भारतीय अर्थव्यवस्था को ईरान जंग की मार लंबे वक्त तक सहनी पड़ सकती है!

ईरान जंग के दौरान कच्चे तेल और गैस की बढ़ती कीमतों के अलावा भी बहुत कुछ है जिसका बुरा असर भारतीय अर्थव्यवस्था को सहना पड़ेगा

US-Israel-Iran War: Iran launched ballistic missile strikes on Qatar's Ras Laffan Industrial City, the world's largest LNG export terminal
सांकेतिक फोटो

फरवरी 2026 में भारत का व्यापार घाटा (आयात और निर्यात के बीच का अंतर) दोगुना होकर 27.1 अरब डॉलर (करीब 2.5 लाख करोड़ रुपए) पहुंच गया, जो फरवरी 2025 में 14.42 अरब डॉलर (लगभग 1.3 लाख करोड़ रुपए) था.

इससे अर्थव्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता जताई जा रही है. घाटे में यह बड़ी वृद्धि मुख्य रूप से सोने-चांदी के आयात में करीब 24 फीसद की तेजी और निर्यात में 0.81 फीसद की गिरावट के कारण हुई है.

वित्तीय वर्ष 2025-26 के पहले 11 महीनों (अप्रैल 2025 से फरवरी 2026) में भारत का व्यापार घाटा 310.6 अरब डॉलर (करीब 28 लाख करोड़ रुपए) रहा, जो पिछले साल की इसी अवधि के 261.8 अरब डॉलर (लगभग 24 लाख करोड़ रुपए) से काफी अधिक है.

हालांकि, महीने-दर-महीने आधार पर घाटा कम हुआ है. जनवरी 2026 में 34.68 अरब डॉलर था, जो फरवरी में घटकर 27.1 अरब डॉलर हो गया. चिंता की बात यह है कि मार्च में व्यापार और ज्यादा प्रभावित हो सकता है, क्योंकि 28 फरवरी 2026 से शुरू हुए ईरान जंग के कारण वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति में बड़ी उथल-पुथल मची हुई है.

इससे सभी देशों के चालू खाता घाटे (Current Account Deficit - CAD) पर व्यापक असर पड़ेगा, जो देश में आने-जाने वाली कुल पूंजी को मापा जाता है. कच्चे तेल की कीमतों में ईरान जंग की शुरुआत के बाद से लगभग 43 फीसद की वृद्धि हुई है. इसी तरह प्राकृतिक गैस की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण आयात बिल में वृद्धि से चालू परिचालन लागत पर सीधा असर पड़ने की संभावना है.

यस बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है, "जंग के कारण निर्यात भी प्रभावित होगा क्योंकि भारत की शिपिंग क्षमताएं अभी भी प्रभावित हैं. खबरों के मुताबिक, यूरोप और अमेरिका को निर्यात करने वाली वैश्विक शिपिंग क्षमताएं सामान्य स्तर से 30-35 फीसद तक कम हो गईं हैं. इसका प्रमुख कारण यह है कि भारतीय प्रोडक्ट को अब दूसरे मार्गों से अमेरिका या यूरोपीय बाजार में भेजना होगा, जिससे ईंधन और बीमा लागत में वृद्धि होगी."

इसके अलावा, खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देश भारतीय वस्त्रों के लिए एक प्रमुख निर्यात बाजार बने हुए हैं. हालांकि, भारत उर्वरक आयात में विविधता लाया है, लेकिन संघर्ष से कीमतों पर दबाव बढ़ने की संभावना है. केंद्र सरकार ने उर्वरक संयंत्रों को LNG (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम लागू किया है.

रिपोर्ट में कहा गया है, "उर्वरकों की ऊंची कीमतों से चालू खाता राजस्व (CAD) पर दबाव पड़ने की संभावना है. साथ ही, GCC देश भारत के लिए रेमिटेंस, वस्तुओं के आवागमन और वस्तुओं को बेचने के लिहाज से प्रमुख केंद्र हैं. जंग के कारण इन अर्थव्यवस्थाओं में होने वाली समस्या के कारण भारत पर इसका असर पड़ना तय है. रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि वित्त वर्ष 2027 में CAD सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 1.5-2 फीसद तक बढ़ जाएगा.

पूंजी प्रवाह में कमी के कारण रुपए पर दबाव बढ़ सकता है. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और जंग के बीच विदेशी मुद्रा भंडार में कमी के चलते रुपया 17 मार्च को डॉलर के मुकाबले 12 पैसे गिरकर सर्वकालिक निचले स्तर 92.4 पर आ गया. ब्रेंट क्रूड 17 मार्च को 102 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कारोबार कर रहा था, जो एक दिन पहले 105 डॉलर तक पहुंच गया था.

वैश्विक कच्चे तेल का बाजार अत्यधिक अस्थिरता के दौर में प्रवेश कर चुका है, जिसका मुख्य कारण जंग में तेल और गैस भंडारों पर होने वाला हमला है. इससे कीमतों में भारी वृद्धि हुई है और होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने के कारण आपूर्ति व्यवस्था भी बाधित हुई है. उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों से गुजरने वाले जहाजों के लिए टैंकर माल ढुलाई दरें और बीमा प्रीमियम बढ़ने से खरीद की लागत में काफी वृद्धि हुई है.

