NEET 2026 : तनाव, डर और थकान से कैसे निपटें छात्र, बता रहे हैं एक्सपर्ट
विशेषज्ञों के मुताबिक NEET-UG की तैयारी कर रहे छात्रों को बर्नआउट से बचना चाहिए और आसान टॉपिक्स से शुरुआत करनी चाहिए

NEET-UG 2026 पेपर लीक होने के बाद करीब 22 लाख छात्रों के लिए 21 जून को दोबारा परीक्षा आयोजित की जा रही है. अब यह सिर्फ शैक्षणिक भविष्य का मामला नहीं रह गया है बल्कि एक बड़े संकट का रूप ले चुका है.
इस वजह से राष्ट्रीय मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र मानसिक थकान और अनिश्चितता से जूझ रहे हैं. सबसे मुश्किल बात यह है कि उन्हें लगातार इस चिंता का सामना करना पड़ रहा है कि आगे क्या होगा?
इसकी सीधी वजह है यह कि उनकी कई महीनों और सालों की मेहनत मानो बेकार चली गई है. भारत के प्रमुख एडटेक प्लेटफॉर्म 'अड्डा 24*7’ के संस्थापक और CEO अनिल नागर कहते हैं, “हताशा और निराशा की भावनाएं पूरी तरह जायज हैं क्योंकि NEET 2026 ने छात्रों की वर्षों की मेहनत पर पानी फेर दिया है.”
शिक्षकों और काउंसलरों का मानना है कि प्रवेश परीक्षा रद्द होने का छात्रों पर सीधा भावनात्मक असर पड़ेगा. इससे उबरने में उन्हें समय लगेगा. उनकी राय है कि मौजूदा चुनौती यह है कि घबराहट को दिनचर्या पर हावी होने से रोका जाए.
नागर का तर्क है कि छात्रों को इस व्यवस्था संबंधी समस्या को अपनी व्यक्तिगत विफलता से नहीं जोड़ना चाहिए. वे कहते हैं, “छात्रों को अपनी तैयारी पहले की तरह जारी रखनी चाहिए.” वे आगे कहते हैं कि छात्रों को घबराहट में डूबने के बजाय भावनात्मक संतुलन बहाल करने और धीरे-धीरे अपने डेली रूटीन को व्यवस्थित करने पर ध्यान देना चाहिए.
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी स्थिति से उबरने की शुरुआत 14 घंटे की पढ़ाई से नहीं होती. शैक्षणिक सलाहकार संस्था 'उड़ान 360’ के प्रबंध निदेशक प्रदीप जैन कहते हैं, “जब छात्र अनिश्चित परिस्थितियों का सामना करते हैं तो वे अक्सर ज्यादा घंटे पढ़ाई करने लगते हैं. एक बेहतर रणनीति यह है कि छात्र यह देखें कि वे कितनी देर पढ़ रहे हैं, उससे ज्यादा यह कि वे कितना ध्यान से और प्रभावी ढंग से पढ़ रहे हैं.”
जैन के मुताबिक, ऐसे व्यवधान के बाद छात्र सबसे बड़ी गलती यह करते हैं कि वे मानसिक रूप से दो एक्सट्रीम में चले जाते हैं- या तो पढ़ाई पूरी तरह छोड़ देते हैं, या फिर डर के कारण खुद को इतना थका हुआ महसूस करते हैं कि मानसिक और शारीरिक रूप से टूटने लगते हैं.
लंबे समय तक इनमें से कोई भी तरीका कारगर नहीं होता. इसके बजाय, विशेषज्ञ छात्रों को सलाह देते हैं कि वे धीरे-धीरे पढ़ाई में वापस लौटें और शुरुआत आसान टॉपिक्स या विषयों से करें. पहले अपने मजबूत विषयों का रिवीजन करने से आत्मविश्वास वापस आता है, जिसके बाद वे धीरे-धीरे कमजोर विषयों पर काम कर सकते हैं.
घंटे भर की पढ़ाई के बाद तय किए गए ब्रेक लेना बहुत जरूरी है. इससे लक्ष्य तय करके उसे हासिल करना आसान होता है. बहुत ज्यादा और थकाऊ पढ़ाई की बजाय यह तरीका लंबे समय तक टिकाऊ साबित होता है. जैन कहते हैं, “जब प्रयास लगातार लेकिन संतुलित रहता है तो प्रगति धीरे-धीरे होती है.”
लगातार मेहनत करने से छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर को लेकर चर्चा अब मुख्य मुद्दा बन गई है. शिक्षक चेतावनी देते हैं कि बर्नआउट अक्सर ज्यादा मेहनत के वेश में आता है. जो छात्र लगातार बिना सोए, बिना हिले-डुले या आराम किए पढ़ते रहते हैं, उनकी याददाश्त, एकाग्रता और भावनात्मक स्थिरता कमजोर हो जाती है.
