शेख हसीना की कट्टर विरोधी खालिदा जिया को पीएम मोदी के संदेश से क्या अटकलें लग रहीं?

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के रहते भारत ने कभी उनकी विरोधी खालिदा जिया को तवज्जो नहीं दी, लेकिन अब हालात बदल गए हैं

BNP chief Khaleda Zia and PM Narendra Modi during their 2015 meeting
साल 2015 में पीएम मोदी की खालिदा जिया से मुलाकात हुई थी

भारत-बांग्लादेश के बीच ठंडे पड़े रिश्तों में पिछले कुछ दिनों से गरमाहट के बारीक संकेत दिख रहे हैं. इसके चलते शेख हसीना वाला अध्याय पीछे छूटता नज़र आ रहा है. बर्फ़ सबसे पहले बांग्लादेश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के दिल्ली दौरे से पिघली. अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हसीना की प्रतिद्वंद्वी बीमार खालिदा जिया के लिए सद्भावना संदेश ने इसे एक कदम और आगे बढ़ा दिया है.  

सीमा के दूसरी ओर ढाका ने भी भारत के खिलाफ अपनी कड़ी बयानबाज़ी को कम कर दिया है. पिछले हफ़्ते बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार मोहम्मद तौहीद हुसैन ने जोर देकर कहा कि ढाका का दिल्ली से रिश्ता हसीना से जुड़े मुद्दे सहित कुछ अनसुलझे मसलों की वजह से रुकेगा नहीं. ढाका ट्रिब्यून के मुताबिक उन्होंने कहा, “हमारे हित बने रहेंगे और उन्हें हासिल करने की हमारी कोशिशें जारी रहेंगी... लेकिन मुझे नहीं लगता कि इस एक वजह से बाक़ी सब कुछ रुक जाएगा,” 

पीएम मोदी की खालिदा जिया के लिए पोस्ट

भारत अच्छी तरह जानता है कि जब तक प्रत्यर्पण का मुद्दा हल नहीं होता, हसीना फैक्टर दोनों देशों के रिश्तों में खटास डालता रहेगा. बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री हसीना को हाल ही में पिछले साल के दंगों में मानवता के खिलाफ अपराध के लिए मौत की सज़ा सुनाई गई थी. इन दंगों में 500 से ज़्यादा लोग मारे गए थे. अब जब बांग्लादेश में चुनाव नज़दीक हैं और उनकी पार्टी पर प्रतिबंध है, पीएम मोदी का जिया के लिए संदेश कूटनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है. 

अंग्रेज़ी और बांग्ला, दोनों भाषाओं में की गई पोस्ट में पीएम मोदी ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की प्रमुख खालिदा जिया के बिगड़ते स्वास्थ्य पर चिंता जताई और उनके जल्दी स्वस्थ होने के लिए “सभी संभव सहायता” की पेशकश की. BNP के भारत से हमेशा खट्टे-मीठे संबंध रहे हैं हालांकि पार्टी की तरफ से ने तुरंत पीएम मोदी के इस “सद्भावना संकेत” को स्वीकार किया गया.

मोदी और खालिदा जिया आख़िरी बार 2015 में मिले थे जब भारतीय पीएम बांग्लादेश दौरे पर गए थे. उस वक़्त जिया विपक्ष की नेता थीं. पिछले हफ़्ते लंदन से लौटने के बाद जिया को दिल और फेफड़ों में संक्रमण की वजह से अस्पताल में भर्ती कराया गया. 30 नवंबर को उनकी हालत अचानक गंभीर हो गई और 1 दिसंबर को चीन के पांच डॉक्टरों की टीम उनकी निगरानी के लिए ढाका पहुंची. 

भारत के लिए खालिदा जिया की BNP क्यों मायने रखती है

पांच दशकों से ज़्यादा समय तक भारत शेख हसीना की अगुवाई वाली अवामी लीग को एकतरफा और भरपूर समर्थन देता रहा. इस दौरान भारत ने कोई विकल्प भी नहीं तलाशा. नतीजा यह हुआ कि हसीना के सत्ता से बाहर होने के बाद भारत बांग्लादेश में अपने किसी सहयोगी के बिना रह गया, क्योंकि अंतरिम प्रमुख मुहम्मद यूनुस ने कट्टरपंथी इस्लामी समूहों को राजनीतिक जगह दे दी. पाकिस्तान और चीन ने इसका फायदा उठाया. इस पृष्ठभूमि में BNP की ओर भारत के संकेत महत्वपूर्ण हो जाते हैं, जो अब सबसे बड़ी मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी है. 

