भारत के नए 'AI लेबलिंग' नियम सोशल मीडिया का खतरा कम कर पाएंगे?

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में नए 'AI लेबलिंग' नियमों से यूज़र्स को सही जानकारी मिलेगी, लेकिन असली कामयाबी इसे ज़मीन पर सही तरीके से लागू करने पर टिकी है

Rules for AI-Generated Content
सांकेतिक फोटो (AI)

सरकार ने IT रूल्स, 2021 के तहत नए लेबलिंग नियमों का नोटिफिकेशन जारी कर दिया है. इसके तहत अब सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स को 'Synthetically Generated Information' (SGI) यानी AI से बने कंटेंट पर एक लेबल लगाना होगा. साथ ही, यूज़र्स को भी खुद ही बताना होगा कि उनका अपलोड किया गया वीडियो या फोटो इस कैटेगरी में आता है या नहीं.

इस बड़े कदम का मकसद डीपफेक, गलत जानकारी और फर्जी कंटेंट फैलने की चिंता को दूर करना है. इससे यूज़र्स AI से बनी चीज़ों को आसानी से पहचान सकेंगे और ऐसे कंटेंट को शेयर करने या उस पर भरोसा करने से पहले सही फैसला ले पाएंगे.

इन नए नियमों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए ऐसे कंटेंट को हटाने का समय भी काफी कम कर दिया है. पहले इसके लिए 24-36 घंटे का वक्त मिलता था, जिसे घटाकर अब सिर्फ 2 से 3 घंटे कर दिया गया है. शायद इसकी वजह यही है कि किसी भी फेक कंटेंट के वायरल होने और नुकसान पहुंचाने के लिए एक दिन का समय बहुत ज्यादा होता है.

एक्सपर्ट्स ने इस पहल की काफी तारीफ की है. उनका मानना है कि इससे ट्रांसपेरेंसी आएगी और कंज्यूमर्स को ताकत मिलेगी. JSA एडवोकेट्स एंड सॉलिसिटर्स के पार्टनर प्रोबीर रॉय चौधरी का कहना है, "इससे से एक ज्यादा सुरक्षित ऑनलाइन इकोसिस्टम बनेगा. यूज़र्स बिना किसी जालसाज़ी का शिकार हुए, नए AI टूल्स का सेफ तरीके से इस्तेमाल कर पाएंगे."

हालांकि, असली कामयाबी इसे सही तरीके से लागू करने में ही है. रॉय चौधरी बताते हैं कि सबसे बड़ी चुनौती तकनीकी है. पूरी दुनिया में फैले इस डिजिटल इकोसिस्टम के लिए ऐसे 'वॉटरमार्किंग' और 'मेटाडेटा' स्टैंडर्ड्स बनाना, जिन्हें कोई छेड़छाड़ करके हटा न सके. इसके अलावा, प्लेटफॉर्म के लिए यह पहचानना भी मुश्किल होगा कि कौन सा AI कंटेंट सिर्फ व्यंग्य या अच्छे इरादे से की गई एडिटिंग है. इसे ऑटोमैटिक सिस्टम से पकड़ना बहुत चुनौतीपूर्ण होगा और इससे क्रिएटिव फ्रीडम को भी नुकसान पहुंच सकता है.

लॉ फर्म खेतान एंड कंपनी के पार्टनर सुप्रतिम चक्रवर्ती का कहना है कि अभी डिटेक्शन टूल्स सौ फीसदी सटीक नतीजे नहीं देते, और वॉटरमार्क को तो मामूली एडिटिंग से ही हटाया जा सकता है. रिसर्च भी बताती है कि सिर्फ लेबल लगा देने से यूज़र्स के कंटेंट देखने के तरीके में कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं आता. इसके अलावा, नियमों को लागू करने के लिए मिला 10 दिन का छोटा सा वक्त भी प्लेटफॉर्म के लिए एक बड़ा सिरदर्द है. उन्हें इतनी जल्दी ऑडियो, वीडियो और टेक्स्ट के लिए डिटेक्शन टूल्स तैयार करने होंगे, जिनकी एक्यूरेसी अलग-अलग भाषाओं में बहुत अलग हो सकती है.

