हाई-स्पीड रेल बदल देगी भारत में कामकाज और रहने का तरीका!

हाई-स्पीड रेल सिर्फ एक ट्रेन प्रोजेक्ट नहीं बल्कि भारत के भूगोल को फिर से लिखने की कोशिश है. यह शहरों की सीमाओं को धुंधला कर उन्हें एक 'इकोनॉमिक कॉरिडोर' में बदल देगी

हाई स्पीड ट्रेन (फाइल फोटो)
हाई स्पीड ट्रेन (फाइल फोटो)

मुंबई से पुणे सिर्फ 28 मिनट में, बेंगलुरु से चेन्नई 78 मिनट में, हैदराबाद से बेंगलुरु 2 घंटे 8 मिनट में, मुंबई से अहमदाबाद 1 घंटे 57 मिनट में और दिल्ली से लखनऊ 2 घंटे में. नरेंद्र मोदी सरकार हाई-स्पीड रेल (HSR) के जरिए इन शहरों के बीच यात्रा का समय इतना ही रखना चाहती है.

इस पूरी परियोजना को लागू करने के लिए अनुमानित 16 लाख करोड़ रुपए खर्च करने पड़ेंगे. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस हफ्ते की शुरुआत में नई दिल्ली में आयोजित CII वार्षिक व्यापार सम्मेलन 2026 में विभिन्न क्षेत्रों के CEOs की बैठक को संबोधित करते हुए यह बात कही.

उन्होंने कहा कि ऐसा होते ही कोई भी हवाई यात्रा नहीं करना चाहेगा. इससे एयरलाइन सेक्टर को थोड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. अगर आप किसी एयरलाइन में निवेश करना चाहते हैं तो ठहरकर सोच लीजिए. कुछ लोगों को वैष्णव की बातें राजनेता जैसी लग सकती हैं लेकिन उनके तर्क हाई-स्पीड रेल (HSR) को लेकर दशकों के वैश्विक अनुभव पर आधारित थे.

वैष्णव ने कहा, “बेंगलुरु और चेन्नई एक जुड़वां शहर बन जाएंगे. ऐसा लगेगा कि दोनों शहर पूरी तरह से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं.” उन्होंने आगे कहा कि दिल्ली से वाराणसी की यात्रा 3 घंटे 50 मिनट में पूरी हो जाएगी. जिन लोगों ने पिछले 50 वर्षों में प्रमुख मार्गों पर हाई-स्पीड रेल (HSR) शुरू होने के बाद जापान, फ्रांस, स्पेन, इटली और चीन में हवाई अड्डों की स्थिति देखी है, उनके लिए ये अनुमान बिल्कुल सही लगेंगे.

यह बात हर देश और हर दशक में एक जैसी ही साबित होती है. ट्रांसपोर्ट के विशेषज्ञ इसे लगभग एक तय नियम मानते हैं. 2024 में Hot Rails नाम की संस्था ने दुनिया भर के 145 शहरों पर एक विश्व स्तर का अध्ययन किया.

इस अध्ययन में साफ देखा गया कि 3 घंटे से कम की यात्राओं में हाई-स्पीड ट्रेन हमेशा बाजार की आधी से ज्यादा हिस्सेदारी हासिल कर लेती है. 2 घंटे से कम की यात्राओं में हाई-स्पीड ट्रेन 90 फीसद तक बाजार पर कब्जा कर लेती है. इतना ही नहीं, 90 मिनट (डेढ़ घंटे) से कम समय वाली यात्राओं में एयरलाइंस हार मानकर पूरी तरह से बाजार छोड़ देती हैं.

