भारत-नेपाल सीमा : कागजों के बोझ तले दब रहा 'रोटी-बेटी' का संबंध!

नेपाल सरकार की नई कस्टम और पहचान जांच व्यवस्था से भारत-नेपाल सीमा पर कारोबार, पर्यटन और 'रोटी-बेटी' के रिश्तों पर पड़ रहा बुरा असर

आम लोगों और व्यापारियों में नेपाल सरकार के फैसले से बेचैनी बढ़ गई है (Photo: AI Generated)
आम लोगों और व्यापारियों में नेपाल सरकार के फैसले से बेचैनी बढ़ गई है (Photo: AI Generated)

भारत और नेपाल के बीच की खुली सीमा सिर्फ दो देशों को जोड़ने वाला भूगोल नहीं रही है. यह दशकों से रिश्तों, रोज़गार, संस्कृति, आस्था और छोटे कारोबार की जीवनरेखा रही है. उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड से सटी नेपाल सीमा पर रहने वाले लाखों लोगों के लिए यह सीमा कभी औपचारिक नहीं रही.

लोग बिना किसी बड़ी रोक-टोक के रिश्तेदारों से मिलने जाते रहे, बाजारों में खरीदारी करते रहे, इलाज और शिक्षा के लिए आवाजाही करते रहे. लेकिन हाल के महीनों में नेपाल सरकार की तरफ से लागू किए गए नए कस्टम नियमों, पहचान पत्र जांच और वाहनों की सख्ती ने इस सहज आवागमन की तस्वीर बदलनी शुरू कर दी है.

अब सीमा पर पहले जैसी सहजता नहीं दिखाई देती. भारतीय बाजारों में नेपाली ग्राहकों की भीड़ कम हो गई है. सीमा चौकियों पर लंबी कतारें लग रही हैं. छोटे व्यापारियों का कारोबार घट रहा है और पर्यटन गतिविधियों पर भी असर साफ दिखाई दे रहा है. जिन सीमाई इलाकों की अर्थव्यवस्था दशकों से दोनों देशों के बीच होने वाले छोटे व्यापार और रोजमर्रा की आवाजाही पर टिकी थी, वहां अब बेचैनी बढ़ रही है.

सौ रुपए की सीमा ने बदली बाजारों की तस्वीर

नेपाल सरकार ने भारतीय सीमा से सामान ले जाने पर नई कस्टम व्यवस्था लागू की है. इसके तहत सौ नेपाली रुपए से अधिक मूल्य के सामान पर शुल्क और सख्त जांच लागू की गई है. यह नियम भले प्रशासनिक व्यवस्था के तौर पर लागू किया गया हो, लेकिन इसका असर सीमावर्ती बाजारों की सांसों पर महसूस किया जा रहा है. लखीमपुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर और बनबसा जैसे सीमाई कस्बों की अर्थव्यवस्था लंबे समय से नेपाली ग्राहकों पर निर्भर रही है. यहां की मंडियों में रोजमर्रा के खाद्यान्न, कपड़े, किराना, बर्तन, हार्डवेयर और घरेलू उपयोग की वस्तुएं बड़ी मात्रा में नेपाल के लोग खरीदते थे.

अब वहां पहले जैसी चहल-पहल नहीं दिखाई देती. बहराइच के रूपईडीहा, नवाबगंज और मिहीपुरवा बाजारों में दुकानदार बताते हैं कि कारोबार लगभग 40 प्रतिशत तक घट गया है. नेपाली ग्राहक अब खरीदारी करने से बच रहे हैं क्योंकि सीमा पर सामान की जांच और शुल्क का डर बना रहता है. बनगवां बाजार के बर्तन और हार्डवेयर व्यापारी दीपू राना कहते हैं कि पहले नेपाली ग्राहक एक बार में कई सामान खरीदकर ले जाते थे लेकिन अब वे सीमित खरीदारी कर रहे हैं. कई लोग केवल देखने आते हैं और बिना सामान खरीदे लौट जाते हैं. किराना व्यापारी राजेश गुप्ता बताते हैं कि भारतीय बाजारों में मिलने वाला सस्ता सामान अब नेपाल में अधिक कीमत पर पहुंच रहा है. इससे नेपाल के उपभोक्ताओं पर भी अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ा है.