चक्रवर्ती एक और खतरे की तरफ इशारा करते हैं- 'वॉर्निंग फटीग'. यानी, अगर यूज़र्स को बार-बार हर जगह लेबल दिखेंगे, तो वे इसे नज़रअंदाज़ करने लगेंगे. रिसर्च बताती है कि बार-बार एक ही चीज़ दिखने से उसका असर कम हो जाता है.

लॉ फर्म ट्राईलीगल के पार्टनर (टेक्नोलॉजी, मीडिया और टेलीकॉम) निखिल नरेंद्रन को लगता है कि कंटेंट हटाने के लिए कंपनियों को दिया गया समय बिना सोचे-समझे कम किया गया है. इससे ज्यादातर प्लेटफॉर्म की मुश्किलें बढ़ेंगी और उनके कामकाज पर भारी दबाव पड़ेगा. अब ये नियम सिर्फ सोशल मीडिया कंपनियों पर ही नहीं, बल्कि हर तरह के इंटरनेट इंटरमीडियरी पर लागू होते हैं.

नरेंद्रन कहते हैं, "अगर कोई प्लेटफॉर्म इन नियमों को नहीं मान पाता है, तो उस पर भारी कानूनी ज़िम्मेदारी आ जाएगी, जो कि एक बहुत बड़ी चिंता की बात है." यह तय है कि अब ये प्लेटफॉर्म कंटेंट को पकड़ने और फ्लैग करने के लिए ऑटोमेशन पर बहुत ज्यादा निर्भर हो जाएंगे, ताकि वे किसी भी तरह इन नियमों का पालन कर सकें.

वे आगे कहते हैं, "समय सीमा को बिना किसी सलाह-मशविरे के कम कर दिया गया है, और इसका देश के 'फ्री-स्पीच' इकोसिस्टम पर बहुत गहरा असर पड़ेगा. अब जब किसी के पास अपील करने का समय ही नहीं बचेगा, तो यह एक तरह से 'पहले आदेश मानो, बाद में अपील करो' वाला सिस्टम बन जाएगा."

सिंथेटिक यानी नकली कंटेंट में ट्रांसपेरेंसी लाने की इस लड़ाई में भारत अब दुनिया के उन गिने-चुने देशों में शामिल हो गया है जो इस पर कड़े कदम उठा रहे हैं. इस मामले में चीन 2023 में अपने 'डीप सिंथेसिस प्रोविजन्स' के साथ सबसे आगे रहा था. उसने ऐसे खास उपाय लागू किए हैं जिनके तहत प्लेटफॉर्म को AI कंटेंट पर साफ़ दिखने वाले मार्कर और मेटाडेटा लगाना ज़रूरी है.

इसी तरह, यूरोपियन यूनियन (EU) का 'AI एक्ट' भी सिंथेटिक मीडिया के लिए मशीन-रीडेबल लेबलिंग को ज़रूरी बनाता है, जो अगस्त 2026 में लागू होने वाला है. इसके लिए यूरोपियन कमीशन ने दिसंबर 2025 में 'AI कंटेंट की ट्रांसपेरेंसी' को लेकर अपना पहला ड्राफ्ट भी पब्लिश किया था.

अगर अमेरिका की बात करें, तो कैलिफोर्निया इसमें ज्यादा एक्टिव रहा है. उसने AI ट्रांसपेरेंसी कानून बनाए हैं, जिन्हें 2026 के दौरान धीरे-धीरे लागू किया जाएगा. दक्षिण कोरिया के नए AI कानून में भी (जो जनवरी में पास हुआ है) AI कंटेंट पर लेबल लगाना अनिवार्य कर दिया गया है.

इसलिए, फरवरी 2026 में लाए गए भारत के ये नए नियम उसे इस मुद्दे पर सबसे पहले कदम उठाने वाले देशों की कतार में खड़ा करते हैं. लेकिन असली परीक्षा इस बात की होगी कि इन नियमों को ज़मीन पर कितनी कामयाबी के साथ लागू किया जाता है.

Read more!