भारत को 'ऑयल शॉक' से बचने का उपाय महंगा तो नहीं पड़ेगा?

भारत का क्रूड बास्केट 120 डॉलर के पार जाने और 27 मार्च को नई दिल्ली द्वारा पेट्रोल-डीजल पर 10 रुपए प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी घटाने के साथ, सरकार ने 2 अप्रैल की RBI पॉलिसी मीटिंग से पहले थोड़ा वक्त खरीद लिया है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

आर्थिक दुनिया में, कुछ चीजें अचानक होती हैं और कुछ सोचे-समझे फैसले होते हैं. 27 मार्च को पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपए प्रति लीटर की कटौती करने का नरेंद्र मोदी सरकार का फैसला पूरी तरह से दूसरी कैटेगरी में आता है. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, स्ट्रेट होर्मुज जैसे अहम शिपिंग रास्तों पर मंडराते खतरों और अमेरिका व ईरान के बीच ठप पड़ी बातचीत वाले इस बेहद अस्थिर जियो-पॉलिटिकल माहौल के बीच, यह एक बहुत ही नपा-तुला 'मैक्रोइकॉनोमिक' दखल है.

नई दिल्ली ने एक ऐसे वक्त में 'फिस्कल हेज (वह तंत्र जो आर्थिक झटकों अर्थव्यवस्था को बचाता है)' का इस्तेमाल किया है, जब ग्लोबल ऑयल मार्केट्स, जियो-पॉलिटिक्स और घरेलू महंगाई के खतरों ने मिलकर एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है. लेकिन हर हेज की तरह, इसकी भी एक कीमत है, और उससे भी बड़ी बात, इसकी एक मियाद है.

चुनाव के मूड में आ चुकी सत्ताधारी BJP असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के आने वाले विधानसभा चुनावों में इस कदम का फायदा उठा सकती है. इसके उलट, पड़ोसी देश बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान भारी एनर्जी संकट का सामना कर रहे हैं और ईंधन की कीमतें बढ़ाने, इंपोर्ट पर रोक लगाने, करेंसी कंट्रोल, लोड शेडिंग और IMF के कड़े बदलावों का सहारा ले रहे हैं. भारत की अप्रोच एक 'रिलेटिव मैक्रो स्टेबिलिटी' को दिखाती है, जो अचानक झटके देने के बजाय एक सधे हुए पॉलिसी रिस्पॉन्स पर टिकी है.

फिर भी, इसका गणित बहुत साफ और कड़ा है. पेट्रोल और डीजल पर 10 रुपए प्रति लीटर की एक्साइज ड्यूटी घटाने का सीधा मतलब है कि सरकार को सालाना करीब 1.5 लाख करोड़ रुपए (यानी जीडीपी का लगभग 0.5 प्रतिशत) के रेवेन्यू का नुकसान होगा. यह कदम 2 अप्रैल को होने वाली रिजर्व बैंक की 'मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी' की बैठक को भी दिशा देगा, क्योंकि यह कुछ समय के लिए महंगाई के आउटलुक को नरम करता है और तुरंत ब्याज दरें बढ़ाने की जल्दबाजी को कम कर देता है.

राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 5.1 प्रतिशत तक लाने के लक्ष्य वाले फ्रेमवर्क में, यह कोई छोटी-मोटी भूल-चूक नहीं है; यह एक बड़ा भटकाव है जो अगर जारी रहा, तो घाटे को 5.5 प्रतिशत के करीब धकेल सकता है. फिर भी, सरकार यह नुकसान उठाने को तैयार दिखती है, क्योंकि इसका दूसरा विकल्प - महंगाई का बेतहाशा बढ़ना और डिमांड का धड़ाम होना, और भी ज्यादा महंगा साबित हो सकता था. महामारी के बाद भारत की रिकवरी काफी हद तक 'पब्लिक कैपेक्स' (जो बढ़कर 11 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा हो गया है) और मजबूत कंजम्पशन पर टिकी है. महंगे ईंधन से आने वाली महंगाई इन दोनों को एक साथ तबाह करने का जोखिम रखती है.

अगर इसे ऐसे ही छोड़ दिया जाता, तो RBI को बहुत आक्रामक तरीके से ब्याज दरें बढ़ानी पड़तीं. भारत पहले ही देख चुका है कि विकास दर, ब्याज दरों के चक्र को लेकर कितनी संवेदनशील है. पॉलिसी रेट्स में हर 100 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी MSMEs, हाउसिंग और कंजम्पशन के लिए कर्ज लेना मुश्किल कर देती है. एक्साइज ड्यूटी घटाकर, केंद्र सरकार ने प्रभावी रूप से अर्थव्यवस्था के 'शॉक एब्जॉर्बर' की तरह कदम बढ़ाया है. उसने बाजार के उतार-चढ़ाव को कम करने और महंगाई की उम्मीदों को काबू में रखने के लिए अपने खुद के 'फिस्कल स्पेस' का इस्तेमाल किया है. मैक्रोइकॉनोमिक्स की भाषा में कहें तो, यह 'काउंटर-साइक्लिकल' पॉलिसी का एकदम सही इस्तेमाल है. लेकिन यह बहुत महंगा भी है.

लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि इसका फिस्कल कॉस्ट कितना बड़ा है, बल्कि यह है कि भारत इसे कब तक बर्दाश्त कर सकता है. अगर अगले कुछ महीनों में तेल की कीमतें गिरती हैं, तो यह रणनीति एकदम दूरदर्शी लगेगी. सरकार अपने एक्साइज बफर को फिर से बना सकती है (जैसा उसने 2020 और 2022 के बीच किया था जब ड्यूटी तेजी से बढ़ाई गई थी), और फिस्कल गणित फिर से नॉर्मल हो जाएगा. लेकिन अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो यह कैलकुलेशन बिगड़ने लगेगा.

ऊंची कीमतें हर एक तिमाही में राजस्व घाटा और बढ़ा देती हैं. सरकार की उधारी की जरूरतें बढ़ती हैं, जिससे गवर्नमेंट बॉन्ड यील्ड ऊपर जाती है, जो 10-साल के बेंचमार्क के लिए पहले से ही 7.1-7.3 प्रतिशत की रेंज में मंडरा रही है. बदले में, यह ऊंची यील्ड प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को ऐसे वक्त में बाहर धकेलने का खतरा पैदा करती है, जब भारत अपने कैपेक्स साइकिल को फिर से जिंदा करने की कोशिश कर रहा है. एक समय के बाद, सरकार को कुछ बहुत ही असुविधाजनक समझौते करने पर मजबूर होना पड़ता है: या तो सरकारी खर्च कम करें, घाटे को और बढ़ने दें, या फिर ईंधन की कीमतों को फिर से बढ़ने दें.

2 अप्रैल को जब RBI की MPC की बैठक होगी, तो ठीक यही दुविधा पॉलिसी मेकर्स के दिमाग पर हावी रहेगी. एक्साइज ड्यूटी में कटौती तुरंत राहत देती है, जो महंगाई को 20-30 बेसिस पॉइंट तक कम कर सकती है और केंद्रीय बैंक को फिलहाल किसी आक्रामक रेट हाइक से बचने का मौका देती है. लेकिन साथ ही, यह बोझ को राजकोषीय पक्ष की तरफ शिफ्ट कर देती है, जिसका मतलब है ज्यादा उधारी, मजबूत बॉन्ड यील्ड और मीडियम-टर्म में महंगाई के बने रहने का खतरा. RBI के लिए, यह महंगाई कम होने का कोई साफ सिग्नल नहीं है, बल्कि थोड़े वक्त का एक सहारा है जो गहरे दबावों को छिपा रहा है. यह दरों पर 'पॉज' या ब्रेक लगने का इशारा तो करता है, लेकिन इसके पीछे एक साफ 'हॉकिश' यानी सख्त अंडरटोन होगी, क्योंकि असली खेल कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के टिके रहने का ही है.

गहराई से देखें तो, एक्साइज कटौती का मकसद ईंधन की कीमतें कम करना नहीं है, बल्कि महंगे क्रूड के इस दौर में ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के मार्जिन को बचाते हुए उपभोक्ताओं को राहत देना है. 27 मार्च के आस-पास रिटेल पंप की कीमतें काफी हद तक जस की तस रही हैं, जो 'लिमिटेड पास-थ्रू' (यानी फायदे को ग्राहकों तक कम पहुंचाने) का इशारा करता है. सरकारी तेल कंपनियां IOC, BPCL और HPCL, टैक्स कटौती का पूरा फायदा ग्राहकों को देने के बजाय लागत के दबाव के एक हिस्से को खुद सोख रही हैं.

