सिलीगुड़ी से कश्मीर तक, हिमालयी सीमाओं पर रेलवे का विस्तार कैसे बना रणनीतिक कदम?

सिलीगुड़ी कॉरिडोर से लेकर कश्मीर तक को कवर करने वाली रणनीतिक परियोजनाएं दिखाती हैं कि भारतीय रेल इंफ्रास्ट्रक्चर अब देश की राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न अंग है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

भारत सरकार उत्तर-पूर्वी क्षेत्र को देश के मुख्य भाग से जोड़ने के लिए सड़क और रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर में तेजी से विकास कर रही है. इसी का परिणाम है कि सिलीगुड़ी कॉरिडोर से लेकर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कश्मीर घाटी और अरुणाचल प्रदेश के हिमालयी इलाकों तक रेलवे नेटवर्क पहुंच चुका है या पहुंचने की प्रक्रिया में है.

यह रेलवे विस्तार सीमा सुरक्षा और सैन्य रसद (ट्रूप्स, हथियार, गोला-बारूद और अन्य सामग्री) की तेज और विश्वसनीय पहुंच सुनिश्चित कर रहा है. साथ ही, यह आम लोगों के आवागमन को भी बहुत आसान बना रहा है. पहाड़ी और सीमावर्ती इलाकों में रेलवे का मुख्य उद्देश्य बिना किसी रुकावट जैसे बर्फबारी, भूस्खलन, बाढ़ या अन्य संकट के समय में भी आसान और सुरक्षित कनेक्टिविटी स्थापित करना है.

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने रेलवे विस्तार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गति शक्ति परिकल्पना का हिस्सा बताया है. उन्होंने इसे व्यापक राष्ट्रीय एकीकरण योजना का महत्वपूर्ण अंग भी कहा है. रेलवे मंत्री ने कहा, "सीमा क्षेत्रों में रेलवे विस्तार का लक्ष्य सीमावर्ती पहाड़ी क्षेत्रों में सुरक्षित और बिना किसी रुकावट के रेल संपर्क स्थापित करना है. साथ ही, यह स्पष्ट रूप से रणनीतिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होती है."

सीमावर्ती क्षेत्रों में भारत के जरिए रेल नेटवर्क का विस्तार इस पूरे क्षेत्र में बड़े स्तर पर हो रहे इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट की प्रतिक्रिया मात्र है. चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और तिब्बत में दोहरे उपयोग वाले राजमार्ग का निर्माण किया है. इतना ही नहीं चीन ने यहां रेलवे और हवाई अड्डे बनाए हैं, जिससे सैनिकों की तेज तैनाती और रसद परिवहन संभव हो पाया है.

सिलीगुड़ी कॉरिडोर से अरुणाचल प्रदेश के तवांग तक सीमावर्ती क्षेत्रों में रेल संपर्क का विस्तार करने की भारत की योजना का उद्देश्य लोगों, उपकरणों और आपूर्ति की कुशल आवाजाही है. इसके अलावा, रेलवे विस्तार से रसद आपूर्ति के लिए एक विश्वसनीय गलियारा बनाना है, ताकि जरूरत के समय इनका बेहतर उपयोग किया जा सके.

केंद्रीय बजट 2026 में भारतीय रेलवे के लिए रिकॉर्ड 2.78 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए, जिसमें से 2.77 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा पूंजीगत व्यय यानी ढांचा निर्माण पर खर्च होंगे. देश के लिए रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण रेलवे लाइनों के परिचालन घाटे की पूर्ति के लिए 2,882.32 करोड़ रुपये और पूंजीगत व्यय के रूप में 132.58 करोड़ रुपये दिए गए हैं. कुल व्यय की तुलना में ये आवंटन भले ही कम हों, लेकिन ये फैसला सीमावर्ती रेलवे को नीतिगत प्राथमिकता के रूप में दर्शाते हैं.

रेलवे के सबसे महत्वाकांक्षी प्रस्तावों में से एक उत्तरी बंगाल के क्षेत्र को लेकर है. भारतीय रेलवे सिलीगुड़ी कॉरिडोर से रंगपानी होते हुए बागडोगरा तक 35.8 किलोमीटर लंबी भूमिगत रेल पटरी बिछाने की योजना बना रहा है. इस पूरी योजना में करीब 33.4 किलोमीटर लंबे दुमदंगी से रंगपानी तक पटरियों को जमीन से लगभग 20 से 24 मीटर नीचे बिछाया जाएगा. ऐसा इसलिए किया जाएगा, ताकि बाढ़, भूस्खलन, यातायात जाम या सुरक्षा खतरों के कारण होने वाली सतही बाधाओं से उन्हें बचाया जा सके.

सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर वर्तमान में कई लाइनें हैं. भूमिगत मार्ग को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि अगर जमीनी मार्ग में कोई समस्या आती है तो भी आवागमन हर परिस्थिति में लगातार जारी रह सके. यह क्षेत्र पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के कटिहार के अंतर्गत आता है और पश्चिम बंगाल और बिहार के कुछ हिस्सों को कवर करता है.

