कर्नाटक में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर बैन कारगर साबित हो पाएगा?

कानूनी विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि इंटरनेट युग में 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया का पूर्ण प्रतिबंध लगाना अव्यावहारिक होगा, क्योंकि इसे लागू करने में कई बाधाएं हैं

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

कर्नाटक सरकार ने 16 साल से छोटे बच्चों के लिए सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने का फैसला किया है. मीडिया में आई खबरों के मुताबिक आंध्र प्रदेश जैसे अन्य राज्य भी ऐसा ही कुछ सोच रहे हैं, ताकि बच्चे डिजिटल लत के नुकसान से बच सकें.

वैज्ञानिक आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि सोशल मीडिया बच्चों और किशोरों के दिमाग पर बुरा असर डाल रहा है. इससे उन्हें चिंता, उदासी और डिप्रेशन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है.

इतना ही नहीं, सोशल मीडिया के कारण बच्चे खुद को कम समझ पाते हैं, ऑनलाइन बदमाशी यानी साइबरबुलिंग के शिकार हो जाते हैं और अपने शरीर की बनावट को लेकर काफी संशय या परेशानी में रहते हैं. कई बार सोशल मीडिया की लत लगने से वे गलत और अनुचित चीजें देखने लगते हैं. इतना ही नहीं खेलकूद और शारीरिक गतिविधियां भी काफी कम कर देते हैं.

पिछले साल ऑस्ट्रेलिया सोशल मीडिया के इस्तेमाल के लिए न्यूनतम आयु सीमा 16 साल निर्धारित करने वाला पहला देश बन गया. इसके चलते ऑस्ट्रेलिया में प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने 16 साल से कम आयु के लोगों के प्रोफाइल निष्क्रिय कर दिए और यह सुनिश्चित किया कि वे नए अकाउंट न बना सकें.

ऑस्ट्रेलिया सरकार का यह फैसला उसके एक सर्वे पर आधारित था, जिसमें पाया गया कि 10-15 वर्ष की आयु के 96 फीसद बच्चे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं. इनमें से आधे से ज्यादा साइबरबुलिंग के शिकार हैं और 70 फीसद बच्चे गलत और अनुचित चीजें देखने लगते हैं. ऑस्ट्रेलिया के इस फैसले के बाद डेनमार्क और न्यूजीलैंड सहित अन्य देशों ने भी इसी तरह के मॉडल पर रिसर्च में रुचि दिखाई है.

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राज्य का वार्षिक बजट पेश करते हुए कहा, "बच्चों में मोबाइल फोन के बढ़ते उपयोग के कारण उनपर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. ऐसे में सरकार 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रही है."

लीगल फर्म खेतान एंड कंपनी से जुड़े हर्ष वालिया के मुताबिक, भले ही कर्नाटक सरकार का इरादा बच्चों का कल्याण सुनिश्चित करना है, लेकिन सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना सही फैसला है या नहीं, यह पूरी तरह से कानूनी पेचीदगी और इसे लागू करने पर निर्भर करेगा.

वालिया बताते हैं, “इस तरह के प्रतिबंधों की अक्सर व्यावहारिक सीमाएं होती हैं, जिसमें यह जोखिम होता है कि बच्चे तकनीकी नियंत्रणों को आसानी से तोड़ सकते हैं या बायपास कर सकते हैं, जिससे इसका असर कम हो जाता है." हालांकि, इस फैसले से जुड़े विस्तृत सूचना और कानूनी दिशा-निर्देशों के अभाव में कोई ठोस निष्कर्ष निकालना भी जल्दबाजी होगी.

खेतान एंड कंपनी से जुड़े हर्ष वालिया का कहना है कि अगर इसे लागू किया गया तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को उम्र की जांच और उम्र-आधारित रोक के लिए मजबूत उपाय करने होंगे. साथ ही राज्य विशेष के आधार पर नियंत्रण भी लगाने पड़ सकते हैं, जैसे जियो-फेंसिंग. दरअसल, जियो-फेंसिंग जीपीएस, आरएफआईडी, वाई-फाई या सेलुलर डेटा का उपयोग करके किसी वास्तविक भौगोलिक स्थान के चारों ओर एक 'आभासी या डिजिटल सीमा' बनाने की तकनीक है. इसको लेकर अलग-अलग राज्यों में नियम अलग हो सकते हैं.

वालिया बताते हैं कि इसे लागू करने के लिए माता-पिता की सत्यापित सहमति लेना जरूरी होगा और यह पक्का करना शामिल होगा कि यूजर 16 साल से कम उम्र का है या नहीं.  

सिरिल अमरचंद मंगलदास लॉ फर्म में मीडिया, शिक्षा और गेमिंग विभाग की प्रमुख आरुषि जैन का कहना है कि बच्चे पहले से ही इंटरनेट आधारित दुनिया में जी रहे हैं, जहां सोशल मीडिया तक उनकी आसान पहुंच है. इसके अलावा, वे खरीदारी, यात्रा और दोस्तों से जुड़ने जैसी विभिन्न गतिविधियों के लिए ऐप्स का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में इस तरह के प्रतिबंध लागू करने से तकनीकी रूप से और अभिभावकों के लिए भी चुनौतियां आ सकती हैं.

जैन का कहना है कि इस समस्या से निपटने के लिए बच्चों की समझाइश और मार्गदर्शन आधारित दृष्टिकोण कारगर साबित हो सकता है. इसके अलावा, सोशल मीडिया की दुनिया को लेकर सही और गलत तरीकों के बारे में शिक्षित करना मददगार हो सकता है. जैन का मानना ​​है, "इससे जागरूक और जिम्मेदार डिजिटल नागरिकों की एक पीढ़ी तैयार करने में भी मदद मिल सकती है."

खेतान एंड कंपनी की पार्टनर तनु बनर्जी का कहना है कि व्यवहार में आयु-आधारित प्रतिबंधों को लागू करना कठिन हो सकता है, जबकि प्लेटफॉर्म सुरक्षा उपायों और डिजिटल साक्षरता के लिए एक समन्वित राष्ट्रीय ढांचा के जरिए इस समस्या का निदान अधिक प्रभावी हो सकता है.

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