भारत में बेलगाम होती कोचिंग इंडस्ट्री; चीन से क्या सबक सीखा जा सकता है?
पटना में दो कोचिंग संस्थानों के बीच तनाव के कारण छात्रों का सड़क पर उतरना हो या फिर नीट पेपर लीक मामले में कोचिंग संस्थानों की संदिग्ध भूमिका सामने आना, भारत में अब इन पर लगाम लगाए जाने की जरूरत दिखने लगी है

2 जून की शाम पटना के मुसल्लाहपुर हाट के पास स्थित खान सर के कोचिंग संस्थान के बाहर मारपीट और गोलीबारी की घटना सामने आई. खान सर ने मीडिया से बात करते हुए इस घटना के लिए अपने पड़ोसी कोचिंग सेंटर के मालिक और शिक्षकों को जिम्मेदार ठहराया.
इस घटना के बाद पटना के दो बड़े कोचिंग सेंटरों के बीच चल रही आपसी रंजिश सार्वजनिक रूप से सामने आ गई. दोनों पक्षों के सैकड़ों छात्र सड़क पर उतर आए और अपने-अपने शिक्षकों के समर्थन में नारेबाजी करने लगे. पुलिस ने मामले में केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी है.
बिहार के अलग-अलग हिस्सों से पटना आकर अपना भविष्य संवारने की कोशिश में जुटे छात्र दो कोचिंग सेंटरों की लड़ाई में सड़क पर उतर आए. अगर यही छात्र अपनी नौकरी या हक की लड़ाई के लिए सड़क पर उतरते तो यह समझा जा सकता था लेकिन दो कोचिंग सेंटरों की आपसी रंजिश में उनका सड़क पर उतरना चौंकाने वाली घटना थी.
इस घटना से पता चलता है कि सोशल मीडिया के दौर में तेजी से उभर रहे कोचिंग सेंटर पढ़ाई-लिखाई के अलावा छात्रों की जिंदगी के दूसरे पहलुओं पर भी काफी असर डाल रहे हैं. जाहिर है कि ऐसे में कोचिंग सेंटरों का रेगूलेशन या नियमन कितना जरूरी है.
बिहार और देश में कितना बड़ी है कोचिंग इंडस्ट्री?
बिहार की बात करें तो राजधानी पटना के राजेंद्र नगर से लेकर मुसल्लाहपुर हाट तक सैकड़ों घरों में लाखों छात्र रहकर पढ़ाई करते हैं. इन गलियों में घूमते हुए आपको प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबों की दुकानों की अंतहीन कतारें और कोचिंग संस्थानों की बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स नजर आती हैं.
पटना की तरह ही बिहार के दूसरे शहरों जैसे भागलपुर, मुजफ्फरपुर, मुंगेर, दरभंगा और कटिहार आदि में भी लाखों छात्र रहकर अलग-अलग परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. इन छात्रों को पढ़ाने के लिए हजारों कोचिंग संस्थान खुल गए हैं. इनमें से कई ने तो रजिस्ट्रेशन तक नहीं करवाया है.
कोचिंग एसोसिएशन ऑफ भारत के संस्थापक सचिव सुधीर कुमार सिंह ने एक इंटरव्यू में बताया था कि पटना में लगभग 4,000 कोचिंग सेंटर हैं. वहीं, पूरे बिहार में लगभग 7,700 कोचिंग सेंटर हैं और उनमें से आधे से अधिक पटना में हैं. हालांकि कोविड के बाद हजारों कोचिंग संस्थान बंद हो गए थे लेकिन अब एक बार फिर इनकी संख्या तेजी से बढ़ रही है. सिंह का अनुमान है कि पटना में कोचिंग इंडस्ट्री का सालाना राजस्व लगभग 450-500 करोड़ रुपए है.
इसी तरह अगर पूरे देश की बात करें तो राजस्थान का कोटा, दिल्ली का राजेंद्र नगर और मुखर्जी नगर, दक्षिण भारत में हैदराबाद और चेन्नई कोचिंग हब बन गए हैं. बिजनेस वर्ल्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में इन कोचिंग सेंटरों का कारोबार 58 हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा है.
कोचिंग सेंटरों ने औपचारिक शिक्षा संस्थानों के समानांतर सिस्टक खड़ा किया
कोचिंग सेंटर अब केवल पढ़ाई या परीक्षा की तैयारी तक सीमित नहीं हैं. वे सरकारी और प्राइवेट स्कूलों की खामियों का फायदा उठाकर शिक्षा के क्षेत्र में एक समानांतर व्यवस्था तैयार कर चुके हैं. यही वजह है कि कोचिंग अब एक अलग शिक्षा अर्थव्यवस्था बन गई है.