वित्त वर्ष 2025 में भारत का तेल आयात बिल लगभग 137 अरब डॉलर (12.6 लाख करोड़ रुपए) था. विश्लेषकों का अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमतों में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से भी भारत का वार्षिक आयात बिल लगभग 14 अरब डॉलर (1.3 लाख करोड़ रुपए) तक बढ़ सकता है, जो 10 फीसद की वृद्धि है.

प्राकृतिक गैस की कीमतों में भी इसी तरह के जोखिम हैं. वित्त वर्ष 2025 में भारत का गैस आयात बिल लगभग 15.2 अरब डॉलर (1.4 लाख करोड़ रुपए) था, और प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट (MMBTU) 1 डॉलर की वृद्धि से देश की आयात लागत में लगभग 1.2 अरब डॉलर (11,000 करोड़ रुपए), या 8 फीसद की वृद्धि हो सकती है.

मध्य पूर्व में जंग के कारण होर्मुज स्ट्रेट में यातायात पूरी तरह बाधित हुआ है. इसके चलते 2026 की शुरुआत में तेल टैंकरों के किराए कई वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं.

सिस्टमैटिक्स इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज़ की एक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, होर्मुज स्ट्रेट में गंभीर व्यवधान और हमले की आशंका के कारण बीमा प्रीमियम में भारी वृद्धि हुई है. इसके कारण टैंकरों के किराए में वृद्धि हुई है, जिसमें बहुत बड़े कच्चे तेल वाहक के किराए मार्च की शुरुआत में दोगुने से भी अधिक बढ़कर 423,000 डॉलर प्रति दिन (मध्य पूर्व-चीन मार्ग) से ऊपर हो गए हैं.

पिछले कुछ समय में दक्षिण कोरिया की सिनोकोर शिपिंग ग्रुप ने बड़े पैमाने पर जहाजों की खरीद की है, जिससे अब वे गैर-प्रतिबंधित (नॉन-सैंक्शनड) फ्लीट के एक बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं. इससे जहाजों की उपलब्धता और कम हो गई है.

एक रिसर्च रिपोर्ट में कहा गया है, “कुछ जहाज उच्च-जोखिम वाले इलाकों से बच रहे हैं, जिसके कारण उन्हें केप ऑफ गुड होप यानी दक्षिण अफ्रीका के केप प्रायद्वीप के दक्षिणी किनारे से होकर लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है. इससे यात्रा में 15-20 दिन अतिरिक्त लगते हैं और जहाजों की उपलब्धता सीमित हो जाती है.”

टैंकर किराए में भारी उछाल आने से अमेरिकी क्रूड ऑयल शिपर्स छोटे जहाजों का इस्तेमाल करने लगे हैं. ब्लूमबर्ग के मुताबिक, हाल ही में कई एफ्रामैक्स जहाज बुक किए गए हैं, जो गल्फ कोस्ट से सिंगापुर तक क्रूड ले जाएंगे. इनकी लोडिंग मिड-मार्च में होनी है.

ईरान संघर्ष के दौरान वैश्विक आपूर्ति को स्थिर करने के लिए अमेरिका ने भारत को रूसी तेल को स्वीकार करने के लिए 30 दिन की छूट दी. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, भारत ने 30 दिन की अमेरिकी छूट के बाद लगभग 3 करोड़ बैरल बिना बिके रूसी कच्चे तेल की खरीद की. इससे पहले, भारत ने रूसी तेल की खरीद कम कर दी थी और उसकी जगह सऊदी अरब और इराक से कच्चे तेल का आयात शुरू कर दिया था.

हाल ही में भारतीय कंपनियों ने रूस से आयात बढ़ा दिया है. आयात में रूसी क्रूड के कई ग्रेड जैसे यूराल्स, ईएसपीओ (ESPO), और वरंडे शामिल हैं. गौरतलब है कि ये क्रूड लंदन डेटेड ब्रेंट की तुलना में 2-8 डॉलर प्रति बैरल (bbl) के प्रीमियम पर दिए गए. यह कीमत पिछले महीनों की स्थिति से बिल्कुल उलट है, जब रूसी कच्चा तेल वैश्विक बेंचमार्क की तुलना में कम कीमत पर बिक रहा था.

दरअसल, लंदन डेटेड ब्रेंट (Dated Brent) उत्तरी सागर (North Sea) के कच्चे तेल के लिए बेंचमार्क मूल्य निर्धारण करता है. यह आमतौर पर स्पॉट मार्केट में 10-30 दिनों में डिलीवरी के लिए तैयार तेल की कीमत को दर्शाता है.

भारत में अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत मार्च में बढ़कर 101.25 डॉलर प्रति बैरल हो गई है. आने वाले समय में इसका बड़ा असर भारतीय अर्थव्यवस्था में देखने को मिल सकता है. 70 डॉलर प्रति बैरल से 10 फीसद की वृद्धि से मुद्रास्फीति में लगभग 30 आधार अंक की वृद्धि हो सकती है. इसके अलावा, विकास दर 15 आधार अंक तक कमजोर हो सकती है.

रिपोर्ट में आगे कहा गया है, "फिलहाल, महंगाई RBI के मध्यम अवधि के लक्ष्य 4 फीसद से नीचे बनी हुई है, हालांकि अगर ईरान संघर्ष लंबा चला, तो कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और रुपए की गिरावट के कारण महंगाई में उछाल आ सकता है."
 

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