ईरान युद्ध से भारत में यूरिया की किल्लत और बढ़ सकती है!
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध की वजह से भारत में यूरिया के उत्पादन में कटौती हो रही है

पश्चिम एशिया में जब तनाव बढ़ता है तो भारत आमतौर पर तेल की चिंता करता है. लेकिन अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़ी ताजा जंग एक और रणनीतिक कमजोरी को उजागर कर सकती है और वह है उर्वरक. ईरान यूरिया और अमोनिया का एक महत्वपूर्ण वैश्विक निर्यातक है. साथ ही इस युद्ध की वजह से समुद्री मार्ग में जो बाधाएं उत्पन्न हुई हैं, उनसे भी भारत में यूरिया और गैस की आपूर्ति बाधित हो रही है.
यह कहना गलत नहीं होगा कि किसी भी देश की खाद्य सुरक्षा उस देश की उर्वरक सुरक्षा पर काफी हद तक निर्भर होती है. ऐसे में अगर उर्वरकों के उत्पादन और आपूर्ति पर इस युद्ध का असर पड़ता है तो इसका प्रभाव भारत के खाद्य प्रबंधन पर भी पड़ेगा. राहत की बात यह है कि खेती के लिहाज से यह ऑफ सीजन है.
लेकिन इसमें अधिक से अधिक उर्वरकों का स्टोरेज किया जाता है ताकि जब खरीफ सीजन की शुरुआत जून से हो तो उस वक्त उर्वरकों की कोई कमी न हो.
केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी इस बारे में बताते हैं, "1 अप्रैल को पिछले साल यूरिया का हमारा ओपनिंग स्टॉक 52 लाख टन था. इस साल हमारा लक्ष्य 60 लाख टन का ओपनिंग स्टॉक रखने का था. लेकिन इस युद्ध की वजह से हमें अपने इस लक्ष्य में संशोधन करना पड़ेगा और ऐसा लग रहा है कि इस बार का ओपनिंग स्टॉक पिछले साल से भी कम रहेगा."
देश का उर्वरक तंत्र काफी हद तक ग्लोबल सप्लाई चेन से जुड़ा हुआ है. यहां तक कि भारत का घरेलू यूरिया उत्पादन भी आयातित प्राकृतिक गैस पर काफी हद तक निर्भर है. भारत में आने वाली प्राकृतिक गैस में तकरीबन 85 प्रतिशत हिस्सेदारी खाड़ी के देशों-कतर, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब और कुवैत की है. ईरान युद्ध ने कतर से प्राकृतिक गैस की आपूर्ति रोक दी है. फॉस्फेटिक और पोटाशिक उर्वरकों और उनके कच्चे माल जैसे रॉक फॉस्फेट, सल्फर, अमोनिया और फॉस्फोरिक एसिड के लिए यह निर्भरता और भी अधिक है. ईरान यूरिया और अमोनिया का एक महत्वपूर्ण निर्यातक है. यानी अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहा युद्ध पश्चिम एशिया का ऐसा संकट है जो अब भारत के लिए एक बड़े कृषि संकट में बदल सकता है.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते भारत की अधिकांश गैस दूसरे देशों से आती है. यूरिया उत्पादन में जितनी गैस का इस्तेमाल होता है, उसमें से तकरीबन 60 प्रतिशत इसी रास्ते से भारत आती है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए समुद्री यातायात बाधित होने से भारत में कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति पर सबसे अधिक असर पड़ रहा है.
दरअसल, 2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण किया था तो उस समय भी उर्वरकों की आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई थी और वैश्विक बाजार में उर्वरकों की कीमतों में काफी बढ़ोतरी हुई थी. लेकिन भारत सरकार ने कीमतें नहीं बढ़ाकर उर्वरकों पर सब्सिडी बढ़ाने का निर्णय लिया था.
