ड्रोन और AI के दौर में भारत को क्यों चाहिए हथियार खरीद का नया मॉडल?
भारत की मौजूदा रक्षा खरीद व्यवस्था अनजाने में उन कंपनियों को बाहर कर सकती है जो युद्धक्षेत्र में अगली बड़ी तकनीकी क्रांति ला सकती हैं

आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह कम लागत वाले ड्रोन, AI और सॉफ्टवेयर-आधारित हथियार प्रणाली हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे संघर्षों ने दिखाया है कि अपेक्षाकृत सस्ते मानवरहित सिस्टम अरबों डॉलर की सैन्य संपत्तियों को भी निष्क्रिय कर सकते हैं.
इससे दुनिया भर की सेनाएं रक्षा तकनीक विकसित करने और खरीदने के अपने तरीकों पर फिर से विचार कर रही हैं. इसी कारण कई बड़ी ताकतें अपनी रक्षा खरीद व्यवस्था में बदलाव कर रही हैं, ताकि स्टार्टअप, सॉफ्टवेयर कंपनियों और पारंपरिक रक्षा उद्योग से बाहर की इनोविटिव कंपनियों को सैन्य तंत्र से जोड़ा जा सके.
यूक्रेन में ड्रोन युद्ध रणनीति का सबसे अहम हिस्सा बन चुके हैं. छोटे मानवरहित सिस्टम बार-बार टैंक, तोपखाने और यहां तक कि रणनीतिक महत्व वाले ढांचे भी नष्ट कर रहे हैं. इससे रक्षा उद्योग का एक नया मॉडल उभरा है, जिसमें फुर्तीली तकनीकी कंपनियां केंद्रीय भूमिका निभा रही हैं. इसके जवाब में अमेरिका ने डिफेंस इनोवेशन यूनिट और अदर ट्रांजैक्शन अथॉरिटी जैसे फास्ट-ट्रैक तंत्र का विस्तार किया है, ताकि स्टार्टअप रक्षा खरीद प्रक्रिया में शामिल हो सकें.
ब्रिटेन ने अपनी 2025 डिफेंस इंडस्ट्रियल स्ट्रैटेजी के तहत फास्ट इनोवेशन आधारित कॉन्ट्रैक्ट व्यवस्था शुरू की है. वहीं रूस ने भी, अपनी पारंपरिक केंद्रीकृत सैन्य-औद्योगिक व्यवस्था के बावजूद, विकेंद्रीकृत ड्रोन उत्पादन नेटवर्क और स्वयंसेवकों की मदद से निर्माण पर ज्यादा भरोसा करना शुरू किया है, ताकि नए सिस्टम जल्दी तैनात किए जा सकें.
विश्लेषकों का कहना है कि इन अलग-अलग मॉडलों में एक समान रुझान दिखाई देता है. अब सबसे बड़ा सैन्य तकनीकी बदलाव पारंपरिक रक्षा कंपनियों से नहीं, बल्कि स्टार्टअप, AI कंपनियों और ड्यूएल-यूज (Dual-use) तकनीक विकसित करने वाली कंपनियों से आ रहा है. ये कंपनियां तेजी से तकनीक विकसित कर सकती हैं और उसे तैनात भी कर सकती हैं. इससे पुरानी रक्षा खरीद व्यवस्था को चुनौती मिल रही है जिसे बड़े और पूंजी-आधारित रक्षा उत्पादन के दौर में तैयार किया गया था.
भारत अब भी ऐसी रक्षा खरीद व्यवस्था पर निर्भर है, जो मुख्य रूप से स्थापित रक्षा कंपनियों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों जैसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL), भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL), लार्सन एंड टुब्रो, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) से जुड़ी संस्थाओं पर आधारित है.
इसके साथ ही ‘मेक इन इंडिया’ ढांचे के तहत विदेशी ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स भी इसमें शामिल हैं. लड़ाकू विमान, पनडुब्बी, युद्धपोत, तोपखाना और रणनीतिक रडार नेटवर्क जैसे बड़े प्लेटफॉर्म खरीदने के लिए यह व्यवस्था अब भी जरूरी है. लेकिन सॉफ्टवेयर-आधारित और स्वायत्त युद्ध तकनीकों के बढ़ने से इस मॉडल की सीमाएं सामने आने लगी हैं.
