भारतीय सैनिकों को निकाल रहा मालदीव, एक समय इसी सेना ने रोका था तख्तापलट
मालदीव ने भारत की सेना को अपने देश से निकलने का आदेश दिया है और इसके लिए 15 मार्च तक की डेडलाइन भी तय कर दी है.

ऑपरेशन कैक्टस के कुछ महीनों बाद प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ राष्ट्रपति गय्यूम (फोटो: मालदीव नेशनल लाइब्रेरी)
कभी भरोसेमंद दोस्त रहे भारत और मालदीव के संबंधों में अब तेजी से कड़ावाहट आ रही है. अब मालदीव ने भारत की सेना को अपने देश से निकलने का आदेश दिया है और इसके लिए 15 मार्च तक की डेडलाइन भी तय कर दी है.
वैसे तो भारत ने मालदीव की किन मौकों पर कितने तरीकों से मदद की इसका पूरा इतिहास रहा है, लेकिन इसमें एक मौका बड़ा खास है, जब भारत की तीनों सेनाओं ने मिलकर मालदीव में तख्तापलट होने से रोका था.
1988 में नवंबर का महीना था. भारत में राजीव गांधी की सरकार थी. उसी समय भारत और मालदीव दोनों से दूर श्रीलंका में एक पटकथा रची जा रही थी, जिसका उद्देश्य था- मालदीव में तख्तापलट कर अपना नियंत्रण स्थापित करना. इसकी पूरी स्क्रिप्ट के रचयिता मालदीव मूल के श्रीलंकाई कारोबारी अब्दुल्लाह लुथुफी थे.
3 नवंबर की सुबह भारत के विदेश मंत्रालय में एक फोन आता है. इसपर खबर मिली कि मालदीव में विद्रोही उग्र हो गए हैं और तेजी से सराकरी इमारतों पर कब्जा कर रहे हैं. इत्तेफाक से इसी दिन मालदीव के तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल गय्यूम को भारत दौरे पर आना था, लेकिन राजीव गांधी की व्यस्तता के चलते उनका दौरा रद्द हो गया था. अब राष्ट्रपति गय्यूम अपने ही देश में थे और विद्रोह के बीच छिपने के लिए मजबूर हो गए थे. दरअसल विद्रोही भी इसी इंतजार में थे कि जब राष्ट्रपति भारत की यात्रा पर जाएंगे तो इधर वे तख्तापलट कर देंगे. गय्यूम का भारत आना तो टल गया, लेकिन विद्रोहियों ने अपनी योजना को न टालने का फैसला किया. श्रीलंका से उग्रवादियों की खेप मालदीव आ रही थी. पीपुल्स लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन ऑफ तमिल ईलम (श्रीलंका में तमिल अधिकारों के लिए लड़ने वाला एक संगठन) के लड़ाके हथियारों के साथ पहले ही पहुंच चुके थे.
जैसे ही इसकी खबर भारत पहुंची तो PMO से फॉरेन सर्विस ऑफिसर रोनेन सेन ने तत्कालीन चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ जनरल वीएन शर्मा के आर्मी हाउस को सूचना दी. मामले पर तुरंत ऑपरेशन रूम में प्रधानमंत्री राजीव गांधी से चर्चा हुई. उसी दिन दोपहर तक कैबिनेट कमेटी की मीटिंग के बाद फैसला किया गया कि भारत इस मुसीबत की घड़ी में मालदीव की मदद करेगा. इस अभियान को 'ऑपरेशन कैक्टस' नाम दिया गया. मालदीव ने कई देशों से मदद की अपील की थी, लेकिन पाकिस्तान, सिंगापुर, श्रीलंका ने मदद से इनकार कर दिया था और ब्रिटेन-अमेरिका के लिए तुरंत मदद पहुंचा पाना आसान नहीं था.
अब तक विद्रोहियों ने मालदीव की सरकारी इमारतों, बंदरगाहों और टीवी स्टेशनों पर कब्जा कर लिया था और राष्ट्रपति गय्यूम तक पहुंचना चाहते थे. भारत में मदद का फैसला होते ही पैरा ब्रिगेड ने ऑपरेशन की तैयारी शुरू कर दी. नौसेना के विमानों ने हुलुले एयरपट्टी से तस्वीरें भेजी. वायुसेना के इल्यूशिन IL-76 विमान के जरिए आगरा एयरफोर्स स्टेशन से सेना को एयरलिफ्ट करने का काम शुरू हो गया. इस ऑपरेशन में पैराशूट रेजिमेंट की 6वीं बटालियन, 17वीं पैराशूट फील्ड रेजिमेंट और 5वीं इंडिपेंडेंट पैराशूट ब्रिगेड को भेजा गया. भारत का किसी दूसरे देश में इस तरह का ये पहला सैन्य अभियान था.
मदद की गुहार आए 9 ही घंटे हुए थे कि भारतीय विमान मालदीव की धरती पर पहुंचने लगे. अच्छी बात ये थी कि मालदीव की सेना ने अब तक माले एयरपोर्ट को बचा रखा था. इसपर विद्रोहियों का कब्जा नहीं हुआ था. भारतीय सेना ने पहुंचते ही पहले इस एयरपोर्ट को सुरक्षित किया ताकि आगे की सप्लाई में बाधा न आए. दूसरी तरफ नौसेना भी अपनी योजना पर काम कर रही थी. गोदावरी और बेतवा युद्धपोत ने माले और श्रीलंका के बीच उग्रवादियों की सप्लाई लाइन काट दी.
माले में भारतीय सेना के एक्टिव होते ही उग्रवादी हैरान रह गए. उन्हें इसकी कोई उम्मीद नहीं थी. विद्रोहियों ने एक जहाज को भी अगवा कर लिया था. इस जहाज को अमेरिकी नौसेना ने इंटरसेप्ट करके भारतीय नौसेना को जानकारी दी, इसके बाद भारत ने इस जहाज को छुड़ाकर अपने कब्जे में लिया. इस दौरान 19 उग्रवादियों और 2 बंधकों की मौत हुई.
भारतीय सेना के एक्टिव होते ही विद्रोही भागने लगे. भारत का ये सैन्य अभियान 2 दिन में खत्म हो गया और इसी के साथ गय्यूम के तख्तापलट की कोशिश नाकाम हो गई. 70 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिसमें लुथुफी सहित 4 लोगों को मौत की सजा सुनाई गई. हालांकि बाद में राजीव गांधी के दखल के बाद सजा को बदल दिया गया. इस अभियान की कई देशों ने तारीफ की, लेकिन श्रीलंका में इसका कड़ा विरोध देखा गया था.
मालदीव हमेशा से ही भारत का अच्छा दोस्त रहा है. चाहे वो 2004 की सुनामी हो या कोरोना महामारी, भारत ने हमेशा मदद की है. हजारों करोड़ के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट से लेकर सैन्य ट्रेनिंग देने और आर्थिक मदद तक, भारत कभी अपनी दोस्ती निभाने में पीछे नहीं रहा, लेकिन अब राष्ट्रपति मुइज्जू के नेतृत्व में मालदीव में एक नई सरकार है, जो भारत से अपने रिश्ते ताक पर रख रही है.
इस मामले पर इंडिया टुडे हिंदी ने मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति अहमद अदीब से बात की. इस बातचीत के अंश पर यहां पढ़ सकते हैं.