जो चीज इस पल को और ज्यादा उलझा देती है, वह यह है कि यह दबाव सिर्फ कुछ समय का नहीं है, बल्कि ढांचागत है. पिछले तीन सालों में आक्रामक विविधता के बावजूद, भारत अभी भी ग्लोबल ऑयल प्राइस साइकिल के लिए बहुत ज्यादा 'एक्सपोज्ड' है. हालांकि हमने अपने आयात स्रोतों में बढ़ोतरी की है. रूसी क्रूड, जो 2022 से पहले इंपोर्ट का 2 प्रतिशत से भी कम था, अब कुछ महीनों में 30-35 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जबकि अमेरिका और अफ्रीका से भी सप्लाई बढ़ी है. फिर भी, 45-50 प्रतिशत इंपोर्ट अभी भी मिडिल ईस्ट से आता है, और प्राइसिंग का एक बड़ा हिस्सा सीधे या परोक्ष रूप से 'दुबई/ओमान बेंचमार्क' से जुड़ा हुआ है, जो वेस्ट एशिया के जियो-पॉलिटिकल तनावों को लेकर बहुत ज्यादा संवेदनशील है.

इसका मतलब यह है कि भले ही भारत ने तेल खरीदने की जगहों में विविधता ला दी है, लेकिन उसने उस तेल की 'कीमत' कैसे तय होती है, उसमें पूरी तरह डायवर्सिफिकेशन नहीं किया है. जब होर्मुज (जो ग्लोबल ऑयल ट्रेड का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा संभालता है) जैसे अहम रास्तों के आसपास तनाव बढ़ता है, तो सभी बेंचमार्क्स पर कीमतें उछलती हैं, मालभाड़ा और इंश्योरेंस का खर्च बढ़ जाता है, और भारत की जमीन पर उतरने वाले तेल की कीमत लगभग तुरंत बढ़ जाती है.

इसके 'फीडबैक लूप' बहुत बेरहम हैं. कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का लंबा दौर भारत के 'करंट अकाउंट डेफिसिट' (CAD) को बढ़ा देता है. कच्चे तेल में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से यह घाटा आम तौर पर जीडीपी के 0.3-0.4 प्रतिशत तक बढ़ जाता है. यह रुपए पर भारी दबाव डालता है, और कमजोर रुपया इंपोर्ट को और भी महंगा बना देता है, जिससे शुरुआती झटका कई गुना बढ़ जाता है. एक्साइज कटौती से मिलने वाली राजकोषीय राहत इस बाहरी कमजोरी को तोड़ने में कोई खास मदद नहीं करती. उसी समय, गंवाए हुए रेवेन्यू की भरपाई के लिए ज्यादा उधारी लेने से सरकार का ब्याज का बोझ बढ़ जाता है, जो पहले ही उसकी रेवेन्यू रिसिप्ट्स का 20 प्रतिशत से ज्यादा खा जाता है. राजकोषीय और मौद्रिक तनाव का जोखिम भी मंडरा रहा है. हालांकि एक्साइज कटौती शॉर्ट टर्म में महंगाई को काबू में रखने में मदद करती है, लेकिन लगातार बना रहने वाला बड़ा घाटा मीडियम टर्म में खुद महंगाई की वजह बन सकता है.

इस बीच, भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में ईंधन की कीमतें एक बहुत ही खास जगह रखती हैं. ये उन गिने-चुने आर्थिक पैमानों में से हैं जिन्हें हर आयवर्ग के लोग रोज ट्रैक करते हैं. पंप पर 5-10 रुपए की बढ़ोतरी तुरंत दिखती है और अक्सर इसके तगड़े राजनीतिक नतीजे होते हैं. इसलिए, एक्साइज में यह कटौती सिर्फ एक इकोनॉमिक बफर नहीं है, बल्कि एक 'पॉलिटिकल स्टेबिलाइजर' भी है, जो परिवारों को अचानक बढ़ने वाले खर्चों के झटके से बचाता है और उनके 'कंजम्पशन सेंटिमेंट' को बनाए रखता है.

और यह हमें उस कड़वे सच तक ले आता है. यह दर्द कोई एकाध बार का नहीं है, बल्कि स्ट्रक्चरल है. जब तक भारत अपने कच्चे तेल का एक बहुत बड़ा हिस्सा इंपोर्ट करता रहेगा, जब तक उस तेल का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी से जुड़े अस्थिर प्राइसिंग सिस्टम से तय होता रहेगा, और जब तक रुपया बाहरी झटकों को लेकर संवेदनशील रहेगा, तब तक ऐसे दौर बार-बार आएंगे. डायवर्सिफिकेशन ने भारत को रणनीतिक लचीलापन दिया है, कोई रणनीतिक बचाव नहीं. एक्साइज कटौती सिर्फ एक बफर है, कोई पक्का समाधान नहीं.

अंत में, इस रणनीति की कामयाबी का फैसला इस बात से नहीं होगा कि टैक्स में कितनी बड़ी कटौती की गई है, बल्कि इस बात से होगा कि इसे वापस लेने की टाइमिंग क्या रहती है. भारत बचाव की इस कीमत को उठा तो सकता है, लेकिन वह इसे हमेशा के लिए नहीं चुका सकता.

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