रिश्तों पर भी असर महसूस होने लगा

भारत-नेपाल सीमा की सबसे बड़ी पहचान हमेशा 'रोटी-बेटी' के रिश्ते रहे हैं. सीमाई गांवों में हजारों परिवार ऐसे हैं जिनके रिश्तेदार दोनों देशों में बसे हुए हैं. शादी-ब्याह, पर्व-त्योहार और सामाजिक कार्यक्रमों में लोगों का लगातार आना-जाना लगा रहता है. लेकिन अब यही सामाजिक संबंध प्रशासनिक नियमों के बोझ तले दबते दिखाई दे रहे हैं. सीमा पर जांच बढ़ने के कारण अब शादी में उपहार ले जाना भी परेशानी बनता जा रहा है.

घरेलू उपयोग की वस्तुएं, कपड़े या रिश्तेदारों के लिए सामान ले जाने पर भी पूछताछ और शुल्क का सामना करना पड़ रहा है. इससे सीमाई परिवारों में नाराजगी बढ़ रही है. पहले जो लोग बिना किसी औपचारिकता के कुछ घंटों के लिए रिश्तेदारों से मिलने चले जाते थे, अब उन्हें पहचान पत्र और सामान जांच की प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है. इससे दोनों देशों के बीच दशकों से बनी सामाजिक सहजता प्रभावित हुई है.

पहचान पत्र अनिवार्य होने से बढ़ी अफरा-तफरी

नेपाल प्रशासन ने हाल में भारतीय नागरिकों के लिए पहचान पत्र जांच को भी सख्ती से लागू किया है. बिहार के अररिया जिले के जोगबनी बॉर्डर पर इसका असर साफ दिखाई दिया, जहां अचानक लागू हुई व्यवस्था के कारण यात्रियों और वाहनों की लंबी कतारें लग गईं. नेपाल पुलिस अब सीमा पार करने वाले प्रत्येक भारतीय नागरिक का पहचान पत्र जांच रही है. जिन लोगों के पास वैध दस्तावेज नहीं थे, उन्हें वापस लौटना पड़ा. इससे दैनिक यात्रियों, छोटे व्यापारियों और आम लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा.

कोरोना काल के बाद पहली बार इतनी सख्ती देखने को मिली है. नेपाल प्रशासन का कहना है कि यह व्यवस्था सुरक्षा और निगरानी को व्यवस्थित करने के लिए लागू की गई है लेकिन सीमाई क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को यह बदलाव अचानक और असुविधाजनक लग रहा है. मोरंग के प्रमुख जिलाधिकारी युवराज कटेल ने साफ कहा है कि सीमा पार करने वालों को अब परिचय पत्र दिखाना अनिवार्य होगा.

इसके बाद सीमा पर सुरक्षा एजेंसियों की सक्रियता और बढ़ गई है. सीमाई इलाकों में एसएसबी और नेपाल एपीएफ की निगरानी पहले से अधिक सख्त दिखाई देती है. सुरक्षा की दृष्टि से यह व्यवस्था जरूरी मानी जा रही है, लेकिन स्थानीय लोग मानते हैं कि इससे रोजमर्रा का सहज जीवन प्रभावित हो रहा है.

पर्यटन पर भी दिखने लगा असर

भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा सिर्फ व्यापार नहीं बल्कि पर्यटन की भी बड़ी ताकत रही है. नेपाल से बड़ी संख्या में पर्यटक उत्तर प्रदेश के दुधवा नेशनल पार्क और अन्य पर्यटन स्थलों पर आते रहे हैं. वहीं भारतीय पर्यटक नेपाल के निकुंज नेशनल पार्क, सीचापानी और भैरहवा जैसे इलाकों में घूमने जाते रहे हैं. लेकिन अब भारतीय वाहनों पर लागू नई भंसार व्यवस्था ने पर्यटन को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है. नेपाल ने ऑनलाइन कस्टम प्रणाली लागू कर दी है जिसके बाद भारतीय वाहनों की आवाजाही का पूरा रिकॉर्ड डिजिटल रूप से दर्ज होने लगा है.

