इंडिगो कैसे खुद के बनाए जाल में फंसी; DGCA की रिपोर्ट से क्या पता चलता है?
दिसंबर में इंडिगो की उड़ानों में आई अभूतपूर्व अव्यवस्था को लेकर DGCA की जांच रिपोर्ट एक बड़े सबक की तरफ इशारा करती है

नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) की लंबे इंतजार के बाद आई जांच रिपोर्ट एक बेहद साधारण से तकनीकी शब्द पर टिकती हैः ओवर-ऑप्टिमाइजेशन. सुनने में यह शब्द मामूली लगता है, लेकिन इसके पीछे छिपी कहानी काफी गंभीर है. बाजार हिस्सेदारी के लिहाज से देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो ने लागत घटाने और विमानों का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने की होड़ में ऐसा सिस्टम खड़ा कर लिया, जो तभी तक चल सकता था, जब तक कुछ भी गलत न हो.
जांच के मुताबिक, समस्या सिर्फ किसी एक फैसले की नहीं थी, बल्कि ढांचे की थी. एयरलाइन ने ऑपरेशनल स्लैक, क्रू बफर, रिकवरी मार्जिन और स्टैंडबाइ क्षमता जैसी बुनियादी चीजों को उलट दिया था. मकसद था खर्च कम करना और विमान का अधिकतम उपयोग. लेकिन जैसे ही सरकार ने फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (FDTL) के नए नियम लागू किए, यह कमजोरी पूरी तरह सामने आ गई.
यह मामला लो-कॉस्ट एयरलाइन मॉडल के लिए एक बड़ी चेतावनी है. ज्यादा से ज्यादा उपयोग और बेहद कम स्टाफिंग से कुछ हद तक तो जबरदस्त दक्षता मिलती है. लेकिन एक सीमा के बाद यही ऑप्टिमाइजेशन ताकत नहीं, बल्कि सिस्टम के लिए खतरा बन जाता है. एविएशन में अतिरिक्त व्यवस्था यानी रेडंडेंसी ही असली मजबूती होती है. इंडिगो का दिसंबर का अनुभव दिखाता है कि जब इस संतुलन को जरूरत से ज्यादा खींच दिया जाता है, और उपयोग को स्थिरता समझ लिया जाता है, तो नतीजा क्या होता है.
हकीकत यह है कि दिसंबर की यह गड़बड़ी किसी तकनीकी खराबी से नहीं, बल्कि सीधे गुणा-गणित से पैदा हुई. नए थकान-सुरक्षा नियमों के तहत पायलट कितने घंटे उड़ान भर सकते हैं, इस पर सख्त सीमा लगी और आराम का समय बढ़ा दिया गया. किसी मजबूत एयरलाइन सिस्टम में इसका मतलब होता है, कुछ समय के लिए उड़ानों की संख्या कम करना, तेजी से क्रू जोड़ना और रोस्टर को नए सिरे से सेट करना. लेकिन इंडिगो का सिस्टम इतना कमजोर था कि इन बदलावों का असर तुरंत और श्रृंखलाबद्ध तरीके से सामने आया. नतीजा यह हुआ कि हालात बेकाबू हो गए. 2,000 से ज्यादा उड़ानें रद्द करनी पड़ीं और कई दिनों तक इंडिगो का पूरा नेटवर्क लगभग ठप सा हो गया.
जांच की असल जड़ में वह चीज है, जिसे एविएशन प्लानर ‘जीरो-बफर’ शेड्यूल कहते हैं. आम तौर पर ज्यादातर एयरलाइंस रोस्टर बनाते वक्त कुछ ढील रखती हैं. फॉग, ट्रैफिक जाम या किसी इनबाउंड फ्लाइट के लेट होने की स्थिति से निबटने के लिए स्टैंडबाइ पायलट और रिजर्व दिन रखे जाते हैं. लेकिन जांच समिति ने पाया कि इंडिगो में रोस्टर हमेशा नियमों की आखिरी सीमा तक बनाए जाते थे. जितना कानूनन संभव हो, उससे आगे जाने की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी जाती थी.
इस प्लानिंग में गलती की गुंजाइश लगभग खत्म हो गई थी. उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान आम मानी जाने वाली आधे घंटे की देरी भी पायलटों को तय सीमा से बाहर धकेल सकती थी. जैसे ही यह सीमा पार होती, पायलट को उड़ान रोकनी पड़ती थी. चूंकि एक ही विमान को दिन भर में कई सेक्टर में उड़ाने के लिए शेड्यूल किया गया होता था, इसलिए एक जगह आई रुकावट से आगे की कई उड़ानें एक साथ रद्द हो जाती थीं. जांच रिपोर्ट साफ कहती है कि ये अलग-अलग घटनाएं नहीं थीं. यह उस रणनीति का लगभग तय नतीजा था, जो इस भरोसे पर टिकी थी कि सब कुछ बिना किसी गड़बड़ी के चलेगा.
समिति ने इंडिगो की उस बढ़ती आदत पर भी ध्यान दिलाया, जिसमें अस्थायी इंतजाम धीरे-धीरे स्थायी बन गए. इसमें सबसे अहम थे डेड-हेडिंग और बार-बार टेल स्वैप करना. डेड-हेडिंग का मतलब है कि पायलट यात्री बनकर उड़ान भरते हैं, ताकि किसी दूसरे शहर से अगली फ्लाइट ऑपरेट कर सकें. टेल स्वैप तब होता है, जब किसी खाली स्लॉट को देखकर विमान को एक रूट से हटाकर दूसरे रूट पर लगा दिया जाता है.
