अग्निवीर और सीमा विवाद के बावजूद भारत-नेपाल संबंधों में दिख रही नई गर्माहट!
भारत यात्रा के दौरान नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने ‘पुराने बोझ’ को छोड़ते हुए दोनों देशों के बीच नई साझेदारी पर जोर दिया है

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल की नई दिल्ली यात्रा ने भारत-नेपाल संबंधों में एक नई और अहम शुरुआत का संकेत दिया है. यह ऐसे समय में हुआ है जब दोनों देश हाल के वर्षों में समय-समय पर रिश्तों में तनाव पैदा करने वाले मुद्दों से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं.
विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ बैठकों में खनाल ने जोर देकर कहा कि काठमांडू के पास ‘पुराना कोई बोझ नहीं’ है. वे भारत के साथ आर्थिक विकास, कनेक्टिविटी, ऊर्जा सहयोग और लोगों के बीच संबंधों पर आधारित भविष्य-केंद्रित साझेदारी बनाना चाहता है.
जयशंकर ने भारत-नेपाल संबंधों को ‘बहुत विशेष रिश्ता’ बताया और गहरे सहयोग की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाने की बात कही. यात्रा के दौरान सीमा पार कनेक्टिविटी, बिजली व्यापार, डिजिटल अर्थव्यवस्था की पहल, निवेश, रेमिटेंस, स्वास्थ्य सेवा और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं जैसे व्यावहारिक क्षेत्रों पर जोर रहा. इससे यह संकेत मिला कि दोनों देश मानते हैं कि पारस्परिक आर्थिक निर्भरता द्विपक्षीय संबंधों के अगले चरण की सबसे मजबूत नींव है.
यह यात्रा पश्चिमी हिमालय के कालापानी-लिपुलेख-लिंपियाधुरा क्षेत्र को लेकर लंबे समय से चले आ रहे भारत-नेपाल सीमा विवाद की पृष्ठभूमि में हुई है. यह विवाद 1816 की सुगौली संधि की अलग-अलग व्याख्याओं से जुड़ा है और इसके केंद्र में है काली नदी का उद्गम. यही नदी दोनों देशों के बीच सीमा तय करती है.
नेपाल अपने दावे को ऐतिहासिक नक्शों के आधार पर रखता है और लिंपियाधुरा को नदी का स्रोत मानता है. वहीं भारत ऐतिहासिक रिकॉर्ड और लंबे समय से प्रशासनिक तथा सैन्य नियंत्रण का हवाला देता है. भारत का खासकर 1962 के बाद से इस क्षेत्र पर प्रभावी नियंत्रण है.
यह मुद्दा 2020 में फिर प्रमुखता से उभरा था जब नेपाल ने कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा को शामिल करते हुए नया राजनीतिक नक्शा जारी किया और बाद में उसे संवैधानिक मान्यता दे दी. भारत लगातार कहता रहा है कि यह कदम एकतरफा था और इससे जमीनी वास्तविकताएं नहीं बदलतीं.
बहस में एक नया पहलू नेपाल के बदलते राजनीतिक परिदृश्य ने जोड़ा है. मार्च में युवाओं की राजनीतिक लामबंदी और चुनावों के बाद बालेन के नाम से लोकप्रिय बालेंद्र शाह प्रधानमंत्री बने. इससे काठमांडू में युवा और सुधारवादी नेतृत्व सत्ता में आया. नई सरकार ने देश के भीतर राष्ट्रवादी भावनाओं और भारत के साथ व्यावहारिक जुड़ाव के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है.
अप्रैल और मई में तब नया तनाव पैदा हुआ जब भारत ने उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा का नया सीजन शुरू किया. नेपाल ने इसका कड़ा विरोध किया. उसने अपने क्षेत्रीय दावे दोहराए और बिना उसकी सहमति के भारत के इस कदम पर आपत्ति जताई. काठमांडू ने इस संबंध में भारत और चीन दोनों के सामने राजनयिक माध्यमों से अपनी चिंताएं रखीं. चीन तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में मानसरोवर झील और कैलाश पर्वत की यात्रा को सुगम बनाता है.