यह चुनौती भारतीय वायुसेना के लिए 87 मीडियम अल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस (MALE) ड्रोन की खरीद में साफ दिखाई देती है. करीब 30,000 करोड़ रुपए की इस परियोजना के लिए HAL, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, अडानी डिफेंस सिस्टम्स, लार्सन एंड टुब्रो, सोलर इंडस्ट्रीज डिफेंस एंड एयरोस्पेस और रैफे एम्फिब्र समेत 10 भारतीय कंपनियों ने बोली लगाई है. इन सिस्टम का वायुसेना गहन परीक्षण करेगी और दो कंपनियों का चयन होने की उम्मीद है. पहली खेप 2027 के मध्य तक शामिल किए जाने का लक्ष्य है.
MALE ड्रोन 10,000 से 30,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ान भर सकते हैं और 24 घंटे से ज्यादा समय तक हवा में रह सकते हैं. इनमें सिंथेटिक अपर्चर रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर और सुरक्षित सैटेलाइट संचार प्रणाली लगी होगी. इससे बड़े इलाकों की लगातार रियल-टाइम निगरानी संभव होगी और भारत की खुफिया, निगरानी और टोही क्षमता काफी मजबूत होगी. इस परियोजना की परिचालन जरूरतें सशस्त्र बलों के व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन के बाद तय की गई हैं, जो इसके रणनीतिक महत्व को दर्शाती हैं.
हालांकि इतनी बड़ी परियोजनाओं के बावजूद उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि भारत की मौजूदा रक्षा खरीद व्यवस्था अनजाने में उन्हीं कंपनियों को बाहर कर सकती है जो युद्धक्षेत्र की अगली तकनीकी क्रांति ला सकती हैं. एक उद्योग विशेषज्ञ ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "इनमें से कई कंपनियां वेंचर कैपिटल से फंडेड, कम परिसंपत्तियों वाली स्टार्टअप हैं. इनके पास न तो बड़ी आय होती है, न विशाल विनिर्माण ढांचा और न ही रक्षा खरीद का लंबा अनुभव. इसलिए उन्नत और युद्ध के लिहाज से उपयोगी तकनीक होने के बावजूद वे पारंपरिक पात्रता मानदंड पूरे नहीं कर पातीं."
आलोचकों का कहना है कि ऐसी कंपनियों पर पुराने वित्तीय और कम्प्लायंस मानदंड लागू करने से जोखिम कम नहीं होता. इसके बजाय प्रतिस्पर्धा घटती है और अत्याधुनिक तकनीक तक पहुंच में देरी होती है. ऐसे समय में जब तकनीकी बढ़त का मतलब बड़े पैमाने पर उत्पादन नहीं बल्कि तेजी से तैनाती है, यह असंगति रणनीतिक नुकसान पहुंचा सकती है.
इस कमी को दूर करने के लिए विशेषज्ञ और उद्योग जगत के कई लोग भारत की रक्षा खरीद व्यवस्था में ‘टू-स्ट्रीम (Two-stream)’ मॉडल अपनाने की वकालत कर रहे हैं. इस प्रस्ताव के तहत पारंपरिक खरीद व्यवस्था बड़े रक्षा प्लेटफॉर्म की खरीद के लिए जारी रहेगी जबकि इनोवेशन आधारित तकनीकों के लिए अलग फास्ट-ट्रैक व्यवस्था बनाई जाएगी.
पहला ट्रैक पहले की तरह लड़ाकू विमान, युद्धपोत, बख्तरबंद वाहन, पनडुब्बी, तोपखाना और रणनीतिक ढांचे जैसी जटिल और पूंजी-प्रधान खरीद को संभालेगा. इसमें स्थापित रक्षा कंपनियां, सार्वजनिक उपक्रम और विदेशी OEMs शामिल रहेंगे. मौजूदा वित्तीय पात्रता मानदंड, तीन से सात साल की खरीद प्रक्रिया और रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) की निगरानी भी जारी रहेगी.
दूसरा ट्रैक सोच में बड़ा बदलाव होगा. यह खास तौर पर स्टार्टअप और उभरती तकनीकी कंपनियों के लिए बनाया जाएगा. इसका फोकस ड्रोन, स्वायत्त सिस्टम, AI आधारित इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरण, सॉफ्टवेयर-आधारित हथियार और कम लागत वाले सटीक हमले करने वाले सिस्टम पर होगा. एक अन्य उद्योग विशेषज्ञ के अनुसार, इसमें पात्रता का आधार राजस्व या परिसंपत्तियां नहीं होंगी, बल्कि DPIIT (Department for Promotion of Industry and Internal Trade) की स्टार्टअप मान्यता, इनोवेशंस फॉर डिफेंस एक्सीलेंस (iDEX) जैसे इनिशिएटिव में भागीदारी, वेंचर कैपिटल का समर्थन या तकनीकी क्षमता जैसे मानदंड होंगे.