एयरलाइन इंडस्ट्री में ये दोनों तरीके आम हैं. लेकिन जब ये रोजमर्रा की मजबूरी बन जाएं, तो खतरा बढ़ जाता है. जांच से पता चलता है कि सामान्य दिनों में भी इंडिगो का बेहद जटिल नेटवर्क इन्हीं जोड़-तोड़ पर काफी हद तक निर्भर था. अगर किसी डेड-हेडिंग पायलट की फ्लाइट फॉग या ट्रैफिक की वजह से लेट हो गई, तो वह आगे की ड्यूटी मिस कर दे रहा था. नतीजा यह होता था कि अगली फ्लाइट रद्द करनी पड़ती थी. वजह विमान की कमी नहीं, बल्कि यह थी कि पायलट कानूनी तौर पर ड्यूटी पर था और रास्ते में फंसा हुआ था.
टेल स्वैप भी हालात को और बिगाड़ते थे. जब बहुत कम मार्जिन के साथ विमान बदले जाते हैं, तो एक रूट पर हुई देरी बाकी रूट्स के शेड्यूल को भी बिगाड़ देती है. इस तरह एक छोटी सी रुकावट पूरे नेटवर्क को हिला दे रही थी.
तकनीक ने इस नाजुक ढांचे को और कमजोर कर दिया. जांच समिति ने “सिस्टम सॉफ्टवेयर सपोर्ट में कमियों” की बात कही. यह इंडिगो के रोस्टर और प्लानिंग टूल्स पर सीधा सवाल है. समिति के मुताबिक, ये सिस्टम गणितीय दक्षता और लागत घटाने के लिए बनाए गए थे, न कि ऑपरेशनल मजबूती के लिए. शेड्यूल यह मानकर तैयार किए गए थे कि आसमान साफ रहेगा, उड़ानें वक्त पर आएंगी और क्रू हर समय उपलब्ध रहेगा. इनमें असल दुनिया की अनिश्चितताओं से निबटने की क्षमता ही नहीं थी. खासकर तब, जब सख्त FDTL नियम लागू होने के बाद क्रू के उपलब्ध होने के घंटे अचानक काफी कम हो गए.
लेकिन सबसे गंभीर टिप्पणी निगरानी और ऑपरेशनल कंट्रोल को लेकर है. समिति ने “मैनेजमेंट स्ट्रक्चर और ऑपरेशनल कंट्रोल में खामियों” की बात कही और यह भी नोट किया कि कारोबारी प्राथमिकताओं और जमीनी स्तर पर सेवा देने के तरीके के बीच काफी फासला है. इंडिगो का खर्च घटाने पर जबरदस्त फोकस, जो उसकी इंडस्ट्री में सबसे बेहतर मानी जाने वाली ‘कॉस्ट ऑफ अवेलेबल सीट किलोमीटर’ में दिखता है, हर स्तर पर फैसलों को प्रभावित करता रहा. विमान हर हाल में उड़ते रहें, एसेट्स का पूरा इस्तेमाल हो, यही सोच हावी रही. जबकि नियमों में बदलाव के बाद इतनी तीव्रता अब ढांचागत तौर पर संभव ही नहीं रह गई थी.
असल में यही वह स्थिति है, जिसे जांच समिति ने ओवर-ऑप्टिमाइजेशन कहा है. यानी ऐसी दक्षता, जिसमें मजबूती की गुंजाइश ही न हो. इंडिगो का ऑपरेटिंग मॉडल इस तरह बना था कि असफलता के लिए कोई जगह नहीं थी. हर अनुमान को हर दिन सही साबित होना जरूरी था. जैसे ही बदले हुए FDTL नियमों ने थोड़ी सी भी पाबंदी लगाई, सिस्टम के पास झटके सहने के लिए कुछ बचा ही नहीं.
दिसंबर का संकट दिखाता है कि ऐसा मॉडल कितनी तेजी से बिखर सकता है. जब तक एयरलाइन हालात संभालने की कोशिश करती, तब तक विमान और पायलट मौजूद थे, लेकिन उन्हें सही जगह और सही समय पर कानूनी तौर पर जोड़ पाना नामुमकिन हो चुका था. अब 22 करोड़ रुपए के जुर्माने के अलावा, इंडिगो को सरकार के पास 50 करोड़ रुपए की बैंक गारंटी भी देनी होगी. यह गारंटी लंबे समय के सिस्टम सुधार को ध्यान में रखकर तय की गई है.
DGCA चार स्तंभों पर सुधार की स्वतंत्र जांच करेगा. नेतृत्व और गवर्नेंस, मैनपावर प्लानिंग/रोस्टरिंग और थकान से जुड़े जोखिमों का प्रबंधन, डिजिटल सिस्टम और ऑपरेशनल मजबूती, और बोर्ड स्तर पर निगरानी व लगातार अनुपालन. यह पूरी प्रक्रिया 9 से 15 महीने तक चलेगी. सरकार जब-जब प्रगति की पुष्टि करेगी, उसी हिसाब से बैंक गारंटी चरणबद्ध तरीके से जारी की जाएगी.
जिस सेक्टर ने अब तक निजी कंपनियों की जोखिम उठाने की क्षमता के दम पर, भारी कीमत दबाव और कड़े नियमों के बावजूद, तेज विकास देखा है, वहां सरकार का यह दखल एक अहम मिसाल बन गया है. दिसंबर की घटना शायद यह बताने का सबसे साफ उदाहरण है कि अति-दक्षता की भी एक सीमा होती है. उससे आगे बढ़ने की कीमत पूरे सिस्टम को चुकानी पड़ती है.