नेपाल के चुनाव में बालेन शाह की मैथिली कैसे एक बड़ा मुद्दा बन गई?

Gen-Z के बीच सबसे पापुलर नेता बालेन शाह ने मधेशियों के इलाके जनकपुर में चुनावी अभियान की शुरुआत अपनी मातृभाषा मैथिली में की और अब पूरे नेपाल में इसकी चर्चा है

बालेन शाह

“काठमांडु अधिकार मांगे ल न जा, घूरेला जा, पशुपति...” नेपाल के Gen-Z युवाओं में सबसे लोकप्रिय नेता, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बालेन शाह का यह नारा इन दिनों पूरे नेपाल में चर्चा में है. इस नारे की चर्चा इसलिए है कि वे इसके जरिए काठमांडु की सत्ता को चुनौती दे रहे हैं और प्रांतीय सरकारों को और मजबूत बनाने की बात कह रहे हैं. मगर सबसे दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने यह नारा नेपाली में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा नेपाली में नहीं दिया, बल्कि अपने प्रांत जनकपुर की एक सभा में अपनी मातृभाषा मैथिली में कहा है.
 
नेपाल में मार्च में राष्ट्रीय चुनाव होने जा रहे हैं और बालेन शाह ने जनकपुर के इस भाषण के जरिए अपने चुनावी अभियान की शुरुआत की है. हैरत की बात यह है कि काठमांडु के मेयर रहे बालेन शाह जनकपुर के रहने वाले हैं, मधेशी हैं और मैथिली भाषी हैं, इसका अंदाजा नेपाल में भी ज्यादातर लोगों को नहीं था. इस भाषण के बाद ही कई लोगों को इसकी जानकारी मिली.
 
चीखते-चिल्लाते युवाओं की भीड़ के बीच जब उन्होंने अपना यह पहला भाषण दिया तो दर्शक उन्हें लेकर कुछ ऐसे दीवाने थे, जैसे वे कोई रॉक स्टार हो. वैसे भी बालेन रैपर तो हैं ही, उनके रैप काफी पापुलर रहे हैं और पिछले दिनों नेपाल में हुए Gen-Z आंदोलन की प्रेरणा माने जाते हैं.

बालेन शाह ने अपने भाषण की शुरुआत माता जानकी को प्रणाम करते हुए की, जिनका जनकपुर में विशाल मंदिर है और माना जाता है कि श्री राम और सीता का विवाह इसी जगह हुआ था. शाह ने अपने भाषण में इस तथ्य का उल्लेख करते हुए कहा भी कि दुनिया का सबसे चर्चित विवाह जब जनकपुर में हुआ तो नेपाल के लोग डेस्टिनेशन वेडिंग के लिए जयपुर क्यों जाते हैं, यहां आकर करें. फिर उन्होंने कहा, अगर अयोध्या में साल में दस करोड़ पर्यटक पहुंचते हैं, तो जनकपुर में एक करोड़ पर्यटक क्यों नहीं आ सकते.
 
मगर उनके सात मिनट के संबोधन में सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी, “जनकपुर तो प्रदेश की राजधानी है, फिर आप काठमांडु क्यों जाते हैं. काठमांडु अधिकार मांगने के लिए मत जाइए, घूमने-फिरने के लिए जाइए, पशुपतिनाथ जाइए. लोग पूछते हैं कि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की संघीयता को लेकर क्या धारणा है, तो आज मैं कहता हूं, प्रदेश को और ताकतवर बनाना है, संघीयता को और ताकतवर बनाना है.”
 
उनका यह भाषण नेपाल के मधेश इलाके में तो पॉपुलर हो रही रहा है, पूरे देश में इसकी चर्चा है. लोग इसका अनुवाद कराकर इसे सुन रहे हैं. हालांकि इस भाषण को लेकर कुछ विवाद भी हुए, लेकिन उन विवादों का फायदा भी बालेन शाह को ही होता नजर आ रहा है.
 
दरअसल अपने भाषण के आखिर में उन्होंने कहा, “आप घंटी (चुनाव चिह्न) को इसलिए वोट न दें कि आज एक मधेश का छौड़ा (लड़का) प्रधानमंत्री बनने वाला है. बल्कि इसलिए वोट दीजिए कि सही बात करने वाला आदमी आया है, सही सरकार बनने वाली है.”

उनके भाषण के इस अंश पर पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा की पार्टी यूएमएल के एक बड़े नेता महेश बसनेत ने छौड़ा शब्द पर आपत्ति जता दी. दरअसल नेपाली भाषा में छाउड़ा का अर्थ कुत्ते का पिल्ला होता है और मैथिली में लड़का. महेश बसनेत जो मैथिली भाषा से अनभिज्ञ थे, ने अनजाने में इसे मधेश के लोगों का अपमान बता दिया. मगर यह दांव उलटा पड़ गया और सोशल मीडिया पर लोग उनकी यह कहते हुए आलोचना करने लगे कि वे कैसे नेता हैं, जो नेपाल की दूसरी सबसे बड़ी भाषा मैथिली से अनजान हैं. आखिरकार उन्हें माफी मांगनी पड़ी.
 
