इंडिया टुडे आर्काइव : जब ममता बनर्जी बनीं 'पोरिबोर्तन’ का प्रतीक

साल 2011 में 13 मई को पश्चिम बंगाल में एक अलग ही तरह का जश्न मनाया गया. उस दिन ममता बनर्जी ने 34 साल से सरकार चला रहे वामपंथियों को सत्ता से बाहर कर दिया था

Mamata Banerjee in 2011, Writers building (Source : TMC)
साल 2011 में राइटर्स बिल्डिंग से लोगों का अभिवादन करतीं ममता बनर्जी

कभी किसी चीज का इतनी उत्सुकता से इंतजार नहीं किया गया होगा जितना बंगाल में ममता बनर्जी की निश्चित जीत का. यहां तक कि तुक्के लगाने वाले चुनावी सर्वेक्षण भी इस बार गलत साबित नहीं हुए.

कभी किसी चीज का इतनी उत्सुकता से इंतजार नहीं किया गया होगा जितना बंगाल में ममता बनर्जी की निश्चित जीत का. यहां तक कि तुक्के लगाने वाले चुनावी सर्वे भी इस बार गलत साबित नहीं हुए.

(यह रिपोर्ट इंडिया टुडे के 25 मई 2011 के अंक में प्रकाशित हुई थी)

विशेषज्ञों से पहले लोगों को मालूम था कि क्या होने वाला है. गुरुवार की शाम कोलकाता में सड़कें जल्दी खाली हो गई थीं. ऐसा लग रहा था जैसे लोग नए सवेरे के स्वागत के हर पल का आनंद उठाना चाह रहे हों. एक ऐसा क्षण जिसे कभी न भुलाया जा सकता हो.

हरीश चटर्जी स्ट्रीट पर ममता के साधारण निवास के आसपास उनके समर्थकों ने सड़कों की लाइटों को हरे कपड़े से ढक दिया था जैसे वह लाल से हरे रंग में परिवर्तन का संकेत दे रहे हों. एक तूफान के आने से पहले की अजीब-सी खुशी थी जिसने बंगाल में मार्क्सवादी शासन के तीन दशक पुराने किले को ढहा दिया.

बंगालियों में जो भाकपा (एम) (CPM) के नेता थे वही इसे भांप नहीं सके. उग्र स्वभाव के लिए मशहूर प्रदेश पार्टी अध्यक्ष बिमान बोस उपहास उड़ा रहे थे कि ''ठेके के मीडिया'' (यानी पत्रकार अमेरिका-कांग्रेस-ममता की कुटिल बुर्जुआ साजिश का हिस्सा हैं) को भी अपना थूका हुआ चाटना पड़ेगा जब चुनाव के नतीजे आ जाएंगे.

उनका इस तरह का बयान लोकोक्ति में भी शालीन निशानी नहीं था. लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह व्यक्ति अपनी हाजिरजवाबी के साथ अपना विवेक भी खो चुका है. हार तो किसी का भी संतुलन बिगाड़ सकती है.

तीन दशक पहले माकपा अपनी विजय के बारे में भी इसी तरह आश्चर्यजनक ढंग से अनभिज्ञ थी. उसने इमरजेंसी के बाद 1977 में मोरारजी देसाई की जनता पार्टी के साथ आम चुनाव लड़ा था. विधान सभा चुनाव में उसने 294 सीटों में से 120 सीटों पर विजय हासिल की थी. अपनी जिद भरी मूर्खता में जनता पार्टी उसे इतनी सीटें भी नहीं देना चाहती थी. आगे क्या हुआ सभी को मालूम है.

34  साल की सफलता ने कम्युनिस्ट ढांचे और सोच की कमजोरियों पर परदा डाल दिया थाः पार्टी को हमेशा जनता से श्रेष्ठ माना जाने लगा था. जनता पार्टी की इच्छा की गुलाम बन गई थी. इनाम और सजा पार्टी का उपहार था, क्योंकि बंगाल के कोने-कोने में उसका बोलबाला था.