ग्रेट लेक्स इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट में अकाउंटिंग एवं फाइनेंस के असिस्टेंट प्रोफेसर सिमरजीत सिंह के मुताबिक, ऑनलाइन कोचिंग का बाजार 2023 में 231.6 मिलियन डॉलर का था, जो 2034 तक 971 मिलियन डॉलर हो जाएगा. हालांकि ऑनलाइन कोचिंग के कारण इन पर असर पड़ा है फिर भी यह सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है.
समस्या यह है कि कोचिंग सेंटर नियमों का पालन करने के मामले में काफी हद तक अनियमित रहे हैं. सरकार ने इनके बेलगाम मुनाफे और तौर-तरीकों पर अंकुश लगाने के लिए कई उपाय किए हैं लेकिन ये बहुत सफल होते नहीं दिखते.
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय और नियामक निकाय केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने कोचिंग सेंटरों पर नियंत्रण के लिए दिशा-निर्देश, सलाह और कुछ नियम तैयार किए हैं. इसका मकसद छात्रों पर गलत प्रतिस्पर्धा के कारण पड़ने वाले दबाव को कम करना और कोचिंग सेंटरों की गैरकानूनी गतिविधियों पर रोक लगाना है.
शिक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा, "एजुकेशन से जुड़े इस व्यावसायिक मॉडल में सुधार और नियमन की आवश्यकता है. कोचिंग सेंटर वाले छात्रों से अत्यधिक शुल्क लेते हैं और झूठे तथ्यों से उन्हें गुमराह करते हैं. साथ ही बुनियादी सुविधाएं भी प्रदान नहीं करते. यह उनकी मनमानी का परिणाम है."
कोचिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के मीडिया निदेशक केशव अग्रवाल ने 'दि प्रिंट' को दिए एक इंटरव्यू में कहा, "छात्र विज्ञापनों के कारण कोचिंग केंद्रों में नहीं आते. वे इसलिए आते हैं क्योंकि स्कूल उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार नहीं कर रहे हैं. कोचिंग औपचारिक शिक्षा प्रणाली में पैदा हुई गुणवत्ता की कमी को पूरा कर रही है."
पढ़ाने के अलावा पेपर लीक भी करवाने लगे कोचिंग सेंटर!
बीते कुछ सालों में कोचिंग सेंटर को लेकर एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है. ऐसा लगता है कि अब कोचिंग सेंटर सिर्फ छात्रों को पढ़ाते नहीं हैं, बल्कि पेपर लीक करवाने में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं. दरअसल, NEET UG 2026 परीक्षा 3 मई 2026 को हुई थी लेकिन पेपर लीक के आरोपों के बाद इसे रद्द कर दिया गया.
इस परीक्षा में बैठने वाले लाखों बच्चों के लिए ये घटना किसी सदमे से कम नहीं था. CBI जांच में एक बड़े संगठित नेटवर्क का खुलासा हुआ, जिसमें NTA के अंदरूनी लोग (पेपर सेटर्स/एक्सपर्ट्स), कोचिंग संस्थान मालिक, टीचर्स का नाम सामने आया. पेपर लीक मुख्य रूप से केमिस्ट्री, बॉटनी, जूलॉजी और फिजिक्स सेक्शन में हुआ था.अब दोबारा से यह परीक्षा 21 जून 2026 को प्रस्तावित है.
सबसे हैरानी की बात तो यह है कि इस पेपर लीक की घटना में लातूर के नामी कोचिंग संस्थान केमिस्ट्री क्लासेस के निदेशक शिवराज मोटेगांवकर को केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने नीट पेपर लीक मामले में पुणे से गिरफ्तार किया. इस शिक्षक को राउज एवेन्यू कोर्ट ने नौ दिन की CBI हिरासत में भेज दिया.
इसी तरह पुणे स्थित स्पेशल क्लासेस से जुड़े केमिस्ट्री टीचर पी.वी. कुलकर्णी ने ब्यूटी पार्लर ओनर मनीषा वाघमारे के जरिए छात्र जुटाकर नीट के सवाल डिक्टेट किए. वे NTA की प्रश्न पत्र सेट करने वाली टीम में शामिल थे. बाद में जांच में पता चला कि छात्रों के जरिए लिखे गए नोट्स असली पेपर से हूबहू मैच करते थे. इसी आधार पर CBI ने उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया.
