महिलाओं को ताकतवर पद देने में BJP फिसड्डी; क्या हैं दूसरी पार्टियों का हाल?
संसद में महिला आरक्षण की बात आते ही सभी दल समर्थन में खड़े हो जाते हैं लेकिन उनके सबसे ताकतवर बोर्ड और कमिटियों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व काफी कम है

भारत के ज्यादातर राजनीतिक दलों ने संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण दिए जाने का समर्थन किया है. लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन पार्टियों के अंदर ही प्रमुख फैसले लेने वाली ताकतवर कमिटियों और बोर्डों में महिलाओं की मौजूदगी नहीं के बराबर है.
महिला आरक्षण का कानून बनाने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी (BJP) की स्थिति इस मामले में औसत के मुकाबले ज्यादा खराब है. इस मामले में बाकी राष्ट्रीय दलों जैसे- कांग्रेस, AAP, BSP और NPP की स्थिति भी संतोषजनक नहीं कही जा सकती.
सभी 6 राष्ट्रीय दलों की ताकतवर कमिटियों या बोर्डों में कितनी महिलाएं हैं?
देश की सबसे बड़ी पार्टी BJP के संसदीय बोर्ड में महिलाओं की संख्या सिर्फ 8 फीसदी है. वहीं दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के CWC में यह आंकड़ा करीब 17 फीसदी है.
इसी तरह वाम दल CPI(M) में महिलाओं की भागीदारी महज 11 फीसदी है. साफ है कि लेफ्ट हो या राइट, सभी राष्ट्रीय दलों की स्थिति इस मामले में लगभग एक जैसी है. अब दो ग्राफिक्स में देखिए कि 6 राष्ट्रीय दलों के ताकतवर पदों पर महिलाओं की क्या स्थिति है-
इसके अलावा, हमने इन सभी 6 राष्ट्रीय दलों की दूसरी सबसे ताकतवर कमिटियों और बोर्डों में महिलाओं की स्थिति पर भी रिसर्च की. यहां भी स्थिति खास बेहतर नहीं दिखी. उदाहरण के लिए, BJP में संसदीय बोर्ड के बाद सेंट्रल इलेक्शन कमिटी दूसरी सबसे ताकतवर संस्था मानी जाती है. इसमें कुल 15 सदस्य हैं, जिनमें सिर्फ 2 महिलाएं हैं. यानी इस कमिटी में महिलाओं की हिस्सेदारी महज 13.33 फीसदी है.
इसी तरह कांग्रेस की सेंट्रल इलेक्शन कमिटी में अध्यक्ष समेत कुल 15 सदस्य हैं, जिनमें 5 महिलाएं हैं यानी यह करीब 20 फीसदी है. CPI(M) की सेंट्रल कमिटी में कुल 84 सदस्यों में 17 महिलाएं हैं, यानी यह लगभग 20 फीसदी है. आम आदमी पार्टी (AAP) की नेशनल एग्जीक्यूटिव में कुल 31 सदस्यों में 7 महिलाएं हैं, यानी करीब 23 फीसदी. बाकी NPP और BSP की बात करें तो इनमें अलग से कोई दूसरी ताकतवर कमिटी नहीं है.
संसद या दलों के ताकतवर पदों पर महिलाओं की मौजूदगी क्यों ज्यादा अहम है?
आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के फेलो अंबर कुमार घोष ने अपनी रिसर्च रिपोर्ट में लिखा है कि संसद में महिलाओं की भागीदारी लोकतंत्र को मजबूत करती है, लेकिन पार्टी की अंदरूनी संरचना इसकी सबसे बड़ी बाधा है. अगर महिलाएं पार्टी में ताकतवर पदों पर नहीं हों, तो अहम फैसलों में भूमिका नहीं निभा पाती हैं. यहां तक कि पार्टी टिकट के लिए भी वे पुरुष-प्रधान नेतृत्व पर निर्भर रहती हैं.
वहीं, राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं, "महिलाओं को पार्टी की लीडरशिप और निर्णय-निर्माण पदों जैसे नेशनल एग्जीक्यूटिव, सेंट्रल इलेक्शन कमिटी आदि में समान भागीदारी देना जरूरी है. बिना इसके संसद में आरक्षण सिर्फ ढकोसला साबित होगा. कांग्रेस और BSP जैसे दलों में लंबे समय तक नेतृत्व महिलाओं के हाथ में रहा, इसके बावजूद पार्टी में महिलाओं की हिस्सेदारी नहीं बढ़ी."
