खाद के बाद अब कीटनाशकों का संकट, ईरान युद्ध किसानों को कितना महंगा पड़ेगा?

भारत कीटनाशकों के उत्पादन में दुनिया में दूसरे स्थान पर लेकिन इसके लिए जो जरूरी कैमिकल है, उसकी सप्लाई ईरान युद्ध की वजह से बुरी तरह प्रभावित हो रही है

धान के लिए कीटनाशक लॉन्च
कीटनाशकों की कमी का असर खरीफ की फसल पर दिख सकता है

कृषि क्षेत्र के चार महत्वपूर्ण इनपुट माने जाते हैं : बीज, सिंचाई, उर्वरक और कीटनाशक. इनमें से उर्वरक यानी खाद की सप्लाई चेन ईरान युद्ध से प्रभावित होने की खबरें पहले से ही आ रही हैं. अब इस युद्ध का असर कीटनाशकों की सप्लाई पर भी दिखने लगा है. 

दरअसल, 28 फरवरी 2026 को अमेरिका-इजरायल के हमले के बाद शुरू हुए ईरान युद्ध ने पश्चिम एशिया को अस्थिर कर दिया है. ईरान ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को प्रभावी रूप से बंद कर दिया है. इस वजह से वैश्विक तेल, एलएनजी और रासायनिक व्यापार के 20 प्रतिशत से अधिक हिस्से पर असर पड़ा है.

दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उर्वरक उपभोक्ता और कीटनाशक उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाला भारत भी इन दोनों मोर्चों पर युद्ध की आंच महसूस कर रहा है. सभी की चिंता यही है कि अगर स्थिति नहीं सुधरी, तो न केवल पूरा खरीफ सीजन दबाव में आएगा, बल्कि खेती की लागत भी बढ़ेगी. इसके नतीजतन महंगाई बढ़ेगी या फिर खेती ज्यादा घाटे का सौदा बन जाएगी.

जहां तक खात की बात है तो भारत में सालाना औसतन 350 लाख टन यूरिया और एक करोड़ टन डीएपी की खपत होती है. यूरिया बनाने का सबसे महत्वपूर्ण इनपुट गैस है. गैस आपूर्ति बाधित होने के कारण भारत के यूरिया कारखाने अपनी क्षमता के केवल 50 से 60 प्रतिशत पर काम कर रहे हैं. इस वजह से खरीफ सीजन से पहले स्टॉक जुटाने का काम प्रभावित हुआ है.

युद्ध ने एलएनजी, अमोनिया और सल्फर की कीमतें भी बढ़ा दी हैं. वैश्विक बाजार में अमोनिया की कीमत 450-470 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 725-750 डॉलर हो गई है. वहीं सल्फर 200 से 825 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गया है, जबकि आयातित डीएपी की कीमत 825 डॉलर प्रति टन हो गई है. रेटिंग एजेंसी क्रिसिल का अनुमान है कि अगर मध्य पूर्व संकट लंबा चला, तो उर्वरकों के घरेलू उत्पादन में 10-15 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है.

कीटनाशकों की बात करें तो इनके उत्पादन से जुड़ी कंपनियों के अधिकारियों का कहना है कि युद्ध से उनकी इनपुट लागत 20-25 प्रतिशत बढ़ गई है. इस बारे में सार्वजनिक क्षेत्र की एक कीटनाशक कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, ''कीटनाशकों के उत्पादन में कच्चे माल के तौर पर नेफ्था का इस्तेमाल किया जाता है. यूरिया के उत्पादन में जो भूमिका गैस की है, वही भूमिका कीटनाशकों के लिए नेफ्था की है. वैश्विक स्तर पर नेफ्था के कुल कारोबार का 55 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशिया की रिफाइनरियों से आता है, जो हॉर्मुज से होकर गुजरता है. नेफ्था से एथिलीन, प्रोपिलीन और बेंजीन जैसे इंटरमीडिएट बनते हैं, जिनकी मदद से कीटनाशकों का उत्पादन होता है.''

ऐसी स्थिति में भारत की कीटनाशक कंपनियों के सामने विकल्प क्या है? जवाब में वे कहते हैं, ''हम चीन की तरफ रुख कर रहे हैं, लेकिन असली संकट कीमतों का है. चीन के सप्लायर अब इंटरमीडिएट्स की कीमत बढ़ा रहे हैं. इससे हमारी उत्पादन लागत बढ़ रही है. पेट्रोकेमिकल्स की सप्लाई चेन बाधित होने का असर पैकेजिंग मैटेरियल्स पर भी पड़ा है. अब इसके लिए हमें 30-40 प्रतिशत अधिक खर्च करना पड़ रहा है.''

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कीटनाशक उत्पादक देश है. भारत हर साल लगभग 5.5 अरब डॉलर से अधिक के कीटनाशकों का निर्यात करता है और घरेलू जरूरतों के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर है. हालांकि, इनके उत्पादन के लिए जरूरी कच्चे माल के लिए भारत काफी हद तक आयात पर ही निर्भर है.

केंद्रीय कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी इस संकट से एक और बड़ी समस्या पैदा होने का अंदेशा जता रहे हैं. वे कहते हैं, ''हम लंबे समय से नकली कीटनाशकों की समस्या से जूझते आए हैं. सघन अभियान चलाकर हमने इस पर काफी हद तक काबू पाया था, लेकिन अब कीटनाशकों की आपूर्ति प्रभावित होती है तो इस खरीफ सीजन में नकली कीटनाशकों का बाजार फिर से सक्रिय हो सकता है. ऐसी स्थिति को रोकने के लिए मंत्रालय अपने स्तर पर विशेष तैयारी करने पर विचार कर रहा है.''

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