मानसिक थकान को इस विवाद के आसपास के अनवरत शोर ने और बढ़ा दिया है. सोशल मीडिया की वजह से छात्र लगातार न्यूज़ चेक करते रहते हैं, जिससे उनकी भावनात्मक ऊर्जा तेजी से खत्म हो रही है. नागर कहते हैं, “अफवाहों और सोशल मीडिया अपडेट्स पर ज्यादा निर्भर रहना तनाव बढ़ाता है और पढ़ाई पर ध्यान देना मुश्किल कर देता है.” उनके मुताबिक, सिर्फ विश्वसनीय खबरें ही पढ़ें और रोजाना एक तय दिनचर्या का पालन करें. इससे छात्रों को खुद पर नियंत्रण महसूस होगा.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि नींद बहुत जरूरी है. जैन कहते हैं, “रात में नींद कम होने पर दिमाग धीमा हो जाता है.” नियमित समय पर सोना-उठना याददाश्त, भावनाओं पर नियंत्रण और परीक्षा में सही जवाब देने की क्षमता को मजबूत करता है. थोड़ी-थोड़ी अच्छी आदतें जैसे टहलना, बॉडी स्ट्रेचिंग करना या मोबाइल-कंप्यूटर से ब्रेक लेना लंबे समय में एकाग्रता काफी बढ़ा देती हैं.
NEET के इस संकट ने दिखा दिया है कि प्रतियोगी परीक्षाएं पूरे परिवार पर कितना भावनात्मक बोझ डालती हैं. विशेषज्ञ कहते हैं कि इस दौरान माता-पिता को छात्रों का भावनात्मक सहारा बनना चाहिए. नागर चेताते हैं, “ज्यादा दबाव, दूसरों से तुलना या आलोचना तनाव बढ़ा देती है.”इस वक्त छात्रों को सबसे ज्यादा आश्वासन और धैर्य की जरूरत है. रैंक, पढ़ाई के घंटे या भविष्य के बारे में बार-बार पूछना उनके डर और आत्मविश्वास की कमी को बढ़ा सकता है.
जैन कहते हैं, “छात्रों पर दबाव बनाने की बजाय उन्हें आश्वासन देना कहीं ज्यादा जरूरी है.” कभी-कभी सिर्फ शांतिपूर्वक सुन लेना ही काफी होता है, बिना तुरंत उपदेश दिए. इससे छात्र कम अकेला महसूस करते हैं. शिक्षकों और कोचिंग संस्थानों को भी अब सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि छात्रों को भावनात्मक रूप से मजबूत रखने और नियमित दिनचर्या से जोड़े रखने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए.
बहुत से छात्रों का आत्मविश्वास पहले ही कम हो गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि परीक्षा की मानसिक तैयारी दोबारा बनाने के लिए लगातार मेहनत जरूरी है, सिर्फ प्रेरणा काफी नहीं होती. जैन कहते हैं, “धीरे-धीरे प्रगति करना आत्मविश्वास वापस लाने का सबसे भरोसेमंद तरीका है.”
साथ ही एक्सपर्ट का कहना है कि पुराने टॉपिक दोबारा पढ़ें, आसान-मध्यम प्रश्न हल करें और जहां आपने पहले बेहतर प्रदर्शन किया था, उसे फिर याद करें. इससे धीरे-धीरे आत्मविश्वास लौटेगा. मॉक टेस्ट जरूरी हैं लेकिन ज्यादा न दें. बिना रिव्यू किए लगातार टेस्ट देने से तनाव बढ़ सकता है. बेहतर है कि कॉन्सेप्ट रिवीजन और अच्छे से एनालिसिस किए मॉक टेस्ट को बारी-बारी से करें.
NEET संकट ने गहरे स्तर पर भारत की प्रतियोगी परीक्षा व्यवस्था के दबाव पर बड़ी चर्चा छेड़ दी है. जब एक परीक्षा पूरे भविष्य का रास्ता तय करने वाली हो जाए तो उसमें आई कोई बड़ी समस्या बहुत गहरी चोट पहुंचा सकती है. नागर कहते हैं, “यह दिखाता है कि छात्रों का भविष्य कितना ज्यादा एक परीक्षा पर निर्भर है.”
यह तनाव सिर्फ छात्रों तक नहीं, पूरे परिवार पर असर डालता है. विशेषज्ञों का मानना है कि छात्रों को इस एक घटना को अपना पूरा वजूद या पहचान नहीं बनने देना चाहिए. परीक्षाएं अवसर देती हैं लेकिन वे इंसान की असली पहचान नहीं होतीं.