भारत करेगा अब समुद्री जहाजों का बीमा; मोदी सरकार का यह फैसला क्यों था जरूरी?
केंद्र सरकार के भारत समुद्री बीमा पूल (BMI Pool) योजना की 12,980 करोड़ रुपए की गारंटी के साथ शुरुआत की है

फरवरी 2022 में जब रूस-यूक्रेन जंग शुरू हुई, उसके कुछ महीनों बाद एशिया जाने वाले कई टैंकर जहाज अजीब सी मुश्किल में फंस गए. इस वक्त रूसी कच्चा तेल उपलब्ध था, खरीदार तैयार थे, समुद्री रास्ते खुले थे. इसके बावजूद जहाज आगे नहीं बढ़ पा रहे थे, क्योंकि बीमा कंपनियां हिचकिचा रही थीं.
इंटरनेशनल ग्रुप ऑफ पी एंड आई क्लब्स (IGP&I) से जुड़े वैध बीमा कवर के बिना जहाजों को बंदरगाह में घुसने से रोका जाता था. ज्यादातर कंपनियां या देश बीमा के अभाव में भारी-भरकम क्षतिपूर्ति के खतरा से बचना चाहते हैं. यही कारण है कि तब भारत के लिए यह बड़ी समस्या बन गई थी.
इसका मुख्य कारण यह है कि भारत ने उस समय रियायती रूसी तेल की खरीद बहुत बढ़ा दी थी, जो एक समय उसके कुल कच्चे तेल के एक-तिहाई से ज्यादा हो गया था. भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों का औपचारिक रूप से साथ नहीं दिया था. इसके बाद भी भारत को बीमा व्यवस्था के नियमों का पालन करना पड़ रहा था, जो अमेरिकी प्रतिबंधों से प्रभावित थे.
रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद कई टैंकर रूसी तेल लेकर एशिया जा रहे थे, लेकिन बीमा कंपनियों के डर के कारण अचानक जहाजों की रफ्तार थम गई. भारत ने सस्ता रूसी तेल खूब खरीदा, लेकिन बीमा कंपनियों के डर के कारण उसे लाना मुश्किल हो गया. इस घटना ने एक सच्चाई उजागर कर दी कि आज के व्यापार में ताकत सिर्फ युद्धपोतों या सप्लाई चेन से नहीं आती.
असली ताकत बीमा गारंटी देने की क्षमता में है. इसीलिए भारत ने अमेरिका के SWIFT का विकल्प बनाने के लिए UPI को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलाया और अपनी समुद्री व्यापार व्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने का फैसला किया.
इसी कमजोरी को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाले केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 18 अप्रैल को भारत समुद्री बीमा पूल (BMI Pool) को मंजूरी दे दी. इसमें 12,980 करोड़ रुपए की संप्रभु गारंटी दी गई है. BMI Pool एक रणनीतिक कदम है. आज की दुनिया में प्रतिबंध, फाइनेंस और जोखिम तीनों मिलकर राज्य के हथियार बन गए हैं. भारत का प्रयास है कि उसकी व्यापार की जीवन रेखाएं बाहरी बीमा कंपनियों के फैसलों की गुलाम न बनें. BMI Pool का ढांचा ठीक उसी महत्वाकांक्षा को दिखाता है.
यह पूल समुद्री बीमा की पूरी सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है. इसमें जहाजों का हल (बॉडी) और मशीनरी बीमा, माल ढुलाई बीमा, तीसरे पक्ष की जिम्मेदारी (प्रोटेक्शन एंड इंडेम्निटी) बीमा, और अशांत इलाकों से गुजरते समय होने वाले युद्ध जोखिम का बीमा शामिल है. यह पूल भारतीय झंडे वाले जहाजों, भारतीय बंदरगाहों से आने-जाने वाले माल और हाई-रिस्क इलाकों में चलने वाले जहाजों को कवर करेगा. शुरुआती अंडरराइटिंग क्षमता करीब 950 करोड़ रुपए है और 12,980 करोड़ रुपए की सरकारी गारंटी है. इसके साथ ही यह पूल सरकार को माल ढोने वाले इन जहाजों के लिए आखिरी सहारा बनाता है.