जापान ने इसे साबित कर दिया है. टोक्यो-ओसाका रूट पर जहां शिंकानसेन हाई-स्पीड ट्रेन सिर्फ 2.5 घंटे में पहुंचा देती है. इस रूट पर रेलवे ने लगभग पूरी तरह से बाजार पर कब्जा कर लिया है. दूसरे परिवहन साधन चलते तो हैं लेकिन उनका इस्तेमाल बहुत कम हो गया है. फ्रांस में भी यही हुआ. पेरिस ने उन सभी घरेलू छोटी दूरी की उड़ानों को बंद कर दिया, जहां 2.5 घंटे के अंदर ट्रेन से जाना संभव था. नतीजा यह कि नांते, ल्योन और बोर्डो के लिए उड़ानें पूरी तरह रद्द कर दी गईं.

स्पेन में मैड्रिड से बार्सिलोना जाने वाले मुख्य हाई-स्पीड रेल (AVE) रूट पर जब हाई-स्पीड ट्रेन शुरू हुई, तब ट्रेन की बाजार हिस्सेदारी सिर्फ 12 फीसद से बढ़कर 48 फीसद हो गई. जब AVLO, OUIGO और Iryo नाम की और कंपनियों को भी ट्रेन चलाने की इजाजत मिली, तो ट्रेन का बाजार हिस्सा और बढ़कर 73 फीसद हो गया.

एयरलाइन पर हाई स्पीड ट्रेन के बढ़त हासिल करने की दो प्रमुख वजह रही. इंफ्रास्ट्रक्चर ने आधा काम किया, बाकी काम प्रतिस्पर्धा ने किया. इटली के मिलान-रोम रूट पर हाई-स्पीड ट्रेन आने के बाद ट्रेन का बाजार हिस्सा 36 फीसद से बढ़कर 58 फीसद हो गया.

जब दूसरे साधन (हवाई जहाज आदि) हार गए, तो ट्रेन का हिस्सा 80 फीसद तक पहुंच गया. हालांकि, रिसर्च बार-बार चेतावनी देते हैं कि सिर्फ ट्रेन बना देने से काम नहीं चलेगा. अगर स्टेशन पर उतरने के बाद लोग घर या ऑफिस तक आसानी से नहीं पहुंच पाएंगे. इसका मतलब यह हुआ कि शहरों में बस, मेट्रो या टैक्सी की अच्छी व्यवस्था नहीं होगी, तो हाई-स्पीड ट्रेन भी फायदेमंद नहीं बन पाएगी.

भारत के हाई-स्पीड रेल बनाने वालों को यह याद रखना चाहिए कि अब सिर्फ तेज ट्रेन बनाना काफी नहीं है. पूरा ध्यान शहरों को कैसे जोड़ना है, इस पर रखा जाना चाहिए. वैष्णव ने कहा, “सूरत, वडोदरा, आनंद या वापी में रहने वाले लोग इनमें से किसी भी शहर में जाकर दिन भर काम करके शाम में परिवार के साथ रात का खाना खा सकेंगे.”

इसी तरह मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन का कॉरिडोर एक शहर, एक अर्थव्यवस्था, एक क्षेत्र बनाने वाला होना चाहिए. हाई-स्पीड ट्रेन वाले शहरों में अगर शुरू से ही बस, मेट्रो, टैक्सी और लोकल ट्रेन की व्यवस्था सही होगी, तभी इस प्रोजेक्ट का असली आर्थिक फायदा होगा. जापान और स्पेन में ऐसा ही हुआ, जबकि ब्रिटेन ऐसा करने में पिछड़ गया.

रेल मंत्री वैष्णव ने कहा कि हाई-स्पीड रेल पर खर्च होने वाले 16 लाख करोड़ रुपए में से ज्यादातर पैसा भारतीय कंपनियों और ठेकेदारों को ही मिलेगा. भारत पहले ही जर्मनी, फ्रांस, इटली और मेक्सिको को ट्रेन के मोटर और इलेक्ट्रिकल सिस्टम बेच रहा है. ट्रैक और स्टेशन बनाने का काम नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन और रेल मंत्रालय करेगा. हालांकि, ये स्टेशन शहरों की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने वाले इंजन बनेंगे या नहीं, यह इस पर निर्भर करता है कि नगर निगम, शहरी विकास विभाग और राज्य सरकार सब मिलकर एक ही सोच के साथ काम करें.

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