IIT में बने स्टार्टअप का फ्रेट हाइपरलूप कैसे बदलेगा कांडला पोर्ट का कार्गो मैनेजमेंट सिस्टम?
गुजरात के कांडला में दीनदयाल पोर्ट ऑथरिटी ने TuTr हाइपरलूप को 8.7 करोड़ रुपए का कॉन्ट्रैक्ट दिया है. यह पोर्ट के भीतर जहाज से सीधे 40 टन के कंटेनर उठाकर 200 किलोमीटर प्रति घंटे तक की रफ्तार से ढोएगा

कांडला पोर्ट पर भारत का हाइपरलूप सपना आखिरकार उस मुकाम पर पहुंच गया है, जहां दुनिया भर में यह तकनीक अब तक मुश्किल से पहुंच पाई हैः लाइव कमर्शियल ऑर्डर. न कोई टेस्ट ट्रैक, न चमकदार प्रेजेंटेशन, न यूनिवर्सिटी का डेमो. असली माल, असली पैसा और असली डेडलाइन.
गुजरात के कांडला में दीनदयाल पोर्ट अथॉरिटी ने TuTr हाइपरलूप को 8.7 करोड़ रुपए का कॉन्ट्रैक्ट दिया है. यह स्टार्टअप IIT मद्रास में इनक्यूबेट हुआ है. काम सुनने में सीधा है, लेकिन करना बेहद चुनौतीपूर्ण. जहाज से सीधे 40 टन वाले कंटेनर उठाना और पोर्ट के भीतर मौजूद अलग-अलग लोडिंग बे तक उन्हें 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पहुंचाना.
यानी रेल से भी तेज और आज पोर्ट के भीतर चलने वाले ट्रकों से तो कई गुना ज्यादा फास्ट. कांडला में अक्सर यहीं सबसे बड़ा जाम लगता है. जहाज से कंटेनर और बल्क कार्गो तो उतर जाते हैं, लेकिन फिर उन्हें तीन से आठ किलोमीटर तक पोर्ट के अंदर ले जाना पड़ता है, तब जाकर वे सड़क से जुड़ते हैं. ट्रकों की कतारें लग जाती हैं. रेल साइडिंग भर जाती है.
बर्थ जरूरत से ज्यादा समय तक फंसे रहते हैं. अब योजना यह है कि इस पूरे मूवमेंट को एक खास इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिस्टम से किया जाए. फिलहाल इसमें लेविटेशन नहीं है. अभी प्रोपल्शन के लिए लीनियर इंडक्शन मोटर (LIM) का इस्तेमाल होगा.
इस सिस्टम के तहत कार्गो को सीधे बर्थ पर खड़े जहाज से हटाया जाएगा. 40 टन के स्टैंडर्ड कंटेनर तो इसका एक हिस्सा हैं ही. दूसरा बड़ा हिस्सा है ब्रेक बल्क कार्गो, खासकर लकड़ी, जो कांडला आने वाले कई जहाजों में होती है और जिसे तेजी से शिफ्ट करना हमेशा मुश्किल माना जाता है. TuTr का वाहन इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वह भारी कंटेनर और भारी बल्क, दोनों संभाल सके.
कांडला से मिले इस कॉन्ट्रैक्ट के बाद TuTr हाइपरलूप अब गुजरात से बाहर भी नजरें गड़ा चुका है. अधिकारियों के मुताबिक कंपनी जल्द ही जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी और कोलकाता पोर्ट अथॉरिटी के साथ भी समझौते साइन करने वाली है. अगर यह सिस्टम इतने अलग-अलग किस्म के पोर्ट्स पर काम कर गया, तो इसे कहीं भी लागू करने की दलील और मजबूत हो जाएगी.
कांडला में शुरुआत LIM से होगी. यानी पॉड्स इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरीके से तेज होंगे, लेकिन ट्रैक पर ही चलेंगे. TuTr पहले ही पोर्ट को LIM का एक सब-स्केल प्रोटोटाइप दिखा चुका है. इसी ने अथॉरिटी को भरोसा दिलाया कि यह तकनीक धूल, नमक, कंपन और एक ऐक्टिव पोर्ट के बाकी तमाम दबाव झेल सकती है. अब कमर्शियल एग्रीमेंट के तहत कई LIM पॉड्स बनाए और तैनात किए जाएंगे, जिनमें से हर एक 40 से 100 टन तक माल ढो सकेगा.
यह कोई एक बार का LIM एक्सपेरिमेंट नहीं है. स्टार्टअप का कहना है कि LIM डेमो के बाद कांडला में पूरी मैग्नेटिक लेविटेशन का प्रदर्शन भी किया जाएगा. मकसद है पूरी तरह कॉन्टैक्टलेस कार्गो ट्रांसपोर्ट, जिससे मैकेनिकल घिसावट और लंबे समय की मेंटेनेंस लागत और कम हो सके.
पॉड्स बैटरी से चलेंगे और उन्हें चार्ज किया जाएगा पोर्ट के भीतर लगे सोलर सिस्टम से. यानी सस्ता ईंधन, कम उत्सर्जन और बहुत कम मूविंग पार्ट्स. गाइडवे और वाहन का डिजाइन भी इस तरह रखा गया है कि LIM से लेविटेशन पर जाने के लिए सब कुछ उखाड़कर दोबारा शुरू न करना पड़े.
दीनदयाल पोर्ट अथॉरिटी के लिए भी यह सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि पोजिशनिंग का मामला है. कांडला भारत का पहला पोर्ट बनेगा, जहां पूरी तरह देसी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कार्गो टेक्नोलॉजी लागू होगी, जिसे 3डी स्केल मॉडल टेस्ट के जरिए कॉन्सेप्ट से हकीकत तक लाया गया है.
दुनिया के बाकी हिस्सों में हाइपरलूप अब भी ज्यादातर टेस्ट स्टेज पर ही है. यूरोपियन हाइपरलूप सेंटर ने नीदरलैंड्स में करीब 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से शुरुआती रन शुरू किए हैं, लेकिन यूरोपीय आकलन अब भी इसे डेमो टेक्नोलॉजी मानते हैं, रोजमर्रा के इस्तेमाल लायक नहीं. चीन अपने हाइ-स्पीड रेल लैब्स में वैक्यूम ट्यूब और मैगलेव सिस्टम टेस्ट कर रहा है, लेकिन अब तक कोई पब्लिक कंस्ट्रक्शन कॉन्ट्रैक्ट साइन नहीं हुआ. हाइपरलूप वन के बंद होने के बाद पश्चिम एशिया में भी हाइपरलूप की बातें कागजों और अनौपचारिक चर्चाओं तक सिमट गई हैं.