हालिया ओपिनियन पोल के अनुसार फ़रवरी 2026 में होने वाले चुनाव में जिया की पार्टी सबसे ज़्यादा सीटें जीतने की प्रबल दावेदार मानी जा रही है. BNP की पुरानी सहयोगी और भारत विरोधी जमात-ए-इस्लामी थोड़ा ही पीछे है और यह भारत के लिए चिंता की बात है.

हसीना ने आतंकी गतिविधियों की वजह से जिस जमात को बैन किया था, यूनुस के शासन में वह फिर से राजनीति में घुस आई है. कई विश्लेषकों का कहना है कि यूनुस के अंतरिम प्रमुख बनने में जमात का समर्थन अहम रहा. जमात-ए-इस्लामी का पाकिस्तान-परस्त रुख किसी से छिपा नहीं है. 1971 के युद्ध में उसने इस्लामाबाद का खुलकर साथ दिया था. सितंबर में ढाका यूनिवर्सिटी (बांग्लादेश की सबसे मशहूर सरकारी यूनिवर्सिटी) के छात्र संघ चुनाव में जमात के छात्र संगठन की हैरान करने वाली जीत ने दिखा दिया कि चुनाव में उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता. 

इन हालात में शेख हसीना के बाद के बांग्लादेश में BNP की भूमिका भारत के लिए निर्णायक हो गई है. जमात की सरकार से निपटना भारत के लिए जोखिमों से भरा होगा, ख़ासकर जब पाकिस्तानी नेता और उसकी कुख्यात ख़ुफ़िया एजेंसी ISI पहले से ही ढाका के दौरे कर रही हो. इसलिए जब चुनावी तराजू BNP के पक्ष में झुका हुआ है, उस वक़्त BNP से बढ़ता जुड़ाव भारत के हित में है. साथ ही BNP का अकेले चुनाव लड़ने का फ़ैसला (पहले की तरह जमात के साथ गठबंधन नहीं करना) भी दिल्ली के लिए सकारात्मक है. 

जिया की गंभीर हालत से भी BNP को काफ़ी सहानुभूति मिलने की संभावना है. BNP नेता मानते हैं कि अब वक़्त आ गया है कि 2008 से लंदन से पार्टी संचालन कर रहे जिया के बड़े बेटे तारिक़ रहमान वापस लौटें और चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं में जोश भरें. लेकिन रहमान ने एक फ़ेसबुक पोस्ट में कहा कि उनकी वापसी “पूरी तरह” उनके हाथ में नहीं है, जिससे राजनीतिक या क़ानूनी अड़चनों की अटकलें लग रही हैं.

बांग्लादेश NSA और अजित डोभाल की मुलाकात

2026 के चुनाव बांग्लादेश की राजनीतिक दिशा तय करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाएंगे, क्योंकि पिछले कई महीनों से देश में अराजकता, हिंसा, आगजनी और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की घटनाएं जारी हैं. भारत यह बात अच्छी तरह समझता है और बांग्लादेशी अधिकारियों की उकसावे वाली टिप्पणियों के बावजूद उसने रणनीतिक धैर्य दिखाया है, साथ ही द्विपक्षीय तंत्रों को चलाते रहने का काम जारी रखा है. यह साफ़ था कि हसीना फैक्टर के बावजूद दोनों देश बातचीत करने को तैयार हैं.  इसका सबूत तब मिला जब अवामी लीग प्रमुख के खिलाफ फ़ैसले के महज एक दिन बाद बांग्लादेश के शीर्ष सुरक्षा अधिकारी खलीलुर रहमान भारत आए.

रहमान को एक क्षेत्रीय सुरक्षा सम्मेलन में हिस्सा लेना था, लेकिन वे निर्धारित समय से एक दिन पहले दिल्ली पहुंचे और अपने समकक्ष अजित डोभाल से मुलाकात की. हालांकि दोनों के बीच क्या बातचीत हुई, इस बारे में सार्वजनिक रूप से कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है. 

बांग्लादेशी NSA ने डोभाल को ढाका आने का न्योता भी दिया. हसीना के अगस्त 2024 में सत्ता से बेदखल होने के बाद यूनुस सरकार के यह दूसरे उच्च-स्तरीय अधिकारी थे जो दिल्ली आए. घरेलू दबाव के बावजूद रहमान की यात्रा रद्द न करके NSA-स्तर की बैठक को जारी रखने का बांग्लादेश का फ़ैसला यह दिखाता है कि भारत से उसके तनावपूर्ण संबंध अब धीरे-धीरे स्थिरता की ओर बढ़ रहे हैं, क्योंकि भारत हसीना के बाद के हालात में खुद को इस अहम पड़ोसी देश में फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रहा है.

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