भारत में गांजा को लेकर कानूनों में ढील की मांग क्यों उठी?
करीब 5 महीने पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को गांजा (कैनाबिस) से जुड़े कानूनों की समीक्षा कर फैसला लेने के लिए 6 महीने का समय दिया था जिसकी समय-सीमा अब नजदीक आ रही है

भारत में लंबे समय से गांजा (कैनाबिस) को वैध बनाने की मांग उठती रही है. कुछ समय पहले तक यह मांग मुख्य रूप से सामाजिक कार्यकर्ताओं, डॉक्टरों और नीति-निर्माताओं तक सीमित थी लेकिन अब यह बहस एक अहम मोड़ पर पहुंचती दिख रही है.
दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को कैनाबिस से जुड़े कानूनों की व्यापक समीक्षा करने का निर्देश दिया था. करीब पांच महीने पहले अदालत ने सरकार को फैसला लेने के लिए 6 महीने की समय-सीमा तय की थी, जो अब नजदीक आ रही है.
इस समय-सीमा के भीतर केंद्र को यह तय करना है कि क्या देश के सख्त कानूनी ढांचे में ढील देने की जरूरत है. 23 जनवरी को दिए गए एक महत्वपूर्ण आदेश में दिल्ली हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति मधु जैन की पीठ ने कैनाबिस की वैधता पर फैसला देने से परहेज किया. लेकिन साथ ही केंद्र सरकार को विभिन्न पक्षों से परामर्श करने और यह जांचने का निर्देश दिया कि नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेस (NDPS) अधिनियम और नियमों में कैनाबिस से जुड़े प्रावधानों में ढील देने की जरूरत है या नहीं.
कोर्ट ने कहा कि अगर सरकार को सभी पक्षों से बात कर लगता है कि कानून में ढील देने की जरूरत है तो उसका उद्देश्य भी पता लगाना जरूरी है. अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि छह महीने के भीतर नीतिगत फैसला लिया जाए. अदालत के इस फैसले के कारण अगर केंद्र समय बढ़ाने की मांग न करे तो जुलाई 2026 प्रभावी समयसीमा बन गई है.
यह मामला ग्रेट लीगलाइजेशन मूवमेंट इंडिया ट्रस्ट के जरिए दायर किया गया था. ट्रस्ट का तर्क था कि कैनाबिस को अपराध की श्रेणी से बाहर किया जाना चाहिए और वैश्विक बदलावों, वैज्ञानिक प्रमाणों तथा भारतीय पारंपरिक औषधीय प्रथाओं को देखते हुए कानून की नए सिरे से समीक्षा होनी चाहिए.
केंद्र सरकार ने NDPS कानून का बचाव करते हुए अदालत को बताया कि भारत में कैनाबिस पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है. सरकार का कहना है कि चिकित्सा, वैज्ञानिक, औद्योगिक तथा बागवानी उद्देश्यों के लिए नियंत्रित परिस्थितियों में इसके उपयोग की अनुमति पहले से मौजूद है.
अदालत ने केंद्र को विभिन्न पक्षों से परामर्श करने और यह समीक्षा करने का निर्देश दिया कि कैनाबिस से जुड़े NDPS प्रावधानों में ढील देने की आवश्यकता है या नहीं. साथ ही नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) के महानिदेशक को नोडल अधिकारी नियुक्त किया गया जो विभिन्न मंत्रालयों, डॉक्टरों, ऑन्कोलॉजिस्ट, पैलिएटिव केयर विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और नागरिक समाज समूहों के साथ बातचीत की प्रक्रिया के लिए कॉर्डिनेशन करेंगे.
इस मामले का समय महत्वपूर्ण है क्योंकि कैनाबिस भारत में सबसे अधिक इस्तेमाल और तस्करी किए जाने वाले नशीले पदार्थों में से एक है. अदालत में सरकार के जरिए प्रस्तुत राष्ट्रीय सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 3.1 करोड़ भारतीयों यानी आबादी के करीब 2.8 फीसद लोगों ने पिछले एक वर्ष में किसी न किसी कैनाबिस उत्पाद का सेवन किया था. अनुमान के मुताबिक, इनके सेवन करने वाले हर 11 में से एक व्यक्ति को कैनाबिस की लत लगी थी.
पिछले कुछ वर्षों में कानून लागू करने वाली एजेंसियों ने बड़ी मात्रा में जब्ती की जानकारी भी दी है. NCB, राज्य पुलिस बल और सीमा शुल्क विभाग नियमित रूप से पूर्वी और दक्षिणी भारत के खेती वाले इलाकों से शहरी बाजारों तक ले जाए जा रहे गांजे की खेप पकड़ते हैं.
