होर्मुज की खाड़ी में बने हैं अंडरग्राउंड एयरबेस! ईरान बरसों से कर रहा था जंग की तैयारी

ईरान ऐसे चार अंडरग्राउंड एयर बेस तैयार कर चुका है जिनसे पार पाना अमेरिका के लिए भी मुश्किल है

होर्मुज खाड़ी के पास बने ईरान का एक अंडरग्राउंड एयर बेस की सैटेलाइट इमेज; एक फाइटर जेट (इनसेट में)

अभी हाल ही में पाकिस्तान में हुई अमेरिका-ईरान शांतिवार्ता ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि पश्चिम एशिया की सतह पर भले ही कूटनीतिक संवाद जारी हो, लेकिन इसके नीचे तनाव की परतें अब भी उतनी ही गहरी हैं. अमेरिका और ईरान के बीच हफ़्तों से जारी जंग के बाद दोनों देशों ने बातचीत के जरिए हालात को संभालने की कोशिश की लेकिन यह शांति उतनी ही नाजुक है जितनी इस पूरे क्षेत्र की रणनीतिक स्थिति.

U.S. Fifth Fleet की सक्रिय मौजूदगी, फारस की खाड़ी में बढ़ती सैन्य गतिविधियां और ईरान की ओर से ड्रोन और मिसाइल क्षमताओं का लगातार विस्तार इन सबने मिलकर इस क्षेत्र को एक बारूद के ढेर में बदल दिया है, जहां दुनिया भर को जंग की चपेट में ले सकने वाली चिंगारी किसी भी वक्त भड़क सकती है. इस पूरे टकराव की धुरी है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़. दुनिया की ऊर्जा सप्लाई की वह संकरी नस जिस पर नियंत्रण का मतलब है वैश्विक दबदबा.

इस दबदबे की तैयारी 

इसी नब्ज पर पकड़ मजबूत करने के लिए ईरान ने पिछले कुछ सालों में अपनी रणनीति को एक नया रूप दिया है. खुली सैन्य ताकत दिखाने की बजाय उसने 'छिपी हुई ताकत' को विकसित करना शुरू किया और यह काम उसने तब शुरू किया जब दुनिया का ध्यान कहीं और था.

2021 के आसपास, जब कोविड महामारी अपने चरम पर थी ईरान ने होर्मुज़ के आसपास के पहाड़ी इलाकों में अंडरग्राउंड एयरबेस का निर्माण तेज कर दिया. यह निर्माण इतना सुनियोजित और गोपनीय था कि शुरुआती दौर में इसकी भनक तक नहीं लगी. बाद में सैटेलाइट इमेजरी और ओपन सोर्स इंटेलिजेंस के जरिए यह सामने आया कि पहाड़ों के भीतर एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया जा रहा है जो किसी भी बड़े सैन्य संघर्ष में गेम चेंजर साबित हो सकता है.

फरवरी 2023 में इस खामोश तैयारी की पहली आधिकारिक झलक सामने आई जब ईरान ने 'ओगाब 44' नाम के एक अंडरग्राउंड एयरबेस का खुलासा किया. होर्मुज़ के पास बंदर अब्बास पोर्ट से करीब 120 किलोमीटर दूर स्थित यह बेस पहाड़ों के बीच छिपा हुआ है और इसे 'हाइब्रिड टैक्टिकल एयर बेस' कहा गया है यानी ऐसा ठिकाना जहां फाइटर जेट्स और ड्रोन दोनों ऑपरेट कर सकते हैं. उस समय ईरान के अधिकारियों ने इसे युद्ध के समय 'गेम चेंजर' बताया. एक ऐसा बेस जो दुश्मन को अपनी रणनीति पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर सकता है.