बाहरी बीमा कंपनियों पर यह निर्भरता तीन अलग-अलग कमजोरियां पैदा करती है. पहली कमजोरी- प्रतिबंधों का खतरा: रूस-यूक्रेन युद्ध में हमने देखा कि भू-राजनीतिक दबाव के कारण बीमा कवर आसानी से रोक दिया जा सकता है या वापस ले लिया जा सकता है. दूसरी कमजोरी- लागत में उतार-चढ़ाव: संघर्ष वाले इलाकों में युद्ध जोखिम का प्रीमियम हाल के संकटों में 2 से 3 गुना तक बढ़ गया, जिससे शिपिंग की लागत बहुत तेजी से महंगी हो गई. तीसरी कमजोरी- रणनीतिक निर्भरता: भारत के ऊर्जा आयात, उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला और निर्यात मार्ग अभी भी बाहरी बीमा कंपनियों के फैसलों पर निर्भर हैं.
भारत के BMI Pool का उद्देश्य कवरेज की निरंतरता सुनिश्चित करके इन जोखिमों को कम करना है. वैश्विक बीमा कंपनियों के पीछे हटने पर यह घरेलू स्तर पर एक वैकल्पिक समाधान प्रदान करता है, जोखिम को साझा करके प्रीमियम को स्थिर करता है. इतना ही नहीं आवश्यकता पड़ने पर भारत को महत्वपूर्ण व्यापार के आयात-निर्यात को स्वतंत्र रूप से बीमा करने में सक्षम बनाता है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह देश को समुद्री बीमा, दावा प्रबंधन और समुद्री कानून जैसे क्षेत्रों में क्षमताएं विकसित करने की अनुमति देता है.
हालांकि, भारत के समुद्री क्षेत्र में चल रहे व्यापक परिवर्तन के संदर्भ में इस कदम का महत्व और भी स्पष्ट हो जाता है. पिछले एक वर्ष में, सरकार ने दशकों में सबसे व्यापक सुधार अभियानों में से एक को अंजाम दिया है. बंदरगाहों, जहाजरानी और माल ढुलाई को नियंत्रित करने वाले पुराने ढांचों को आधुनिक बनाने के लिए पांच प्रमुख समुद्री कानूनों को पहले ही आगे बढ़ाया जा चुका है. इन सुधारों का उद्देश्य दक्षता और प्रतिस्पर्धा में सुधार करते हुए भारत को वैश्विक समझौतों के अनुरूप बनाना है.
इस कानूनी सुधार के साथ-साथ इस क्षेत्र की वित्तीय संरचना को मजबूत करने के लिए भी बड़े प्रयास किए गए हैं. सागरमाला फाइनेंस कॉर्पोरेशन जैसी क्षेत्र-केंद्रित राष्ट्रीय वित्तीय कंपनी (NBFC) सहित एक समर्पित समुद्री वित्तपोषण प्रणाली की स्थापना हुई है. इससे भारतीय शिपिंग कंपनियों के लिए कम लागत और लंबी अवधि के लिए पूंजी की लंबे समय से चली आ रही कमी दूर हो गई है. इसके अलावा, 25,000 करोड़ रुपए के समुद्री विकास कोष का संचालन भी शुरू किया गया है, जिससे जहाज अधिग्रहण, बंदरगाह ढांचा और रसद को समर्थन मिलने की उम्मीद है.
ये पहलें ऐसे समय में सामने आई है, जब भारत की बंदरगाह क्षमता 2,600 मिलियन टन प्रति वर्ष से अधिक हो गई है. इससे बंदरगाहों, जहाजरानी और अंतर्देशीय जलमार्गों में 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश का समर्थन प्राप्त है. साथ ही, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण (IFSCA) जैसी संस्थाओं के जरिए सक्षम नियामक ढांचे जहाज पट्टे और वित्तपोषण गतिविधियों को तटवर्ती क्षेत्रों में ला रहे हैं. केरल में विझिंजम और महाराष्ट्र में वधावन जैसे उभरते मेगा पोर्ट वैश्विक ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में स्थापित हो रहे हैं.