नई व्यवस्था के तहत भारतीय कार, जीप और मोटरसाइकिल जैसे निजी वाहन वर्षभर में अधिकतम 30 दिन तक ही नेपाल में रह सकेंगे. इससे अधिक अवधि होने पर वाहन जब्त किए जाने का प्रावधान है. पहले यह नियम व्यवहार में उतना सख्त नहीं था लेकिन ऑनलाइन प्रणाली लागू होने के बाद निगरानी आसान हो गई है. नेपाल जाने वाले पर्यटक अब अतिरिक्त कागजी प्रक्रिया और शुल्क के कारण यात्रा योजनाओं पर पुनर्विचार कर रहे हैं. पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों का कहना है कि वीकेंड टूरिज्म और छोटे पारिवारिक ट्रिप पर इसका सीधा असर पड़ा है.

भंसार व्यवस्था और बढ़ता आर्थिक बोझ

नेपाल में भारतीय वाहनों के प्रवेश के लिए भंसार शुल्क भी लागू है. मालवाहक वाहनों और निजी पर्यटक वाहनों के लिए अलग-अलग शुल्क निर्धारित किए गए हैं. भारतीय पर्यटक वाहनों को प्रतिदिन भंसार शुल्क और परमिट शुल्क देना पड़ता है. हालांकि नेपाल प्रशासन का कहना है कि सीमावर्ती बाजारों के लिए विशेष सुविधा पास की व्यवस्था पहले की तरह जारी है.

इस सुविधा के तहत भारतीय वाहन सीमा से सटे नेपाली कस्बों तक 12 घंटे के लिए बिना शुल्क के जा सकते हैं. लेकिन सीमाई लोगों का कहना है कि व्यवहारिक स्तर पर जांच और प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक कठिन हो गई है. भैरहवा भंसार कार्यालय के प्रमुख हरिहर पौडेल के अनुसार नियमों का उद्देश्य व्यवस्था को पारदर्शी बनाना है, न कि लोगों को परेशान करना. नेपाल के सांसद अभिषेक प्रताप शाह भी कहते हैं कि लोगों के बीच नियमों को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है और सुविधा व्यवस्था अब भी उपलब्ध है.

भारत-नेपाल सीमा पर रहने वाले हजारों छोटे व्यापारी, होटल संचालक, वाहन चालक, दिहाड़ी मजदूर और स्थानीय बाजार इन गतिविधियों पर निर्भर हैं. नेपाली ग्राहकों की संख्या घटने से सबसे ज्यादा असर इन्हीं वर्गों पर पड़ा है. सीमाई बाजारों में होटल और ढाबों की बिक्री कम हुई है. छोटे दुकानदारों का उधार बढ़ रहा है. साप्ताहिक बाजारों की रौनक फीकी पड़ रही है. कई व्यापारी मानते हैं कि अगर स्थिति लंबे समय तक ऐसी ही रही तो सीमाई अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है. नेपाल से इलाज, शिक्षा और खरीदारी के लिए भारत आने वाले लोगों को भी सीमा चौकियों पर अधिक समय लग रहा है. इससे दोनों देशों के बीच लंबे समय से बना भरोसेमंद सामाजिक संपर्क कमजोर पड़ने की आशंका बढ़ रही है.

समाधान की तलाश में दोनों देशों की नजर

सीमाई व्यापारियों और स्थानीय संगठनों ने भारत और नेपाल सरकारों से व्यावहारिक समाधान निकालने की मांग की है. उनका कहना है कि छोटे व्यापार और पारिवारिक आवाजाही के लिए अलग व्यवस्था बनाई जानी चाहिए. कस्टम फ्री सीमा बढ़ाने और स्थानीय लोगों के लिए सरल प्रक्रिया लागू करने की मांग लगातार उठ रही है.

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत और नेपाल के रिश्ते केवल राजनयिक संबंध नहीं हैं. यह दुनिया की उन दुर्लभ सीमाओं में से एक है जहां सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव राजनीतिक सीमाओं से कहीं अधिक गहरा है. ऐसे में किसी भी प्रशासनिक सख्ती का असर सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रहता बल्कि सीधे लोगों के जीवन और भावनात्मक रिश्तों तक पहुंचता है. फिलहाल भारत-नेपाल सीमा पर बढ़ती सख्ती ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि व्यवस्था और मानवीय संबंधों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए.

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