एनीमे से लेकर कॉस्प्ले तक, जापानी पॉप कल्चर के असर में भारत की नई पीढ़ी!
India Today Indo-Japan Conclave जापानी पॉप कल्चर के प्रतीकों जैसे मंगा, कॉस्प्ले और एनीमे पर हुई चर्चा से पता चला कि अब भारत में इनका एक बड़ा बाजार भी है

22 मई को नई दिल्ली में आयोजित India Today Indo-Japan Conclave में Comic Con India के फाउंडर जतिन वर्मा और कॉस्प्ले (Cosplay) आर्टिस्ट व कंटेंट क्रिएटर बैशाखी दास ने चर्चा की कि कैसे एनीमे (जापान के एनीमेशन), मंगा (जापानी कॉमिक्स और ग्राफिक नॉवेल) और कॉस्प्ले भारत में सीमित रुचि से निकलकर युवाओं के बीच मुख्यधारा का हिस्सा बन गए हैं, जो देश में जापान के बढ़ते सांस्कृतिक प्रभाव को दिखाता है.
दास ने ‘The Manga-Anime Rage’ सत्र में कहा, “एनीमे के किरदार सिर्फ कूल नहीं होते. आप उनके साथ 10 या 15 एपिसोड बिताकर एक जुड़ाव बना लेते हैं.” चर्चा में जापानी सांस्कृतिक कंटेंट की लोकप्रियता पर बात हुई, जिसमें Naruto और Demon Slayer जैसे एनीमे फ्रेंचाइज़, मकोतो शिंकाई की फिल्में और Studio Ghibli के काम शामिल हैं.
इस सेशन में यह भी समझने की कोशिश की गई कि भारतीय दर्शक इनसे क्यों जुड़ रहे हैं. जतिन वर्मा ने बताया, “जब आप इस कंटेंट के फैन बन जाते हैं, तो आप इससे आगे नहीं बढ़ते. आप इसके भीतर ही और खोज करते रहते हैं और जीवन भर इससे जुड़े रहते हैं.”
बैशाखी इस सत्र में Akame ga Kill! की Esdeath के रूप में आई थीं. उन्होंने कॉस्प्ले को प्रदर्शन और आत्म-अभिव्यक्ति दोनों बताया. उन्होंने कहा कि स्कूल के दौरान जब उन्होंने पहली बार Death Note देखा, तभी एनीमे से उनका परिचय हुआ और इसकी कहानी कहने की शैली ने उन्हें आकर्षित किया जो उन्हें पारंपरिक कार्टून से अलग लगी. बैशाखी ने कहा, “जब भी मुझे कोई किरदार पसंद आता है मैं वही किरदार बनना चाहती हूं.”
बैशाखी के अनुसार एनीमे के किरदारों के साथ भावनात्मक जुड़ाव ज्यादा मजबूत होता है क्योंकि दर्शक उनके सफर को लंबे समय तक देखते हैं. उन्होंने कहा कि कई महिला एनीमे किरदार आत्मविश्वासी, स्वतंत्र और भावनात्मक रूप से जटिल होते हैं जिससे युवा दर्शक उनसे जुड़ाव महसूस करते हैं. इसके अलावा एनीमे की कहानियां अक्सर संघर्ष, मेहनत और धैर्य पर आधारित होती हैं जिससे दर्शकों को बड़ा वर्ग प्रभावित होता है.
जतिन ने कहा कि भारत में एनीमे फैंडम यानी सोशल मीडिया पर एनीमे की फैन फॉलोइंग कई वर्षों से मौजूद थी लेकिन कोविड महामारी के दौरान और उसके बाद इसमें तेजी से विस्तार हुआ. इसका मुख्य कारण स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स द्वारा एनीमे लाइब्रेरी और क्षेत्रीय भाषाओं में डबिंग की शुरुआत है. उन्होंने बताया कि भारतीय दर्शक दशकों से अनजाने में जापानी एनीमे देखते रहे हैं, जैसे The Jungle Book और Heidi, Girl of the Alps जैसे टीवी शो के जरिए. जतिन ने कहा, “स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स के जरिए एनीमे का भारत में आना फैंडम के स्तर को पूरी तरह बदल गया.”