इन कदमों को समग्र रूप से देखने पर एक स्पष्ट रणनीतिक पैटर्न दिखाई देता है. भारत केवल इस क्षेत्र में नए इंफ्रा को नए सिरे से तैयार नहीं कर रहा है, बल्कि वह बंदरगाहों और जहाजों से लेकर वित्त और अब बीमा क्षेत्र में भी शानदार काम कर रहा है. BMI Pool इस कड़ी में एक महत्वपूर्ण फैसला है. जोखिम बीमा पर घरेलू नियंत्रण के बिना, सबसे बेहतरीन बंदरगाह या समुद्री बेड़ा भी दूसरे देश के सरकारों के फैसलों को लेकर संवेदनशील बने रहते हैं.
भारत का दृष्टिकोण व्यापक वैश्विक वास्तविकता को भी दिखाता है. प्रमुख समुद्री शक्तियों वाले देशों ने यह सुनिश्चित किया है कि बीमा क्षमता या तो घरेलू स्तर पर मजबूत हो या रणनीतिक रूप से. यूनाइटेड किंगडम का लॉयड्स ऑफ लंदन दुनिया के सबसे बड़े समुद्री बीमा का केंद्र है. यहां एक व्यापक और वैश्विक स्तर पर एकीकृत बीमा बाजार है. नॉर्वे ने गार्ड जैसी कंपनियों के जरिए एक विशेषीकृत प्रणाली विकसित की है, जो उसके जहाजरानी उद्योग से जुड़ी हुई है.
जापान ने निप्पॉन एक्सपोर्ट एंड इन्वेस्टमेंट इंश्योरेंस के माध्यम से निजी बीमा कंपनियों को सरकारी समर्थन से इस क्षेत्र में शुरू किया है. चीन ने इससे भी आगे बढ़कर चाइना एक्सपोर्ट एंड क्रेडिट इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन और पीपुल्स इंश्योरेंस कंपनी ऑफ चाइना जैसी राज्य समर्थित बड़ी कंपनी बनाई है. ताकि भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भी उसके जहाजों और विदेशी परियोजनाओं का बीमा संभव हो सके.
इन सभी देशों ने अलग-अलग तरीकों से यह सुनिश्चित किया है कि समुद्री बीमा पूरी तरह से दूसरे देशों की कंपनियों पर निर्भर न रहे. भारत में अब तक ऐसी कोई घरेलू व्यवस्था नहीं थी. ऐसा कहा जा रहा है कि यह बदलाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के स्वदेशी की अवधारणा से प्रेरित है. RSS से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह-संयोजक और अर्थशास्त्री अश्वनी महाजन कहते हैं, “इसे वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था के लिए पुनर्परिभाषित किया गया है. अब भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि महत्वपूर्ण क्षमताएं पूरी तरह से बाहरी ताकतों पर निर्भर न हों.”
पिछले एक दशक से, महाजन और उनके सहयोगी मोदी सरकार से इसे लागू करने के लिए पैरवी कर रहे थे. ताकी यूरोपीय और चीनी प्रभुत्व वाली कंपनियों के कारण आयात-निर्यात प्रभावित नहीं हो. हालांकि, इस क्षेत्र में भारत अभी भी प्रारंभिक चरण में है. 950 करोड़ रुपए की प्रारंभिक बीमा क्षमता के साथ, यह राशि समुद्री जोखिम के पैमाने की तुलना में काफी कम है. विश्वसनीयता, बीमा विशेषज्ञता और वैश्विक विश्वास हासिल करने में समय लगेगा.
इसके बावजूद उद्धेश्य साफ है कि BMI Pool एक अलग-थलग नीतिगत कदम नहीं है. यह भारत की आर्थिक रणनीति के व्यापक पुनर्गठन का हिस्सा है, जो इस बात को स्वीकार करता है कि भू-आर्थिक कारकों से प्रभावित दुनिया में व्यापार के साधनों पर नियंत्रण उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि स्वयं व्यापार में भागीदारी.