पिछले एक दशक में कैनाबिस सबसे अधिक मात्रा में जब्त होने वाले नशीले पदार्थों में शामिल रहा है. इसकी व्यापक खेती और घरेलू मांग के कारण इसकी जब्ती की मात्रा अक्सर हेरोइन और कोकीन से कहीं अधिक होती है. गांजा उत्पादन मुख्य रूप से ओडिशा और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों विशेष रूप से पूर्वी घाट के पहाड़ी क्षेत्रों में होता है. इस क्षेत्र को कथित तौर पर 'गांजा बेल्ट' भी कहा जाता है.
तेलंगाना, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों में भी समय-समय पर गांजा की अवैध खेती पाई गई है. तस्करी करने वाले गिरोह गांजा को महानगरों तक पहुंचाने के लिए कूरियर सेवाओं, अंतरराज्यीय परिवहन मार्गों और सोशल मीडिया आधारित डिलीवरी मॉडल का तेजी से उपयोग कर रहे हैं.
इस मामले ने ध्यान इसलिए भी आकर्षित किया है क्योंकि इसको लेकर भारत की कानूनी स्थिति ज्यादा साफ नहीं है. NDPS अधिनियम चरस और गांजे को अपराध की श्रेणी में रखता है लेकिन चिकित्सा और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए नियंत्रित खेती की अनुमति देता है.
राज्य सरकारें भी कानून के कुछ प्रावधानों के तहत इसकी खेती और उपयोग को नियंत्रित कर सकती हैं. धारा 14 औद्योगिक उद्देश्यों, जैसे रेशा और बीज उत्पादन, तथा बागवानी उपयोग के लिए खेती की अनुमति देती है. केंद्र ने अदालत को बताया कि इन्हीं कारणों से भारत में कैनाबिस पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है. उत्तराखंड पहले ही औद्योगिक हेम्प या भांग की खेती की अनुमति दे चुका है, जबकि मध्य प्रदेश ने चिकित्सा और औद्योगिक उद्देश्यों के लिए खेती की अनुमति देने की योजना की घोषणा की है.
सरकार ने यह भी बताया कि कई सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं से जुड़े होने के कारण भांग NDPS अधिनियम के दायरे में नहीं आती और इसका नियमन अलग-अलग राज्य करते हैं. राजस्थान में इसे लाइसेंस प्राप्त दुकानों के माध्यम से बेचा जाता है, ठीक वैसे ही जैसे शराब की बिक्री होती है.
कैनाबिस पौधे के विभिन्न हिस्सों और इसके अलग-अलग उपयोगों के बीच यह अंतर ही एक कारण है कि नीति-निर्माताओं पर उस ढांचे की समीक्षा का दबाव बढ़ सकता है, जिसे मुख्य रूप से 1980 के दशक में तैयार किया गया था. दिल्ली हाई कोर्ट का यह आदेश ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर में कैनाबिस को लेकर नियमों में बदलाव हो रहा है.
पिछले एक दशक में कई देशों ने प्रतिबंधों में ढील दी है. कनाडा ने 2018 में पूरे देश में मनोरंजन के लिए कैनाबिस को वैध कर दिया था. जर्मनी ने 2024 में व्यक्तिगत उपयोग और गैर-व्यावसायिक खेती को वैध बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया. यूरोप के कई देश अब चिकित्सा कैनाबिस कार्यक्रमों की अनुमति देते हैं. अमेरिका में संघीय कानून अभी भी कैनाबिस को अवैध पदार्थ मानता है लेकिन अधिकांश राज्यों में चिकित्सा उपयोग की अनुमति है और कई राज्यों में मनोरंजन के लिए भी इसका उपयोग वैध है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सोच में बदलाव आया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की ड्रग डिपेंडेंस विशेषज्ञ समिति ने कैनाबिस से जुड़े पदार्थों पर नियंत्रण के दायरे में बदलाव की सिफारिश की थी. सरकार ने भी हाई कोर्ट में अपनी दलीलों में इस बात का जिक्र किया है.
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि बहस खत्म हो गई है. जिन देशों ने कैनाबिस को वैध बनाया है, वे अब भी युवाओं की पहुंच, नशे की हालत में वाहन चलाने, लत और अवैध बाजारों में इसके पहुंचने जैसी चिंताओं से जूझ रहे हैं. भारतीय सरकार ने भी अदालत के सामने इन जोखिमों का हवाला देते हुए कहा कि कमजोर नियमन वाले चिकित्सा कैनाबिस कार्यक्रम गैर-चिकित्सीय उपयोग को बढ़ावा दे सकते हैं.
छह महीने की समयसीमा नजदीक आने के साथ केंद्र सरकार को जल्द ही यह स्पष्ट करना पड़ सकता है कि वह मौजूदा स्थिति बनाए रखना चाहती है या चिकित्सा और औद्योगिक उपयोग के लिए सीमित सुधार लाना चाहती है. सरकार को अगर जरूरत महसूस हुआ तो कैनाबिस नीति पर व्यापक चर्चा शुरू हो सकती है. नतीजा चाहे जो भी हो, दिल्ली हाई कोर्ट ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि अब इस सवाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.