सीमा विवाद तब और तेज हो गया जब शाह ने नेपाल की संसद में कहा कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि ‘सिर्फ भारत ने नेपाली क्षेत्र पर अतिक्रमण नहीं किया है बल्कि नेपाल ने भी कई जगह भारतीय क्षेत्र पर अतिक्रमण किया है.’ उन्होंने इस मुद्दे पर तथ्यों पर आधारित अध्ययन की मांग की और सीमा संबंधी प्रश्न को बेहतर समझने के लिए ब्रिटेन से औपनिवेशिक दौर के नक्शे तथा चीन से ऐतिहासिक रिकॉर्ड मंगाने का सुझाव दिया.
इन टिप्पणियों को नेपाल की पारंपरिक स्थिति से अलग माना गया क्योंकि अब तक उसका ध्यान मुख्य रूप से कथित भारतीय अतिक्रमण पर रहा है. विपक्षी दलों ने तुरंत इसकी आलोचना की और पूछा कि इस बयान का नेपाल के क्षेत्रीय दावों पर क्या असर पड़ेगा. बाद में नेपाल के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री औपचारिक क्षेत्रीय दावों की नहीं बल्कि तकनीकी और स्थानीय स्तर की समस्याओं की बात कर रहे थे. इनमें नो-मैन्स लैंड के पार खेती, स्थानीय कब्जे और नदियों के मार्ग में बदलाव जैसे मुद्दे शामिल हैं.
भारत ने जवाब में दोहराया कि सीमा विवादों का समाधान स्थापित द्विपक्षीय तंत्रों के जरिए होना चाहिए और किसी तीसरे पक्ष की भूमिका के किसी भी सुझाव को सख्ती से खारिज किया. विदेश मंत्रालय ने कहा कि नक्शे में एकतरफा बदलाव विवादित क्षेत्रों की स्थिति नहीं बदल सकते और उसने सीधे संवाद के महत्व पर जोर दिया.
सीमा विवाद को लेकर मतभेदों के बावजूद दोनों पक्ष बातचीत जारी रखने की प्रतिबद्धता दिखाते रहे हैं. खनाल की यात्रा के दौरान सीमा संबंधी चर्चा व्यापक सहयोग के मुकाबले पीछे ही रही. आधिकारिक बयानों में आर्थिक और विकास संबंधी पहलों में प्रगति को रेखांकित किया गया जबकि लंबित सीमा संबंधी मुद्दों के समाधान में संयुक्त तकनीकी तंत्रों की भूमिका को भी स्वीकार किया गया.
खनाल ने यह भी कहा कि नेपाल इस विवाद का अंतरराष्ट्रीयकरण नहीं करना चाहता और मानता है कि सभी मतभेद द्विपक्षीय माध्यमों से सुलझाए जा सकते हैं. काठमांडू ने निष्क्रिय पड़े द्विपक्षीय तंत्रों को फिर सक्रिय करने और उच्चस्तरीय राजनीतिक संपर्क बढ़ाने की मांग की है. इससे संकेत मिलता है कि वह विवादास्पद राजनीतिक मुद्दों के बजाय विकास-केंद्रित सहयोग को प्राथमिकता देना चाहता है.
हालांकि एक मुद्दा अब भी अनसुलझा है. वह है भारत की अग्निवीर सैन्य भर्ती योजना में नेपाल की भागीदारी. अगस्त 2022 से भारतीय सेना में नेपाली नागरिकों की भर्ती रुकी हुई है. काठमांडू का कहना है कि अग्निवीर मॉडल 1947 के उस त्रिपक्षीय समझौते के दायरे में नहीं आता जिस पर भारत, नेपाल और ब्रिटेन ने हस्ताक्षर किए थे.
