ईरान युद्ध ने थामी भारत में हाईवे निर्माण की रफ्तार!

भारत की हाईवे निर्माण संबंधी जरूरतों का लगभग 40 फीसद हिस्सा खाड़ी देशों से पूरा होता है. बिटुमेन (डामर) की आपूर्ति इसमें प्रमुख है

हाइवे निर्माण पर जंग का असर (सांकेतिक तस्वीर)
सांकेतिक फोटो

भारत में सड़क निर्माण का काम इस समय बहुत तेजी से चल रहा है. मानसून से पहले 2026-27 वित्तीय वर्ष में 10,000 किलोमीटर हाईवे बिछाने और पक्का करने का काम जोरों पर है.

इस बीच ईरान में जारी जंग ने हाईवे और सड़क निर्माण के इस रफ्तार पर असर डालना शुरू कर दिया है. पिछले कुछ सालों में हाईवे निर्माण की जो तेज गति रही, इस साल जंग के कारण वह धीमी पड़ गई है.

भारत ने 2025 में हाईवे और सड़क बनाने में इस्तेमाल होने वाले बिटुमेन (डामर) की लगभग 87.4 लाख टन खपत की, जो 2024 में 84.3 लाख टन थी. बिटुमेन का लगभग 40 फीसद हिस्सा दूसरे देश से आयात किया जाता है.

विदेश से आयात होने वाले बिटुमेन का करीब 95 फीसद हिस्सा खाड़ी देशों से आता है. अब पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव के कारण शिपिंग रूट प्रभावित हो रहे हैं और माल ढुलाई की लागत बढ़ गई है. इससे लागत और आपूर्ति दोनों पर असर पड़ा है.

पहले ईरान से काफी बिटुमेन आयात होता था, लेकिन सख्त प्रतिबंधों के कारण यह मुश्किल हो गया. यही कारण है कि ईरान जंग शुरू होने से पहले ही इसकी कीमतें प्रति टन पर करीब 2,000 रुपए बढ़ चुकी थीं. नेशनल हाईवे बिल्डर्स फेडरेशन के महानिदेशक पी.सी. ग्रोवर कहते हैं, "बिटुमेन बहुत जरूरी है, खासकर हाईवे की रखरखाव संबंधी ठेकों के लिए."

वर्तमान में आयातित बिटुमेन स्थानीय उत्पाद की तुलना में 20-25 फीसद सस्ता है. इसी लागत अंतर के कारण 2021 की तुलना में अब बिटुमेन आयात पर निर्भरता 30 फीसद से बढ़कर 40 फीसद हो गया है. 28 मार्च तक इराक से आयातित थोक बिटुमेन लगभग 360 डॉलर प्रति टन और ईरान से 310 डॉलर प्रति टन पर उपलब्ध था, जबकि मुंबई में इसकी थोक (घरेलू रिफाइनरी) कीमत 405 डॉलर प्रति टन थी.

इससे पता चलता है कि मौजूदा माल ढुलाई और जोखिम भरे हालातों में भी आयातित सामग्री स्थानीय बिटुमेन की तुलना में काफी सस्ती बनी हुई है. कच्चे तेल से बाकी सभी उपयोगी तत्व निकल जाने के बाद जो अवशेष बचता है, उसे बिटुमेन कहते हैं.

रिफाइनरी में एक खास प्रक्रिया के दौरान उसमें मौजूद हल्के अंश जैसे– पेट्रोल, डीजल, जेट ईंधन, नेफ्था आदि ऊपर उठते हैं और अलग हो जाते हैं. इस प्रक्रिया के अंत में बिटुमेन यानी डामर बनता है. यह गाढ़ा, चिपचिपा होता है और लगभग पूरी तरह से कच्चे तेल की गुणवत्ता और संरचना पर निर्भर करता है.

भारी कच्चे तेल ऐतिहासिक रूप से खाड़ी देशों और ईरान दोनों में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. ये तेल अन्य कच्चे तेलों की तुलना में अधिक बिटुमेन उत्पन्न करते हैं. हल्के कच्चे तेल, जिन्हें रिफाइनर अपने लाभ के लिए अधिक पसंद करते हैं, बहुत कम बिटुमेन उत्पन्न करते हैं. यही कारण है कि बिटुमेन की आपूर्ति की जगह और कच्चे तेल के उत्पादन की जगह व्यावहारिक रूप से एक ही हैं.

भारतीय ठेकेदार आमतौर पर फरवरी से जून के बीच डामर बिछाने का अधिकांश काम करते हैं. यही कारण है कि राज्य स्तरीय परियोजनाओं में स्टॉक बहुत कम होता है. आयातित सामग्री के आयात में थोड़ी देरी से भी पूरे देश में सड़क निर्माण कार्य रुक सकता है.

इस वक्त देश में एक साथ दर्जनों परियोजनाएं चल रही हैं. भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने घरेलू रिफाइनरों के साथ आपातकालीन बैठकें की हैं. राजमार्ग निर्माता कंपनी इस विवाद को आपदा घोषित करने की मांग कर रहे हैं. पिछले सप्ताह राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माता संघ ने इस संबंध में अपनी बातें सीधे केंद्रीय राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के सामने रखा.