जुर्माना के बाद भी नहीं थम रही कोचिंग सेंटरों की धांधली
ऐसा नहीं है कि कोचिंग संस्थानों की मनमानी रोकने की कोशिश नहीं हुई है. 2010 और 2012 में सरकार ने कोचिंग संस्थानों पर अंकुश लगाने के लिए कुछ कदम उठाए लेकिन उनका ज्यादा असर नहीं हुआ. 2023 में, जब केंद्रीय उपभोक्ता सुरक्षा प्राधिकरण (CCPA) ने भ्रामक विज्ञापनों के लिए कई बड़े कोचिंग संस्थानों पर जुर्माना लगाया, तब पहली बार यह मामला व्यापक चर्चा में आया.
पिछले लगभग चार वर्षों से कोचिंग केंद्रों पर जुर्माना लगाया जा रहा है. नवंबर 2024 तक 18 संस्थानों पर कुल जुर्माना 54 लाख रुपए से अधिक हो चुका था. CCPA की सचिव निधि खरे ने कहा, "हमने पहली बार कुछ संस्थानों पर दो-दो बार जुर्माना लगाया.
कई संस्थानों पर दूसरी बार जुर्माना 11 लाख रुपए तक पहुंच गया. कई लोगों ने मुझे और विभाग को ट्रोल करते हुए कहा कि करोड़ों कमाने वाले बड़े संस्थानों के लिए कुछ लाख रुपए कोई मायने नहीं रखते लेकिन बात पैसे की नहीं, उस संदेश की है जो हम देना चाहते हैं." हालांकि CCPA के इन फैसलों के खिलाफ कई कोचिंग संस्थान कोर्ट गए और यह मामला अब भी अदालत में विचाराधीन है.
कोचिंग सेंटर पर कंट्रोल के लिए भारत को चीन से सीखने की जरूरत क्यों?
जुलाई 2021 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने देश के निजी शिक्षा उद्योग पर लगाम लगाने और परिवारों के लिए स्कूली जीवन में संतुलन सुधारने के उद्देश्य से मूलभूत शिक्षा में लाभ कमाने वाले ट्यूशन पर प्रतिबंध लगा दिया. इसे "डबल रिडक्शन पॉलिसी" या दोहरी कटौती नीति के नाम से भी जाना जाता है. दरअसल, इस नाम की वजह यह है कि चीनी सरकार इस नीति के तहत शिक्षा व्यवस्था में दो अहम बदलाव करना चाहती थी.
पहला, अनधिकृत स्कूल के बाद की कक्षाओं को समाप्त करना और छात्रों पर होमवर्क का बोझ कम करना. दूसरा, परिवारों का ट्यूशन पर होने वाला खर्च कम करना और अनिवार्य शिक्षा में सुधार करना. खबरों के मुताबिक, इस नीति को पूरे देश में लागू करने से पहले बीजिंग, शंघाई और जियांग्सू समेत 9 नगरपालिकाओं में 12 महीनों तक परीक्षण के तौर पर लागू किया गया था.
इस नीति ने चीन में कोचिंग उद्योग की समस्या और उसके प्रभाव को लेकर बड़ी बहस छेड़ दी थी. इस पर बाजार की प्रतिक्रिया तत्काल और भयावह थी. TAL एजुकेशन और न्यू ओरिएंटल जैसी शिक्षा क्षेत्र की दिग्गज चीनी कंपनियों के अरबों डॉलर का सफाया हो गया. उनके शेयरों की कीमतें कुछ ही दिनों में 60 प्रतिशत तक गिर गईं.
इस नीति की घोषणा करते हुए शी जिनपिंग ने इस बात पर जोर दिया कि एक जिम्मेदार उद्योग केवल मुनाफे से प्रेरित नहीं होना चाहिए. यानी शिक्षा को व्यवसाय नहीं बनाया जा सकता. उन्होंने शिक्षण उद्योग में व्याप्त अव्यवस्था की निंदा करते हुए इसे "एक ऐसी जिद्दी बीमारी" बताया, जिसे नियंत्रित करना मुश्किल है.
इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत भी इस जिद्दी बीमारी की चपेट में आ चुका है. इससे पहले कि यह बीमारी लाइलाज हो जाए भारत को भी चीन की तर्ज पर कठोर कदम उठाने की जरूरत है.