लोकसभा चुनाव 2024: क्या है पोलिंग स्टेशन बनाए जाने की प्रक्रिया और ये काम कैसे करते हैं?
जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 के तहत हर उस गांव में पोलिंग स्टेशन की स्थापना का प्रावधान है जहां 300 से ज्यादा वोटर रहते हैं

किसी भी चुनावी प्रक्रिया में पोलिंग स्टेशन उसके नर्व सेंटर और दिल की धड़कन की तरह काम करते हैं. यही वो केंद्र होते हैं जहां लोग वोट डालते हैं और अगले पांच सालों के लिए अपने राज्य या फिर देश की तकदीर का फैसला लेते हैं. इस साल के आम चुनावों की बात करें तो करीब 96.80 करोड़ मतदाताओं ने वोट डालने के लिए अपना नाम रजिस्टर कराया है.
19 अप्रैल से शुरू हुए मतदान के लिए देशभर में साढ़े दस लाख पोलिंग स्टेशन की व्यवस्था की गई है. ये स्टेशन देश के सुदूर इलाकों से लेकर मेट्रो सिटी तक फैले हुए हैं. यहां अब कुछ स्वाभाविक प्रश्न उठते हैं कि एक पोलिंग स्टेशन को बनाने की प्रक्रिया क्या है? ये काम कैसे करते हैं, और इनकी खासियतें क्या हैं?
अक्सर कुछ लोगों को भ्रांति होती है कि पोलिंग स्टेशन और पोलिंग बूथ एक ही बात है. लेकिन ऐसा है नहीं. किसी पोलिंग स्टेशन के अंतर्गत ही एक या उससे ज्यादा पोलिंग बूथ होते हैं. जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 25 के मुताबिक किसी जिले में पोलिंग स्टेशन के सेट अप की जिम्मेदारी जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) को होती है. इसके अलावा, उस जिले में जितने भी ऐसे पोलिंग स्टेशन होते हैं उनकी वह सूची जारी करता है.
इस कानून के मुताबिक, प्रत्येक पोलिंग स्टेशन का एरिया कम से कम 20 वर्ग मीटर में फैला होना चाहिए. एक पोलिंग स्टेशन पर ज्यादा से ज्यादा 1500 लोग ही वोट डाल सकते हैं. इसके अलावा हर उसी गांव में पोलिंग स्टेशन की सुविधा सुनिश्चित की जाएगी, जहां 300 से ज्यादा वोटर रहते हों. यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि किसी वोटर को अपना मत डालने के लिए दो किलोमीटर से ज्यादा न चलना पड़े.
हालांकि, वैसे इलाके जो बीहड़ हैं या फिर सुदूर बसे हुए हैं, वहां अगर मतदाताओं की संख्या 300 से कम भी है तो भी वहां पोलिंग स्टेशन बनाए जा सकते हैं. उदाहरण के तौर पर अरुणाचल प्रदेश में स्थित मालोगाम इलाके को लिया जा सकता है. यहां सिर्फ एक मतदाता है, फिर भी उसके लिए पोलिंग स्टेशन का इंतजाम किया गया है. वैसे मामलों में जब मतदाताओं की संख्या 1500 पार कर जाती है तो उसके लिए सहायक पोलिंग स्टेशन भी बनाए जाते हैं. कोशिश की जाती है कि उसी बिल्डिंग में उसका सेट अप हो.
जहां शहरी इलाकों में एक बिल्डिंग में चार पोलिंग स्टेशन बनाए जा सकते हैं, वहीं ग्रामीण इलाकों में ये ज्यादा से ज्यादा दो ही हो सकते हैं. इन स्टेशनों का निर्माण करते वक्त यह प्रयास रहता है कि इन्हें किसी सरकारी या फिर अर्द्ध-सरकारी भवनों के परिसर में ही स्थापित किया जाए. लेकिन जरूरत पड़ने पर इन्हें निजी जगहों पर भी स्थापित किया जा सकता है. इसके लिए दो रास्ते हैं. या तो भवन मालिक सहमति दे दे या फिर जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 160 के जरिए वहां बलपूर्वक उसकी स्थापना की जा सकती है.
पोलिंग स्टेशन की सूची बनने के बाद उनकी जांच होती है. भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) से अप्रूवल मिलने के बाद अंतिम सूची जारी होती है जिसे पार्टियों और उम्मीदवारों के बीच वितरित कर दिया जाता है. पोलिंग स्टेशन के सेट अप की प्रक्रिया जानने के बाद आइए समझते हैं कि एक पोलिंग स्टेशन का ले-आउट यानी खाका किस तरीके का होता है, और उसमें क्या सुविधाएं मौजूद होनी चाहिए?
पहले-पहल तो यह सबसे जरूरी है कि किसी पोलिंग स्टेशन में मतदाताओं के लिए प्रवेश और निकास का दरवाजा अलग-अलग हो. अगर किसी बिल्डिंग में एक ही दरवाजा है, तो भी उसमें टेम्पररी तौर पर ही सही, लेकिन बीच में रस्सी बांधकर या बांस के जरिए उसे दो भाग में बांटा जाता है और प्रवेश और निकास को अलग किया जाता है. इसके अलावा जो वोटिंग कम्पार्टमेंट होता है, वो प्लास्टिक की मोटी चादरों या फिर स्टील के फ्लैक्स बोर्ड से बना होना चाहिए जिसका आयतन 24x24x30 इंच से कम नहीं हो.