नेपाल दुनिया का एकमात्र देश है जिसके नागरिक भारतीय सेना में सेवा करते हैं. वर्तमान में करीब 40,000 गोरखा सैनिक सात गोरखा रेजिमेंटों में सेवा दे रहे हैं. इनमें नेपाली और भारतीय गोरखा साथ-साथ काम करते हैं. इन रेजिमेंटों का युद्ध में शानदार रिकॉर्ड रहा है और इनमें परम वीर चक्र विजेताओं समेत अनेक वीरता पुरस्कार प्राप्त सैनिक रहे हैं. इन रेजिमेंटों ने भारत के कुछ सबसे सम्मानित मिलेटरी लीडरों को भी दिया है. इनमें फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ, जनरल दलबीर सिंह सुहाग और जनरल बिपिन रावत शामिल हैं.
यह परंपरा 1814-16 के आंग्ल-नेपाल युद्ध से शुरू हुई थी. तब ईस्ट इंडिया कंपनी के कमांडर सर डेविड ऑक्टरलोनी ने गोरखा सैनिकों की युद्ध क्षमता को पहचाना और उन्हें औपनिवेशिक सेना में शामिल किया. भारत की स्वतंत्रता के बाद 1947 के त्रिपक्षीय समझौते के तहत मौजूदा गोरखा रेजिमेंटों को भारतीय और ब्रिटिश सेनाओं के बीच बांट दिया गया.
नेपाल में भारत के पूर्व राजदूत रंजीत रे कहते हैं कि सीमा से जुड़े बड़े विवाद केवल नरसाही, सुस्ता और कालापानी के सीमित क्षेत्र तक हैं. उनके मुताबिक, "हम यह नहीं मानते कि लिपुलेख और लिंपियाधुरा विवादित क्षेत्र हैं. इन्हें एकतरफा तरीके से नेपाली नक्शों में शामिल किया गया और बाद में संवैधानिक संशोधन के जरिए इसकी पुष्टि की गई. यह मुद्दा 200 साल से अधिक समय बाद फिर उठाया गया है जबकि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1817 में इन दावों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया था. यह सुगौली संधि पर 1816 में हस्ताक्षर होने के एक साल बाद की बात है."
रे कहते हैं कि मित्रवत पड़ोसियों के बीच विवादों का समाधान बातचीत और स्पष्ट सबूतों के आधार पर होना चाहिए. उनके मुताबिक, "जैसा कि नेपाल के नए नेतृत्व ने दोहराया है कि वे अतीत के ऐतिहासिक बोझ और पूर्वाग्रहों को नहीं ढोते. ऐसे में विदेश सचिव स्तर की बातचीत शुरू करने का यह सही समय है."
हालांकि अग्निवीर के मुद्दे पर रे ने लचीलापन दिखाने की जरूरत पर जोर दिया ताकि नेपाल के साथ 200 साल पुरानी परंपरा को बनाए रखा जा सके. उन्होंने कहा, "हमें नेपाल से भर्ती होने वालों को भी रिटायरमेंट के बाद के वे लाभा और मौके देने चाहिए जो हम अपने नागरिकों को देते हैं. इस मुद्दे पर नेपाल के साथ द्विपक्षीय चर्चा करना महत्वपूर्ण है."
विश्लेषकों का मानना है कि भले ही स्पष्ट राजनीतिक बयान कभी-कभी बातचीत को जटिल बना सकते हैं लेकिन उनसे भारत और नेपाल के बीच आर्थिक, सांस्कृतिक और लोगों के बीच गहरे संबंधों पर कोई बुनियादी असर पड़ने की संभावना नहीं है. दोनों सरकारें संवाद, व्यावहारिक सहयोग और विकास-केंद्रित जुड़ाव को प्राथमिकता देती रही हैं जबकि मुख्य सीमा विवाद अब भी पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान का इंतजार कर रहा है.