पार्टी ऐसे ही लोगों को तरजीह देती थी जो उसे बहुमत दिलाने में मदद करते थे, चाहे वह तहेदिल से समर्थन हो या धांधली से. बाकी लोग कठोर शासन के शिकार बने, जिसे पार्टी और पुलिस की मिलीभगत से लागू किया गया था.

नौकरियां देने के लिए नहीं रह गई थीं, चूंकि विकास को समानांतर नौकरशाही के नीरस गठबंधन ने दबाया हुआ था इसलिए ''हमारे'' बनाम ''उनके'' वाले बंगाल में ''उनके'' लिए कुछ नहीं बचा था. 'उन्हें' निरंतर दरिद्र होते माहौल में कष्ट झेलने के लिए छोड़ दिया गया था. पार्टी चलती रही, जबकि बंगाल लगातार डूब रहा था.

2011 का चुनाव जीतने के बाद आम लोगों से मिलतीं ममता बनर्जी

ममता की चुनावी सफलता लगातार फैल रहे गुस्से का नतीजा है, जिसे साधारण तौर पर इस तरह अभिव्यक्त किया जा सकता है- अब बहुत हो चुका. लेकिन इसमें यह तथ्य भी शामिल है कि माकपा का प्रसिद्ध कैडर 2009 के आम चुनाव और उसके बाद पंचायत चुनावों के बीच ही दरक चुका था. कुछ ममता के साथ हो गए थे, जबकि अपनी आंखें खुली रखने वालों ने मोलभाव करना शुरू कर दिया था. बदलाव या पोरिबोर्तन काफी समय पहले ही दिखाई देने लगा था.

यह दूसरा मौका है जब बंगाल की जनता ने परिवर्तन के लिए वोट दिया है. जनता ने पहली बार माकपा के भीतर ही बदलाव के लिए वोट दिया था, जब उसे लगा कि नए मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्‌टाचार्य बेजान कम्युनिस्ट ''वाद'' के बंधन से मुक्ति दिला देंगे. जब भट्टाचार्य विफल हो गए तो उनके खिलाफ  गुस्सा चरम पर पहुंच गया.

ममता की जीत के बाद उम्मीदें इस कदर बढ़ गईं हैं कि उनके असफल होने के बाद कोई विकल्प नही बचेगा. लेकिन उन्हें इसका पता है. हम सबको मालूम है कि उनके अंदर साहस है. लेकिन किसी को उनके शासन के रू-ब-रू  चुनौतियों को कम करके आंकने की गलती नहीं करनी चाहिए.

इस बार चुनाव में भ्रष्टाचार मुख्य मुद्दा था. केवल दिल्ली इस तरह की बात फैला सकती है कि तमिलनाडु का मतदाता इतना भ्रष्ट है कि भ्रष्टाचार से चिंतित हो. केरल के मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानंद ही अपने राज्‍य में मतदाताओं को समझ पाए कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उन्होंने न केवल दिल्ली को बल्कि अपनी पार्टी को भी चुनौती दी.

असम को छोड़कर कांग्रेस ने हर जगह अपना जनाधार खो दिया (जहां तरुण गोगोई ने शांति और विकास को विजय में तब्दील कर लिया) क्योंकि केंद्र में उसकी दागदार सरकार है. पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजे इस दृष्टि से अलग नही हैं: मतदाता ने राजनैतिक भ्रष्टाचार के लिए वाम मोर्चा को दंडित किया, जो खजाने से चोरी करने जितना ही कष्टकारक हो सकता है.

यह निश्चित तौर पर कहा जाएगा कि वामपंथियों के हित इतने अहम हैं कि उन्हीं पर छोड़ दिए जाएं. बंगाल में जो किला ढहाया गया है, क्या वह उसके पुनरुत्थान में मददगार साबित होगा? पुनर्जन्म के लिए एक बार मरना जरूरी है और माकपा को सबसे पहले यह मानना होगा कि वह अपने अतीत को भुला दे.

कुर्सी से हटाए जाने के कई फायदे भी होते हैं. उदाहरण के लिए, आप सूरज की रोशनी में चलते हैं. अगर वाममोर्चा अपनी आंखें खोलेगा तो उसे आगे रास्ता नजर आएगा. अगर नहीं तो वह एक दशक तक यूं ही पड़ा रहेगा.

Read more!