इसका रणनीतिक महत्व भौगोलिक है. सिलीगुड़ी कॉरिडोर नेपाल, भूटान और बांग्लादेश के बॉर्डर से सटा इलाका है. इसी क्षेत्र में बागडोगरा वायुसेना स्टेशन और बेंगडुबी सेना छावनी जैसी महत्वपूर्ण भारतीय सैन्य चौकियां हैं. एक सुरक्षित भूमिगत रेलवे मार्ग रक्षा कर्मियों, उपकरणों और आपातकालीन आपूर्ति की सुगम आवाजाही सुनिश्चित करता है. इससे सतह पर मौजूद खतरों का जोखिम कम हो जाता है.

इसके अलावा, रेलवे उत्तर में कश्मीर पर विशेष ध्यान दे रहा है. 272 किलोमीटर लंबी उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक परियोजना ने कश्मीर घाटी को राष्ट्रीय रेल नेटवर्क से जोड़ दिया है. इस सीमावर्ती क्षेत्र में कनेक्टिविटी को और मजबूत करने के लिए सरकार ने 118 किलोमीटर लंबी काजीगुंड-श्रीनगर-बडगाम रेलवे लाइन का दोहरीकरण करने का फैसला किया है. इतना ही नहीं 40 किलोमीटर लंबी बारामूला-उरी नई लाइन के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की हैं.

सोपोर से कुपवारा तक 34 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन के लिए सर्वे किया गया था, लेकिन अव्यवहार्यता के कारण इसे रद्द कर दिया गया. राज्यसभा में लिखित जवाब में रेलवे मंत्री वैष्णव ने कहा कि परियोजना की मंजूरी के लिए राज्य सरकारों से परामर्श और नीति आयोग तथा वित्त मंत्रालय से अनुमोदन आवश्यक हैं. इन सब कारणों से सीमा से सटे क्षेत्रों के रेलवे परियोजनाओं को निश्चित समयसीमा में पूरा करना मुश्किल हो जाता है.

सीमा से सटे अरुणाचल प्रदेश में भी रेलवे का तेजी से विकास हो रहा है, जहां राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के जरिए चिह्नित कई लाइनों को प्राथमिकता दी जा रही है. इनमें प्रस्तावित भालुकपोंग-टेंगा-तवांग लाइन भी शामिल है, जिसका उद्देश्य समुद्र तल से लगभग 3,048 मीटर की ऊंचाई पर स्थित LAC के पास स्थित तवांग तक पहुंचना है.

राज्य में रक्षा मंत्रालय के जरिए समर्थित अन्य परियोजनाओं में सिलपाथर-बामे-आलो लाइन और 227 किलोमीटर लंबी पासीघाट-तेजू-परशुरामकुंड-रूपई कॉरिडोर भी शामिल हैं. इनका उद्देश्य दूरस्थ जिलों को रेलवे नेटवर्क से जोड़ना है. उत्तर लखीमपुर से जीरो लाइन को भी मंजूरी मिल चुकी है.

निवेश का पैमाना काफी बड़ा है. भारत की योजना पूर्वोत्तर में चीन, बांग्लादेश, म्यांमार और भूटान की सीमाओं के करीब लगभग 500 किलोमीटर रेलवे ट्रैक बनाने की है, जिसकी अनुमानित लागत लगभग 31,000 करोड़ रुपये है. पिछले एक दशक में लगभग 1,700 किलोमीटर ट्रैक का निर्माण पूरा हो चुका है.

2014 के बाद से पूर्वोत्तर के लिए आवंटन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, इस क्षेत्र में कुल ढांचागत व्यय 62,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है. इसके अलावा लगभग 77,000 करोड़ रुपये की परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं.

इनमें से कई रेल लाइनों में इंजीनियरिंग से जुड़ी बेहद चुनौतीपूर्ण परियोजनाएं शामिल हैं. पश्चिम बंगाल और सिक्किम में स्थित सिवोक-रंगपो लाइन 44.96 किलोमीटर लंबी है और इसमें तिब्बत सीमा के पास कई सुरंगें शामिल हैं.

अन्य परियोजनाएं, जैसे कि नगालैंड में धनसिरी-जुब्ज़ा लाइन और मणिपुर में जिरिबाम-इम्फाल लाइन, पहाड़ी इलाकों में व्यापक सुरंग निर्माण और पुलों की आवश्यकता को दर्शाती हैं. हाल ही में पूरी हुई मिजोरम में बैराबी से सैरांग तक की ब्रॉड गेज लाइन ने पहली बार आइजोल को राष्ट्रीय रेल नेटवर्क से जोड़ा है.

इस विस्तारित रणनीतिक फोकस की नींव 2014 में रक्षा मंत्रालय के जरिए पड़ी थी. पूर्वोत्तर में 19 रेल खंडों को रणनीतिक लाइनों के रूप विस्तार करने का फैसला किया गया था, जिसकी लागत रेलवे और मंत्रालय के बीच साझा की गई थी. इन परियोजनाओं को रेलवे के बुनियादी ढांचे की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी बताया गया था.

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