विश्व मुद्रास्फीति सूचकांक (WPI) में बिटुमेन का हिस्सा मात्र 0.23 फीसद है, इसलिए अलग-अलग वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि का असर मुद्रास्फीति के आंकड़ों में नहीं दिखता. हालांकि, इससे ठेकेदारों के मार्जिन पर सीधा असर पड़ेगा.

राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माता संघ का तर्क बहुत ही प्रभावशाली है. उनका कहना है कि लागत में सामान्य अनुबंध शर्तों से कहीं अधिक वृद्धि हो (लगभग 18 फीसद तक), तो इस समस्या के हल के लिए एक स्वीकार्य उपाय होना चाहिए. खासकर तब जब यह वृद्धि ठेकेदारों के नियंत्रण से पूरी तरह बाहर और भू-राजनीतिक घटना के कारण हुई हो.

गडकरी ने कथित तौर पर उन्हें आश्वासन दिया कि उन्हें कुछ राहत देने पर विचार किया जाएगा. सवाल उठता है कि क्या इससे नीति में कोई बदलाव आएगा, जैसा कि कोविड महामारी के दौरान हुआ था? अगर हां, तो कब तक, यह अभी स्पष्ट नहीं है. लेकिन यह बैठक इस बात को दिखाती है कि दूर ईरान जंग का असर कैसे भारत के हाईवे और सड़क निर्माण करने वाले ठेकेदारों को प्रभावित करने लगा है.

यह दबाव सिर्फ बिटुमेन की वजह से नहीं है. निर्माण सामग्री ढोने वाले ट्रांसपोर्टरों, मिट्टी हटाने वाले उपकरण समेत बजरी और हाईवे निर्माण में लगने वाली हर चीज़ के दाम बढ़ गए हैं. इससे किसी सड़क परियोजना की आर्थिक स्थिति और भी खराब हो गई है. ग्रोवर कहते हैं, "इसका मतलब यह है कि ठेकेदारों को अपने लक्ष्यों को पूरा करने में अधिक समय लगेगा."

हाईवे ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और वर्टिस इंफ्रास्ट्रक्चर ट्रस्ट के संयुक्त सीईओ डॉ. जफर खान बताते हैं, "अल्पकालिक रूप से कच्चे तेल और रसद की लागत में वृद्धि के कारण मुद्रास्फीति का प्रभाव अधिक देखने को मिल सकता है. आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता भारत के आयात बिल को बढ़ा रही है, जिससे सभी क्षेत्रों में लागत का दबाव बढ़ रहा है."

यह इसलिए भी बड़ी समस्या है क्योंकि घरेलू स्तर पर बिटुमेन का उत्पादन निकट भविष्य में समस्या का समाधान नहीं कर पाएगा. भारतीय रिफाइनरियों ने ऐसी इकाइयां स्थापित करना शुरू कर दिया है, जो बिटुमेन को डीजल जैसे अधिक कीमती प्रोडक्ट में बदल रहा है. इससे बिटुमेन की घरेलू आपूर्ति प्रभावी रूप से कम हो रही है, जबकि मांग बढ़ रही है. इसके कारण देश की सड़क बनाने वाली कंपनियों को देश में बिटुमेन की कमी के कारण ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ रहा है.

हालांकि, बिटुमेन की जगह एक कम इस्तेमाल किया जाने वाला वैकल्पिक रास्ता भी है. CSIR-CRRI के जरिए कृषि अवशेषों से पायरोलिसिस प्रक्रिया से बायो-बिटुमेन बनाया गया है. इसका पायलट प्रोजेक्ट नागपुर में NH-44 (पूर्व में एनएच 7) पर चलाया गया है. पिछले वर्ष मेघालय और गुजरात में बरसात के मौसम में भी इसका परीक्षण किया गया था.

इसके साथ ही भारत ऐसा उत्पाद व्यावसायिक और औद्योगिक स्तर पर बनाने वाला पहला देश बन गया है. सरकारी अधिकारियों का अनुमान है कि इसके 15 फीसद मिश्रण के उपयोग से प्रति वर्ष 4,500 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा की बचत होगी. हालांकि अभी यह अनुमान थोड़ा आशावादी है.

राजमार्ग मंत्रालय का ध्यान 2026-27 कार्यक्रम में हो रही देरी को रोकने पर केंद्रित है. नेशनल हाईवे बिल्डर्स फेडरेशन के महानिदेशक पी.सी. ग्रोवर कहते हैं, "गुणवत्ता नियंत्रण का जिक्र अनुबंधों में कड़ाई से किया जाता है. इसलिए एक सीमा के बाद हम ऐसी किसी भी सामग्री का उपयोग नहीं कर सकते, जिसकी गुणवत्ता ठीक से प्रमाणित न हो."

यही कारण है कि राजमार्ग निर्माताओं को इस तरह की सामग्री अपनाने के लिए राजी करना एक बिल्कुल मुश्किल सवाल है. वे फिलहाल बदलाव की लागत वहन करने या चालू परियोजनाओं पर नई सामग्रियों का परीक्षण करने की स्थिति में नहीं हैं. फिलहाल वे गडकरी से मौजूदा अनुबंधों में राहत की उम्मीद कर रहे हैं.

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