मतदाताओं के शानदार वोटिंग अनुभव के लिए एक पोलिंग स्टेशन पर कुछ न्यूनतम सुविधाएं सुनिश्चित की जाती हैं. मसलन, बैठने के लिए फर्नीचर हो, प्रकाश की व्यवस्था अच्छी होनी चाहिए, वैसे साइन बोर्ड का इस्तेमाल किया जाए, जो स्पष्ट संकेत करते हों. पुरुषों और महिलाओं के लिए टॉयलेट की व्यवस्था अलग-अलग हो. वोटरों की आसानी के लिए सूचना से पटे पोस्टरों का इंतजाम किया जाए. जैसे उम्मीदवारों की सूची वाले पोस्टर, पहचान के लिए प्रमाणपत्र सूची वाले पोस्टर वहां प्रमुखता से होने चाहिए.
भारत में इतनी गर्मियों में जो चुनाव होते हैं उन्हें भी ध्यान में रखते हुए ECI पोलिंग स्टेशनों पर कुछ इंतजाम करता है. वैसे पोलिंग स्टेशन जहां भयानक गर्मी पड़ सकती है या लू से बीमार पड़ने की आशंका होती है, वहां ECI टेन्ट, कैनोपी या छाते का इंतजाम कराता है. वहां पंखे की व्यवस्था की जाती है, वेंटिलेशन का ख्याल रखा जाता है. पीने के पानी के अलावा ओआरएस का भी वहां इंतजाम किया जाता है. पोलिंग स्टाफ के पास प्रायमरी मेडिकल किट होती है, और उन्हें लू या फिर खतरनाक गर्मी से बचाव के लिए भी प्रशिक्षित किया जाता है. ECI इन पोलिंग स्टेशनों की पहचान भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के आधार पर करता है.
सामान्य मतदाताओं के साथ-साथ ECI दिव्यांगजन वोटरों के लिए भी खास इंतजाम करता है. इस बार 88.40 लाख दिव्यांगजनों ने चुनाव में वोट डालने के लिए रजिस्ट्रेशन कराया है. ECI ने उनके लिए व्हीलचेयर के साथ-साथ पोलिंग स्टेशन के करीब पार्किंग स्लॉट की व्यवस्था की है. दिव्यांगजन ECI के सक्षम एप का सहारा ले सकते हैं और वहां से अपने लिए व्हीलचेयर के साथ-साथ पिक-अप और ड्रॉप सेवा के लिए गाड़ियां बुक कर सकते हैं. वोट डालने के लिए उन्हें कतार में लगने की भी जरूरत नहीं है.
किसी पोलिंग स्टेशन में सभी लोग प्रवेश नहीं कर सकते, क्योंकि यह एक वर्जित क्षेत्र होता है. इसमें जो लोग जा सकते हैं उनमें रजिस्टर्ड मतदाता हो सकते हैं, पोलिंग ऑफिसर हो सकते हैं, उम्मीदवार भी जा सकते हैं. इनके अलावा जो पोलिंग एजेंट होते हैं, प्राधिकृत मीडिया कर्मी, इलेक्शंस ड्यूटी पर तैनात सरकारी अधिकारी, ECI द्वारा नियुक्त पर्यवेक्षक, वीडियोग्राफर, फोटोग्राफर के अलावा वेबकास्टिंग करने वाले लोग भी पोलिंग स्टेशन में प्रवेश कर सकते हैं. इनके अलावा भी कुछ और लोग होते हैं जिन्हें प्रवेश की मंजूरी मिली होती है. एक पोलिंग एजेंट वह होता है जिसे उम्मीदवार तय करता है. एक समय में एक ही पोलिंग एजेंट स्टेशन पर रह सकता है.
एक पोलिंग पार्टी में पीठासीन अधिकारी के अलावा तीन पोलिंग ऑफिसर होते हैं. पहले पोलिंग ऑफिसर के पास यह जिम्मेदारी होती है कि वह मतदाता की पहचान की जांच करे. दूसरा ऑफिसर मतदाता के बाएं हाथ की कानी अंगुली (इंडेक्स फिंगर) पर मतदान वाली नीली स्याही लगाता है. इसके अलावा वह वोटर रजिस्टर भी मेंटेन करता है और वोटर स्लिप जारी करता है. तीसरा अधिकारी, मतदाता से वो वोटर स्लिप वापस लेता है. वह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के कंट्रोल यूनिट को मैनेज करता है और यह सुनिश्चित करता है कि वोट डालने जाने से पहले मतदाता की अंगुली में नीली स्याही लग चुकी है.
बूथ लेवल ऑफिसर, जिन्हें बीएलओ कहा जाता है. वे मतदाताओं को उनके पोलिंग बूथ को ढूंढ़ने में मदद करते हैं. इसके अलावा वे मतदाता सूची में उनका नाम ढूंढ़ने में सहायता करते हैं. एक विलेज ऑफिसर भी होते हैं जिनकी जरूरत तब पड़ती है जब किसी मतदाता की पहचान की जांच करनी होती है. वहीं, सुरक्षाकर्मियों पर यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी होती है कि मतदान की प्रक्रिया सुचारु रूप से चलती रहे.