होर्मुज़ की खाड़ी का रखवाला एयर बेस 

इस बेस की बनावट अपने आप में इसकी रणनीति को बयान करती है. पहाड़ की चट्टानों को काटकर बनाए गए इस कॉम्प्लेक्स में सुरंगों का एक बड़ा नेटवर्क है, जिनके जरिए फाइटर जेट्स को छिपाकर रखा जा सकता है. चार बड़े एंट्रेंस इन सुरंगों को एक लगभग 3 किलोमीटर लंबे रनवे से जोड़ते हैं. जेट्स इन सुरंगों के भीतर सुरक्षित रहते हैं और जरूरत पड़ने पर टैक्सीवे के जरिए रनवे तक पहुंचते हैं. सैटेलाइट इमेजरी से पता चलता है कि इस इलाके में 2021 से लगातार खुदाई और निर्माण का काम चलता रहा, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह प्रोजेक्ट लंबे समय से योजना का हिस्सा था. 

ईरान के लिए इस तरह के अंडरग्राउंड एयरबेस की जरूरत इसलिए भी थी क्योंकि उसकी एयरफोर्स लंबे समय से सीमित संसाधनों के साथ काम कर रही है. 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद उस पर लगे प्रतिबंधों ने उसे आधुनिक लड़ाकू विमानों से दूर रखा. ऐसे में उसके पास जो विमान हैं वे ज्यादातर पुराने लेकिन अभी भी प्रभावी हैं. McDonnell Douglas F-4 Phantom II जैसे जेट आज भी उसकी स्ट्राइक पावर का अहम हिस्सा हैं. ये जेट लंबी दूरी तक एंटी-शिप मिसाइलें लेकर जा सकते हैं, जिससे समुद्र में मौजूद दुश्मन के पानी के वॉर शिप पर अचानक हमला संभव हो जाता है.

क्या ये वाक़ई असरदार साबित हुआ? 

यहीं पर ओगाब-44 जैसे अंडरग्राउंड एयरबेस की असली भूमिका सामने आती है. फारस की खाड़ी में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी खासकर U.S. Fifth Fleet, ईरान के लिए हमेशा एक रणनीतिक चुनौती रही है. अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर और युद्धपोत इस इलाके में लगातार गश्त करते हैं जिससे ईरान पर दबाव बना रहता है. ऐसे में अगर कोई हमला खुले एयरबेस से किया जाए तो उसे पहले ही ट्रैक किया जा सकता है.

लेकिन अगर वही हमला पहाड़ों के भीतर छिपे किसी अंडरग्राउंड बेस से हो तो काउंटर अटैक का समय बेहद कम हो जाता है. यही इस बेस की सबसे बड़ी ताकत है. अचानक हमला करने की क्षमता और जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई की संभावना.

हालांकि, यह पूरी तस्वीर जितनी मजबूत दिखती है उतनी ही जटिल भी है. आधुनिक युद्ध में केवल छिप जाना ही पर्याप्त नहीं है. आज के दौर में हाइपरसोनिक हथियार और हाई-प्रिसीजन गाइडेड बम ऐसे ठिकानों को भी निशाना बना सकते हैं जो पहाड़ों के भीतर बने हों. लेकिन ईरान ने ओगाब-44 और ऐसे ही तीन और एयर बेस बनाते हुए इस बात का पूरा ध्यान रखा. बंकर बस्टर्स बमों से बचने के लिए सबसे ज़रूरी है बेस की लोकेशन और यहीं ईरान ने बाजी मारी. ईरान ने होर्मुज़ के गिर्द ऐसी लोकेशन चुनीं जहां कई किलोमीटर के भीतर उसके बेस को किसी बंकर बस्टर बम से भी भेदा ना जा सके.

लेकिन तकनीकी खामियां भी हैं 

किसी भी अंडरग्राउंड एयरबेस की सबसे बड़ी कमजोरी उसका रनवे होता है. जेट चाहे कितनी भी सुरक्षित सुरंग में खड़ा हो उसे उड़ान भरने के लिए खुले रनवे पर आना ही पड़ेगा, और यही वह क्षण होता है जब वह सबसे ज्यादा असुरक्षित होता है. 