दरअसल 2021 की जनगणना के मुताबिक नेपाल में 32 लाख लोग मैथिली बोलते हैं, जो कुल आबादी का लगभग 12 फीसदी है. इससे अधिक सिर्फ नेपाली बोलने वाले हैं. इनकी संख्या 45 फीसदी है. 
 
नेपाल में मैथिली भाषा के गीतकार और रेडियो पर हैलो मिथिला जैसे पॉपुलर कार्यक्रम का संचालन करने वाले धीरेंद्र प्रेमर्शी इंडिया टुडे से बातचीत में कहते हैं, “उन्होंने जो छह-सात मिनट का संबोधन दिया वह बिल्कुल नई तरह का था. ऐसा लगा कि वे दिल से बोल रहे हैं और मधेश के लोगों, खासकर युवाओं को उसने सीधा कनेक्ट किया. मधेश की क्षेत्रीय पार्टियों का भी कभी इस तरह स्थानीय लोगों से कनेक्ट नहीं हुआ था. औऱ ऐसा भी नहीं है कि उन्होंने मधेश और जनकपुर की बात मैथिली में की तो दूसरी भाषा और दूसरे इलाके के लोगों को अच्छा नहीं लगा हो, मैं सोशल मीडिया पर देख रहा हूं, अलग-अलग भाषाओं में उनके इस संबोधन का अनुवाद करके वीडियो शेयर किया जा रहा है.”
 
प्रेमर्शी के मुताबिक बालेन शाह ने अपने भाषण के आखिर में जिस तरह जय जानकी माता, जय मिथिला, जय मधेश, जय देश और जय नेपाल कहा. यह सबको पसंद आया. लोग इसी क्रम को सुनना चाहते हैं.
 
हालांकि बालेन जब इसके बाद झापा में सभा करने गये तो पूर्वोत्तर भारत से सटे उस पहाड़ी इलाके में वे पहाड़ियों का वस्त्र पहनकर गए थे. इसके बाद यह भी कहा जा रहा है कि वे लोकल कनेक्ट के लिए उसी तरह अलग-अलग तरीकों को अपना रहे हैं, जैसे भारत में पीएम मोदी करते हैं. बालेन झापा की उस सीट से चुनाव लड़ने वाले हैं, जहां से पूर्व पीएम ओली जीतते रहे हैं. वे इस चुनाव में उन्हें चुनौती देने जा रहे हैं.
 
हालांकि Gen-Z में बालेन की लोकप्रियता निर्विवाद है, मगर सभी लोग उनके मैथिली संबोधन के प्रभाव में नहीं हैं. मधेश के ही रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार चंद्र किशोर कहते हैं, “बालेन मधेशी हैं, इसका खुलासा तो अभी हुआ है. वे बिहार के सीतामढ़ी जिले से सटे महोत्तरी जिले के एकडारा गांव के निवासी हैं और वे अपना टाइटल भले ही नेपाल के राजाओं वाले टाइटल शाह की तरह लगाते हैं, मगर उनका असली टाइटल साह है, जो वैश्य समुदाय से संबंधित है. मगर आजतक उनकी यह पहचान छिपी थी और उन्होंने कभी मधेशियों के अधिकार की बात पहले नहीं की. वहीं जब वे काठमांडु के मेयर थे तो वहां कबाड़ का काम करने वाले, सब्जी विक्रेता और फुटपाथ विक्रेताओं को उजाड़ने के अभियान में शामिल रहे. वहां रानी पोखरी में छठ के आयोजन पर उन्होंने रोक लगाई. मगर इस चुनाव में चूंकि उनकी पार्टी मधेश के इलाके में कमजोर है तो वे मैथिली और मधेशी पहचान का भुनाने की कोशिश कर रहे हैं.”
 
चंद्र किशोर दावा करते हैं कि बालेन अपनी इच्छा से कुछ नहीं कहते. उनके साथ कई एजेंसियां काम करती हैं और वे तय करती हैं कि वे क्या बोलेंगे. चंद्र किशोर कहते हैं, “Gen-Z को उनकी अराजक छवि अच्छी लगती है, उसमें पापुलिज्म तलाशा जा रहा हैं, उनके चुनाव प्रचार को इवेंट में बदला जा रहा है. इसके अलावा वे बहुत करीने से सॉफ्ट हिंदुत्व को आगे बढ़ा रहे हैं. ऐसा हमने दुनिया के कई देशों मे होता देखा है. नेपाल में अब उसे हम देख रहे हैं. अब देखना है कि लोग उन्हें कैसे जज करते हैं.”
 
अब इसका असर जो हो, मगर 165 सीटों वाले नेपाल के इस आगामी चुनाव में 32 सीटों वाला मधेश और 12 फीसदी आबादी वाले मैथिली भाषी अचानक महत्वपूर्ण हो गए हैं.

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