अब फिर से उर्वरक क्षेत्र में 2022 वाली स्थिति पैदा होती दिख रही है. यह संकट भारत के लिए कितना गहरा है? इस बारे में देश की एक प्रमुख उर्वरक कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, "पांच मार्च को ही गैस आपूर्ति करने वाली कंपनियों ने उर्वरक कंपनियों को बकायदा पत्र लिखकर यह बता दिया कि जितनी गैस सप्लाई का उनका कॉन्ट्रैक्ट है, वे फिलहाल उसका 40 से 50 प्रतिशत तक ही दे पाएंगे. कानूनी भाषा में इस प्रावधान को फोर्स मैजुर कहते हैं. यानी कोई ऐसी स्थिति जो सप्लाई करने वाली कंपनी के हाथ में न हो और इस वजह से अगर सप्लाई बाधित होती है तो सप्लाई लेने वाली उर्वरक कंपनी उस पर कोई मुकदमा नहीं कर सकती. इसका परिणाम यह हुआ कि देश की सभी उर्वरक कंपनियों की उत्पादन इकाइयां 40 से 50 प्रतिशत क्षमता पर ऑपरेट कर रही हैं."
यही अधिकारी बताते हैं कि अगर आपूर्ति और प्रभावित होती है तो कुछ उत्पादन इकाइयों को बंद करना पड़ेगा और अगर एक बार कोई यूरिया कारखाना बंद होता है तो दोबारा उसे शुरू करने में महीने भर तक का वक्त लग जाता है. अगर ऐसा हुआ तो आने वाले खरीफ सीजन में यूरिया आपूर्ति प्रभावित हो जाएगी. जाहिर है कि अगर एक बार यूरिया आपूर्ति प्रभावित हुई तो फिर इसका नकारात्मक असर खरीफ सीजन के उत्पादन पर भी पड़ेगा.
गैस आपूर्ति में तनाव की स्थिति साफ तौर पर दिख भी रही है.पहले केंद्र सरकार ने रसोई गैस सिलिंडर की कीमतों में 60 रुपए की बढ़ोतरी कर दी. फिर एक सिलिंडर लेने के बाद दूसरा सिलिंडर लेने के बीच के समय अंतराल को 21 दिन से बढ़ाकर 25 दिन कर दिया. कमर्शियल गैस सिलिंडर की आपूर्ति बाधित होने से देश भर के रेस्टोरेंट कारोबारियों की चिंता बढ़ गई है. दरअसल 9 मार्च को ही खबर आई है कि बेंगलुरु, चेन्नई और मुंबई में होटल-रेस्टोरेंट इंडस्ट्री की संस्थाओं ने कुकिंग गैस सिलेंडर की कमी की बात कही है.
जब गैस की कमी होती है तो फिर यह कैसे तय होता है कि कहां और कितनी मात्रा में गैस देनी है. इस बारे में केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के एक वरिष्ठ पदाधिकारी बताते हैं, "हमारे पास एक प्राथमिकता सूची है. जब भी गैस की आपूर्ति बाधित होती है तो पहली प्राथमिकता रसोई गैस सिलिंडर और लोगों की रसोई में लगे पाइप्ड गैस कनेक्शन को दी जाती है. इसके बाद अगला नंबर उन कॉमर्शियल वाहनों का आता है जो गैस से चलते हैं. इस सूची में फर्टिलाइजर प्रोडक्शन काफी नीचे है." यही वजह है कि उर्वरक क्षेत्र की गैस आपूर्ति में सबसे पहले कटौती की गई है.
भारत में यूरिया उत्पादन के अलावा यूरिया आयात पर भी इस युद्ध का नकारात्मक असर पड़ेगा. भारत में हर साल तकरीबन 350 लाख टन यूरिया की खपत होती है. इसमें से तकरीबन 100 लाख टन आयात होता है. यह आयात मोटे तौर पर ओमान, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन जैसे देशों से होता है. इसी तरह से डीएपी के लिए सऊदी अरब सबसे बड़ा स्रोत है. इसका मतलब यह हुआ कि इस युद्ध की वजह से इन देशों से होने वाला उर्वरक आयात भी नकारात्मक रूप से प्रभावित हुआ है.
भारत के उर्वरक उद्योग के लोग इसी उम्मीद में हैं कि यह युद्ध जल्द से जल्द खत्म हो. क्योंकि यह जितना लंबा चलेगा, देश के उर्वरक उत्पादन और आयात पर उतना ही गहरा असर पड़ता जाएगा जो देश की खेती-किसानी समेत पूरी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं होगा.