उन्होंने कहा, "बड़े उत्पादन अनुबंधों की जगह शुरुआत छोटे डेमॉन्स्ट्रेशन ऑर्डर से होगी. जो सिस्टम सफल होंगे, उन्हें चरणबद्ध तरीके से बड़े पैमाने पर खरीदा जाएगा. सॉफ्टवेयर आधारित सिस्टम के लिए सब्सक्रिप्शन मॉडल के जरिए अपडेट की व्यवस्था हो सकती है. बौद्धिक संपदा अधिकार इनोवेशन करने वाली कंपनियों के पास रहेंगे, जबकि रक्षा मंत्रालय को उनके इस्तेमाल का अधिकार मिलेगा. स्टार्टअप में आम तौर पर होने वाले आउटसोर्स्ड मैन्युफैक्चरिंग को भी इस व्यवस्था में औपचारिक रूप से शामिल किया जाएगा, न कि उसे कमी माना जाएगा."
उन्होंने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि खरीद प्रक्रिया का समय काफी कम हो जाएगा. एक विशेष फास्ट-ट्रैक मूल्यांकन व्यवस्था के तहत प्रस्ताव मिलने के 90 दिनों के भीतर अनुबंध दिए जा सकते हैं. तीन महीने के भीतर डेमॉन्स्ट्रेशन अनुबंध जारी किए जा सकते हैं और छह से 12 महीने के भीतर बड़े पैमाने पर खरीद का फैसला लिया जा सकता है.
इस मॉडल के समर्थक दुनिया के कई उदाहरण देते हैं. यूक्रेन के ब्रेव1 इकोसिस्टम ने 1,500 से ज्यादा रक्षा तकनीक स्टार्टअप को सीधे अग्रिम मोर्चे पर मौजूद सैन्य इकाइयों से जोड़ा है. इससे ड्रोन और AI सिस्टम तेजी से तैनात किए जा सके. अमेरिका में एंडुरिल और शील्ड AI जैसी कंपनियों ने पारंपरिक रक्षा उद्योग का हिस्सा न होने के बावजूद इनोवेशन आधारित खरीद व्यवस्था के जरिए बड़े रक्षा अनुबंध हासिल किए हैं.
ब्रिटेन की नई रक्षा औद्योगिक रणनीति भी स्टार्टअप को स्थापित रक्षा कंपनियों के साथ जोड़ने के लिए तेज अनुबंध व्यवस्था लेकर आई है. वहीं रूस का विकेंद्रीकृत ड्रोन निर्माण और वॉलेंटियर पर आधारित खरीद नेटवर्क दिखाता है कि युद्धक्षेत्र की तत्काल जरूरतें किस तरह पारंपरिक व्यवस्था को बदल रही हैं. इन सभी उदाहरणों से साफ है कि इस दौर में सेनाएं पारंपरिक बाधाओं को दूर करने के लिए समानांतर रक्षा खरीद व्यवस्था विकसित कर रही हैं.
भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उसकी रक्षा खरीद व्यवस्था इतनी तेजी से बदल सकती है कि वह इस रफ्तार का साथ दे सके. मौजूदा व्यवस्था बड़े प्लेटफॉर्म की खरीद के लिए प्रभावी है लेकिन आधुनिक युद्ध में तेजी से बदलती तकनीकों के लिए शायद पर्याप्त नहीं है. सुधार के समर्थकों का कहना है कि भारत के पास iDEX और DPIIT जैसी पहलों के रूप में मजबूत आधार पहले से मौजूद है. लेकिन अब भी ऐसी संगठित व्यवस्था की कमी है, जो अच्छे प्रोटोटाइप को बड़े पैमाने पर तैनात होने वाली क्षमता में बदल सके.
जैसे-जैसे युद्ध में स्वायत्त तकनीक, AI और कम लागत वाले बड़े पैमाने पर बनने वाले सिस्टम की भूमिका बढ़ रही है, वैसे-वैसे नई तकनीक को तेजी से तैनात करने की क्षमता उतनी ही निर्णायक साबित हो सकती है जितनी उन्नत पारंपरिक हथियार खरीदना.
अंत में विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत को रक्षा खरीद का एक दूसरा ट्रैक तैयार करना चाहिए, जो ड्रोन, AI और सॉफ्टवेयर-आधारित हथियार जैसी नई तकनीकों को तेजी से अपनाने में मदद करे. साथ ही इनमें सब्सक्रिप्शन और नियमित अपग्रेड की व्यवस्था भी शामिल हो.