, अनुसंधान संस्थानों और राज्य स्तरीय भागीदारों से मिलकर बना एक संस्थागत नेटवर्क है. महामारी के शुरुआती समय में ही यह संस्था बनाई गई है, जो तभी से देश भर में वायरस के नमूनों की लगातार सीक्वेंसिंग कर रहा है ताकि नए वेरिएंट का पता लगाया जा सके और उनके प्रसार पर नजर रखी जा सके.
यह कार्यक्रम भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद और राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र जैसे निकायों के जरिए मिलकर चलाया जा रहा है. इस कार्यक्रम के जरिए एक्सपर्ट को ना सिर्फ कोरोना के नए मामलों की संख्या बल्कि उसके बदले स्वरूप और बीमारी की गंभीरता का पता लगाने में भी मदद मिलती है.
वैक्सीनेशन इस बीमारी के खिलाफ सुरक्षा की एक बहुत महत्वपूर्ण दीवार है. भारत ने वयस्क आबादी में 90 फीसद से ज्यादा लोगों को पहली डोज (प्राइमरी वैक्सीनेशन) दे दी है, जो दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण अभियानों में से एक है. हालांकि बूस्टर डोज लेने की संख्या अभी भी कम है, खासकर युवाओं और शहरों में. फिलहाल भारत में उपलब्ध बूस्टर पुराने वेरिएंट्स पर आधारित हैं, जैसे कोविशील्ड और कोवैक्सिन.
कुछ देशों में नए वेरिएंट के हिसाब से अपडेटेड बूस्टर लगाए जा रहे हैं, लेकिन भारत अभी पुरानी वैक्सीनों पर ही भरोसा कर रहा है. ये वैक्सीनें गंभीर बीमारी से अभी भी अच्छी सुरक्षा देती हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना के नए वेरिएंट फैलने की स्थिति में फिलहाल पूरा ध्यान उच्च जोखिम वाले समूहों (बुजुर्ग, बीमार व्यक्ति) को बूस्टर देने पर रहेगा, न कि पूरे देश में बड़े पैमाने पर बूस्टर अभियान चलाने पर.
कोविड के मामलों में हो रही बढ़ोतरी के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी एक अलग तरह की बहस चल रही है. यह बहस वायरस को लेकर कम और डर, चिंता को लेकर ज्यादा है. पुराने दिनों के अस्पतालों की भीड़भाड़ वाली वीडियो दोबारा शेयर की जा रही हैं, जैसे कि अभी की हों.
व्हाट्सऐप पर ऐसे मैसेज घूम रहे हैं जिनमें दावा किया जा रहा है कि कोरोना के नए और घातक लक्षण हैं, जैसे कुछ मिनट में सांस फूलना शुरू हो जाना. कुछ लोग फिर से पुरानी आदतें अपना रहे हैं. जैसे किराने से सामान जमा करना, हर दो घंटे में काढ़ा पीना आदि.
कुछ शहरों में लोग खुले में भी डबल मास्क लगाने लगे हैं या लिफ्ट बिल्कुल इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, जबकि सरकार या स्वास्थ्य विभाग की ओर से ऐसी कोई सलाह नहीं दी गई है. ऐसे में ध्यान रखने वाली बात यह है कि गलत सूचना असली वायरस से भी तेजी से लोगों की सोच को प्रभावित कर सकती है.
इससे अनावश्यक घबराहट फैलती है या फिर उल्टा लोग थककर सच्ची सलाह को भी नजरअंदाज करने लगते हैं. आखिर में, यह नया वेरिएंट कोई नई शुरुआत नहीं, बल्कि एक याद दिलाने वाला संकेत मात्र है. कोविड-19 अब एंडेमिक (स्थाई) बीमारी बन चुका है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इसे हल्के में लिया जाए. भारत के लिए आगे का रास्ता संतुलित रणनीति में है, जैसे लगातार निगरानी, कमजोर लोगों की खास सुरक्षा, और सही-साफ लोगों को जानकारी देना, ताकी गलत सूचना को बढ़ावा नहीं मिले.