सीनियर जर्नलिस्ट वीर सांघवी अपने एक लेख में लिखते हैं, "अगर लोगों को लगता है कि सांसद कोई अहम भूमिका निभाते हैं, तो वे इस तथ्य को नजरअंदाज कर देते हैं कि ज्यादातर सांसदों को सिर्फ पैरवी करने वाले मोहरे के रूप में देखा जाता है. असल फैसले सरकार और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के एक छोटे से गुट द्वारा लिए जाते हैं. सांसदों का काम मुख्य रूप से आदेश मिलने पर मतदान करना होता है."
इसके बावजूद यह तो माना ही जा सकता है कि जब तक राजनीतिक दलों के अंदर प्रमुख पदों और कमिटियों में महिलाओं की हिस्सेदारी नहीं बढ़ेगी, तब तक संसद में उनकी संख्या बढ़ने से भी ज्यादा असरदार बदलाव नहीं आएगा.
महिला सांसदों के मामले में पार्टियों की स्थिति
18वीं लोकसभा की 543 सीटों में इस बार केवल 74 महिला सांसद चुनी गई हैं, जबकि पिछली लोकसभा में यह संख्या 78 थी. इस बार चुनी गई महिला सांसद नई संसद का सिर्फ 13.63 फीसदी हिस्सा हैं. संख्या के आधार पर सबसे अधिक 240 में से 31 महिला सांसद BJP से हैं. हालांकि, कुल सांसदों के अनुपात में देखें तो तृणमूल कांग्रेस (TMC) सबसे आगे है.
TMC के कुल सांसदों में महिला सांसदों की संख्या करीब 38 फीसदी है. लोकसभा चुनाव में कुल 29 सांसद ममता बनर्जी की पार्टी के थे, जिनमें 11 महिलाएं थीं. हालांकि, TMC के सबसे ताकतवर कमिटी में भी महिलाओं की हिस्सेदारी 20 फीसद से कम ही है.
BJP के कुल सांसदों में महिला सांसद करीब 13 फीसदी हैं. तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी DMK में करीब 18 फीसदी महिला सांसद हैं. DMK के कुल 22 सांसदों में से करीब 3 महिला सांसद हैं, जबकि कांग्रेस में महिला सांसदों की हिस्सेदारी करीब 13 फीसदी है. कांग्रेस के कुल 99 सांसदों में से 13 महिला लोकसभा सांसद चुनी गई थीं.
इसके अलावा, मोदी सरकार 3.0 की कैबिनेट में कुल 72 सदस्य हैं, जिनमें केवल 7 महिलाएं हैं. हैरानी की बात यह है कि इनमें से सिर्फ दो महिलाओं- निर्मला सीतारमण और अन्नपूर्णा देवी को ही कैबिनेट दर्जा मिला है. ऐसे में साफ है कि पार्टी स्तर पर तो दूर, संसद और सरकार के अंदर भी फिलहाल महिलाओं की मौजूदगी काफी अच्छी नहीं है.
क्या ऐसे में नारी शक्ति को न्याय मिल पाएगा?
पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई का कहना है, "दलों के स्तर पर कड़ाई से इस तरह के नियम को लागू किए बिना संसद या विधानसभा में महिला आरक्षण लागू करने का कोई मतलब नहीं. अगर लागू हो भी जाए, तो सोचिए कितनी सारी महिलाएं संसदीय चुनाव लड़ने के लिए आगे आएंगी. भारतीय राजनीतिक सिस्टम में धन बल और बाहुबल के अलावा पहचान व वंशवाद आदि का बोलबाला है. ऐसे में साधारण महिलाओं के लिए यह कितनी बड़ी खुशखबरी होगी, यह अभी कहना जल्दबाजी होगा."
वहीं, सीनियर जर्नलिस्ट वीर सांघवी इस मामले में कहते हैं, "सच कहूं तो, मुझे यकीन नहीं है कि ज्यादातर महिलाएं आरक्षण के संभावित लाभार्थियों से खुद को जोड़ पाती हैं. आज के भारत में राजनीतिक भागीदारी आम लोगों से बहुत दूर हो चुकी है. कितनी महिला मतदाता इस कानून को लेकर कहेंगी-वाह! इसका मतलब है कि मैं भी सांसद बन सकती हूं? महिलाएं जानती हैं कि यह लागू हुआ तो भी इसका लाभ किस तबके को मिलेगा."