इस बेस की एक और समस्या इसकी सुरंगों के साइज़ से जुड़ी है. ईरान लंबे समय से रूस से आधुनिक लड़ाकू विमान हासिल करने की कोशिश कर रहा है जिनमें Sukhoi Su-35 भी शामिल है. लेकिन अंडरग्राउंड बेस की सुरंगें उन पुराने विमानों को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं जिनका विंगस्पैन अपेक्षाकृत कम है. Su-35 जैसे बड़े और आधुनिक जेट्स का विंगस्पैन ज्यादा होने के कारण इनके इन सुरंगों में फिट होने की संभावना कम है. इस योजना का यही वो हिस्सा है जहां ईरान की रणनीति और उसकी तकनीकी सीमाएं आमने-सामने आ जाती हैं.

इसके बावजूद, इस पूरे प्रोजेक्ट को कम करके नहीं आंका जा सकता. युद्ध के मैदान में हमेशा सबसे आधुनिक हथियार ही निर्णायक नहीं होते बल्कि यह भी मायने रखता है कि उन्हें कैसे और कहां से इस्तेमाल किया जा रहा है. अगर एक पुराना जेट भी लंबी दूरी की मिसाइल लेकर किसी छिपे हुए बेस से अचानक हमला करता है तो वह दुश्मन के लिए बड़ा खतरा बन सकता है. ईरान का अंडरग्राउंड एयर बेस नेटवर्क इसी सिद्धांत पर आधारित है. कम संसाधनों से ज्यादा असर पैदा करना.

अब भी है काम जारी

ओपन सोर्स इंटेलिजेंस और सैटेलाइट इमेजरी यह संकेत देते हैं कि होर्मुज़ के आसपास इस तरह की गतिविधियां केवल एक जगह तक सीमित नहीं हैं. कई ऐसे लोकेशन्स हैं जहां पहाड़ों में कटे हुए एंट्रेंस, असामान्य रनवे पैटर्न और लगातार निर्माण गतिविधियां देखी गई हैं. हालांकि इन सभी को आधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं मिली है लेकिन ये संकेत देते हैं कि ईरान एक व्यापक अंडरग्राउंड नेटवर्क तैयार कर रहा है जो भविष्य के किसी भी सैन्य टकराव में उसकी रणनीतिक स्थिति को मजबूत कर सकता है.

हाल के दिनों में बंदर अब्बास के आसपास भी नई गतिविधियां देखी गई हैं जहां एक छोटे अंडरग्राउंड यूनिट पर लगातार काम जारी है. यह संभव है कि यह मौजूदा ढांचे की कमियों को दूर करने का प्रयास हो या फिर किसी नए और अधिक उन्नत नेटवर्क की शुरुआत. अगर ऐसा है तो यह साफ है कि ईरान अपनी रणनीति को लगातार विकसित कर रहा है और हर नई चुनौती के साथ खुद को ढाल रहा है.

ईरान के इस अंडरग्राउंड एयर बेस नेटवर्क को केवल एक एयरबेस के रूप में देखना इस कहानी को अधूरा समझना होगा. यह दरअसल उस बदलती हुई युद्ध रणनीति का हिस्सा है जिसमें अब सिर्फ ताकत दिखाना ही नहीं बल्कि उसे सही समय के लिए छिपाकर रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है. इजरायल अमेरिका के साथ जंग के शुरूआती दिनों में पूरी दुनिया ईरान को जिस तरह पीड़ित भाव से देख रही थी और अमेरिका के मुकाबले कमज़ोर समझ रही थी, ईरान ने इस नैरेशन को ना सिर्फ तोड़ा है बल्कि एक काउंटर नैरेशन बनाने में भी कामयाब रहा है.

अमरीकी राष्ट्रपति के बार-बार बदलते बयान और उनकी खिसियाहट यह साबित कर रही है कि ईरान उनके लिए गले की फांस बन चुका है. ख़ासकर होर्मुज़ के हिस्से में. और, यह बढ़त निश्चित तौर पर ईरान ने अपने अंडरग्राउंड नेटवर्क से हासिल की है. जिसे दिन पर दिन ईरान और मजबूत करने में लगा हुआ है. ऐसे में अमेरिका और इजरायल को आने वाले दिनों में ईरान के लिए शायद अलग काउंटर अटैक रणनीति बनानी पड़े.

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