2011 में शुरू हुआ Comic Con India इस बदलाव का प्रत्यक्ष गवाह रहा है. जतिन ने बताया कि शुरुआती आयोजनों में लोगों को कॉस्प्ले का मतलब समझाना पड़ता था जबकि अब हजारों लोग कॉस्ट्यूम पहनकर इसमें हिस्सा लेते हैं. उन्होंने कहा कि हाल ही में मुंबई कॉमिक कॉन में लगभग आधे कॉजप्लेयर एनीमे या मंगा किरदारों के रूप में आए थे और दो दिनों में इस आयोजन में 55,000 से ज्यादा लोग पहुंचे.
चर्चा में यह भी सामने आया कि कॉस्प्ले अब एक पेशेवर क्रिएटिव इंडस्ट्री में बदल रहा है. बैशाखी ने कहा कि जहां कुछ लोग इसे शौक के तौर पर करते हैं वहीं कई लोग प्रतियोगिताओं के लिए सालों तक कॉस्ट्यूम डिजाइन और तैयार करते हैं. जतिन ने बताया कि भारतीय कॉजप्लेयर अब जापान में World Cosplay Summit जैसे वैश्विक मंचों पर हिस्सा ले रहे हैं जो दिखाता है कि यह केवल शौक तक सीमित नहीं रहा.
दोनों वक्ताओं ने भारत में एनीमे संस्कृति के व्यावसायिक विस्तार पर भी बात की. बैशाखी ने कहा कि ब्रांड्स अब कॉजप्लेयर और क्रिएटर्स के साथ सहयोग कर रहे हैं और अपने विज्ञापनों में एनीमे से प्रेरित स्टाइल का इस्तेमाल कर रहे हैं हालांकि बड़े शहरों के बाहर अभी भी कॉस्प्ले और लाइसेंसिंग के बारे में जागरूकता सीमित है.
जतिन का कहना था कि एनीमे और मंगा अब डिजिटल पहुंच और ऑनलाइन फैन कम्युनिटीज के जरिए भारत में शहर और वर्ग दोनों की सीमाएं पार कर चुके हैं. उन्होंने बताया कि Comic Con India इस साल 14 शहरों तक विस्तार कर रहा है जो मेट्रो शहरों से बाहर भी बढ़ती मांग को दिखाता है.
सत्र के अंत में दोनों वक्ताओं ने भारत और जापान के बीच गहरे सांस्कृतिक आदान-प्रदान को लेकर आशा जताई. जतिन ने सुझाव दिया कि भारतीय मिथकों और कहानी कहने की परंपरा को मंगा-प्रेरित फॉर्मेट में वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाया जा सकता है. वहीं बैशाखी ने कहा कि भारत में एनीमे संस्कृति अभी विकसित हो रही है और आने वाले वर्षों में इसमें और तेजी से वृद्धि होगी.
सत्र की खास बातें :
जतिन वर्मा, फाउंडर, Comic Con India
- “एनीमे ने भारत में सिर्फ शहरों की नहीं, बल्कि वर्ग की सीमाएं भी पार कर ली हैं.”
- “कॉस्प्ले सिर्फ कपड़े पहनना नहीं है. यह एक कला है.”
- “जब आप इस कंटेंट के फैन बन जाते हैं, तो आप इससे आगे नहीं बढ़ते. आप इसके भीतर ही और खोज करते रहते हैं और जीवन भर इससे जुड़े रहते हैं.”
बैशाखी दास, कॉस्प्ले आर्टिस्ट और कंटेंट क्रिएटर
- “एनीमे के किरदार सिर्फ कूल नहीं होते. आप उनके साथ 10 या 15 एपिसोड बिताकर एक जुड़ाव बना लेते हैं.”
- “कई महिला एनीमे किरदार मजबूत, मुखर और स्वतंत्र होती हैं. यही बात लोगों को उनसे जोड़ती है.”
- “लोग कॉस्प्ले को समझ नहीं पाते इसलिए जज करते हैं, लेकिन जागरूकता बहुत तेजी से बढ़ रही है.”